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सोशल मीडिया: पंचमू की ब्वारी और स्वरोजागर

उदय दिनमान डेस्कःपंचमू की ब्वारी आजकल सोशल मीडिया में कम ही आ रही है, जिस कारण वह अपनी बात सोशल मीडिया से नहीं रख पा रही है। उत्तराखंड में बढ़ते कोरोना मामले से उसकी भी चिंता बढ़ गयी है। पहाड़ में जिस तरह कोरोना अपना पैर पसार रहा है, वह उत्तराखंड की शांत वादियों के लिये परेशान करने वाला तो है। 

उत्तराखंड में आने वाले प्रवासी लोगो में बढ़ते कोरोना के मामले हताहत करने वाले हैं।  पंचमू के गाँव मे भी प्रवासी भाई बंधू आ रखे है, कुछ को क्वारन्टीन कर रखा है, कुछ क्वारन्टीन होकर अपने घर आ गए हैं। पंचमू के परिवार का भाई गब्बी जो दिल्ली में काम करता था अपना ताम झाम लेकर गाँव आ गया है। अब वह गांव में ही रहना चाहता है, लेकिन उसकी घरवाली नही चाहती है।


    पंचमू की ब्वारी सुबह गाँव के  ठंडे पानी के स्तोत्र में पानी लेने जाती है, वँहा उसे गब्बी की ब्वारी जो उसकी रिश्ते में देवरानी है मिल जाती है, राजी खुशी का हाल चाल जानती है, और  उसे शाम को मिलने को कहती है।


    शाम को पंचमू की ब्वारी गब्बी के घर जाती है। गब्बी और गब्बी कि ब्वारी अपनी व्यथा पंचमू की ब्वारी को सुनाते हैं। पंचमू कि ब्वारी देवर देवरानी को समझाते हुए कहती है।


     देखो देवर जी आप लोग इस कोरोना महामारी के कारण से सपरिवार अपने घर आ गए हो। अब जैसे देवर जी ने कहा कि अब उनकी नौकरी पर भी संकट है, और वह घर आकर ही कुछ काम करना चाहते हैं, अच्छी बात है, सतपुली ज्यादा दूर थोड़ी है, बच्चे वंही पढ़ लेंगे, हमारे बच्चे भी वंही पढ़ते हैं।

अब रही बात काम धंधे की तो मैं और तुम्हारे भैजी भी तो गाँव से बाहर नही गए, यँहा रहकर महीने के 15 हजार रुपये तो हम कमा ही लेते हैं, ऊपर से ताजा अपना घर का दूध, भुज्जी अलग खाते हैं। इसी बार हमने  भैंस का दूध और गाय का घी भी बेचकर लगभग 20 हजार रुपये तीन महीने में कमा लिए, खेती अपनी मेहनत है, उसमे तुम जितनी मेहनत करोगे उतना कमाओगे। 


    अब देखो करने वालो के लिये बहुत काम है, नकारो के लिए बहाने ही बहाने हैं। मधुमक्खी पालन से शहद, आजकल गर्मियों में भिंडी, लौकी, तोरी सब सतपुली के बाजार में बिक जाती है, गाँव के दूध की खपत है, क्योकि सब लोग थैली का दूध पीकर थैला बन गए हैं, अब तो सरकार भी मदद कर रही है।  आम का अचार, कटहल का अचार, तिमलू का अचार, अरे लोग तो सिलबट्टे का नमक पीसकर तक बेच रहे हैं।


    देवरानी जी अपनी कमाई का पता नही चलता है, लेकिन जब दूसरे के लिये मेहनत करके हमे एक रकम मिलती है, और वह महीने की पहली तारीख के बाद पूर्णमासी के चांद की तरह घटने लगती है।लेकिन अपनी कमायी दो चार सौ ही सही लेकिन फुखता होती है।


      गाँव के प्रधान जी से बात करो, अब तो सरकारी योजनाएं भी आने लगी है, बस जरा लगन और मेहनत की जरूरत है, फिर देखो तुम गाँव मे ही रच बस जाओगे। हमारे पूर्वजो ने तो खेती और पशुपालन से ही पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को संभाला है, अब समय परिवर्तन हो गया, तकनीकी का जमाना है, इस तकनीकि को जब शहरों में उपयोग कर सकते हैं तो गाँव मे क्यो नहीं। देवर जी मैं आप लोगो को सहयोग करूंगी, लेकिन मेहनत तुमको ही करनी है। 


     गब्बी ने कहा ठीक है भौजी, अभी तो मैं आपके बैलों से ही हल लगाऊंगा, बाद में एक जोड़ी बैल ले लूँगा, और हाँ दो धड़ी प्याज मेरे लिये रख देना, तुम जरा सतपुली में अपने साथ अपनी देवरानी के लिये एक ब्यूटीपार्लर खोलने के लिये दुकान देख लेना, जब इसको आता है तो आपके साथ सुबह शाम चली जायेगी।


   पंचमू की व्वारी आजकल गांव में सभी प्रवासियों की मदद कर रही है, घर गाँव और सबको फोन करके कोरोना से कैसे बचें यह भी बता रही है। प्रवासियों के लिए स्कूल में कभी प्याज और मरसू कि रलो मिसो भुज्जी बनाकर दे रही है तो कभी कभी दिन में पळयो और उसमे मुर्या की सिलबट्टे में पिसी चटनी मिलाकर खिला रही है, दो दिन तो दूध और भात बनाकर भेजा। गाँव मे हर किसी की मदद के लिये सबसे आगे है।

  एक मौ पिछले 10 साल बाद गाँव आयी है, उसके घर के ऊपर के खरपैल ठीक करवा रही हैं। पंचमू कि व्वारी का कहना है कि ऐसी महामारी तो भगवान करे  कभी ना आये, पर जो लोग गांव आ गए हैं, वह गाँव से वापिस ना जाए, आजकल गाँव मे खूब चहल पहल हो रखी है।


अब चलो पंचमू कि ब्वारी आप।लोगो से पूछ रही है कि आपके।गाँव मे लोग क्या क्या रोजगार कर रहे हैं, जरा उनके गाँव मे भी कुछ नया स्वरोजगार खुल सके।

पंचमू की ब्वारी सतपुली से।

©®@ हरीश कंडवाल मनखी की कलम से।

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