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मिन भी लाइव औण

उदय दिनमान डेस्कः सब्बि धाणी देरादूण जैसे गीत के रचनाकार भाई वीरेन्द्र पंवार की कोरोनाकाल की ये रचना पोस्ट करने से खुद को रोक नहीं पा रहा।

वीरेन्द्र पंवार
जै दिन अंधेरी का यु काळा दिन चौळ जाला,
जै दिन यु खुट्टौ का छाळा मौळ जाला,
मिन भी लाइव औण—!
जै दिन गफ्फा तक पौंछ जाली भूक,
अर पाणी तक पौंछ जाली तीस,
जब उ खौर्यू की कुटेरी ल्हेकि अपणी थौ बिसाला,
मिन भी लाइव औण—!
जीणा ख़ातिर जु लम्बी-लम्बी सड़की नपणा छन,
भड़कदी रूड्यूक घाम पीठी मा ल्हेकी हिटणा छन,
जब उ सुखी-सन्ती अपणा घौर पौंछ जाला,
मिन भी लाइव औण—!
आज ज्यून्दा छन,पर भोळौ पता नी,
टुक्खू पौंछ्या रैनी, पर गोळौ पता नी,
जब उ ये माटा मा दब्या,अपडा जलड़ौ खुज्याला,
मिन भी लाइव औण—!
जै दिन टकटका खड़ा रैला,बेमौत मोर्दरा,
जै दिन मनखी दगड़ा खड़ा रैला, मनखी कद्र कर्दरा,
मनखी कुदरत मा हरेक जीव-जन्तू मोल चिताला,
मिन भी लाइव औण—!
जै दिन एकनसी राला परजा,राजा अर राणी,
जै दिन निरदुन्द राला,धरती,आगास अर पाणी,
ई मुन्था मा सौब मिल-जुली फेर मण्डाण लगाला,

मिन भी लाइव औण—!

जिस दिन अंधेरे के ये काले दिन बीत जाएंगे
जिस दिन पैरों के छाले सूख जाएंगे
मैं भी लाइव आऊंगा…
जिस दिन कौर तक पहुंच जाएगी भूख
और पानी तक पहुंच जाएगी प्यास
दुखों की गठरी रख करेंगे जिस दिन वे विश्राम
मैं भी लाइव आऊंगा…
जीने की खातिर जो लंबी-लंबी सड़कें नाप रहे हैं
भड़कती गर्मी में धूप पीठ पर लादे हांफ रहे हैं
जब वह राजी खुशी पहुंच जाएंगे अपने घर
मैं भी लाइव आऊंगा…
आज जिन्दा हैं कल का पता नहीं
पहुंच गये आकाश, धरती का पता नहीं
जब वे इस मिट्टी में तलाशेंगे अपनी जड़ें
मैं भी लाइव आऊंगा…
जिस दिन मजबूती से खड़े हो जाएंगे बेमौत मरने वाले
जिस दिन मानवता के साथ खड़े हो जाएंगे मानवता की कद्र करने वाले
कुदरत के हर जीव-जन्तु की कीमत जान जाएगा मनुष्य
मैं भी लाइव आऊंगा…
जिस दिन एक समान हो जाएंगे प्रजा, राजा और रानी
जिस दिन निर्विघ्न हो जाएंगे धरती, आकाश और पानी
इस धरती पर सब मिल-जुलकर मनाएंगे जिस दिन फिर खुशियां
मैं भी लाइव आऊंगा…

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