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देख दू सैरि दुनिया

-आत्मनिर्भर—
देख दू  सैरि दुनिया
 कन हवैगि लाचार
सोच सोच मन
मा क्वी नयु विचार,
अपडु धंधा अपडा हाथ
कर दू कुछ नई छ्वीं बात।

उठ सियां मनख्यूं बिजाळ
आत्मनिर्भरता मशाल बाळ

क्या होलू, कन होलू
गैरै से कर सोच बिचार
सच धर्म कर्म अर तप दगडि
कर समाज मा, कुछ यन काम
मनख्यूं मैनतों मिल जौ
यख पूरू दाम।

उठ सियां मनख्यूं बिजाळ
आत्मनिर्भरताा मशाल बाळ

खुद भी संभळन्न अर
होरु भी संभाळ
समाज तै नै दिशा दी क
आत्मनिर्भरता मशाल बाळ

उठ सियां मनख्यूं बिजाळ
आत्मनिर्भरता मशाल बाळ
कविता कैंतुरा लुटियाग खल्वा चिरबटिया

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