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“मेरू बचपन कु घर “

तिबारी मा बैठयू छाे में
सौचणूं छाे एक बात,
का गैन हाेला सी दिन !
बैठयू छाे उदास,
खौळा-चौक मा, खेल्या दिन ,
का गे हाेला आज,
आंखी मेरी भरी गैनी
 देखी  तिबार
 बालापन का दिन बीत्यां जख
आज ह्येगि स्या खंध्वार
दै-दादा न खवांया जख,
भै बैंण्यूं कि याद
दग्ड्याें दगडी हँसी खुशी खेल्या कै त्याैहार
छाजा सज्यां रन्दा जख
कनु राैत्यालु चाैमास
खुद लगणी मैतै ताें दिनाें की
कख हर्ची हाेलु मेरू सु मुलुक आज |
कातिक कु मैनु लगदू
 दिवालियाें की च बार
 भैलु खेलेदूं यख
आैजी बजाेंदा ढाेल की ताल
झुमैलाें आैर गीताें की लगी बार
हंसी खुशी फैली रन्दी छे,
ये चाैक तिबार
आज घास का बौटळा जम्या
मेरा चाेक तिबार ।
बेटी-ब्वारी घास कु बणु- बणु जान्दा
बुड्या भग्यान अपरी छ्वीं बथ लांदा
मिली बाटी खान्दा सभी पल्याे आैर भात
काैदे की राेटी की त अलग ही छै बात ।
मन मेरी खुद्यैणू च
साेची-साेची बात
आंखी भरी गेनी मेरी
देख्यी अपरा गाै कु यु हाल |
रिंकी काला,  मयाली रूद्रप्रयाग 

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