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‘ब्यो’- कंडाळि तै ब्यौ कि स्यांणि लगिन

–‘ब्यो’—-
कंडाळि तै ब्यौ कि स्यांणि लगिन
कंडाळि न बोलि मैन ब्यो कन
इसकोस दगड़ि!
समझ नि आई इसकोस तै!
टोपलि उतारि खजाळि
कनै मुंडमा,
ब्योकु न्योतू द्योण बैठी सबुमा,
छुंई लगणी पुंग्ण्यूं सार्यू मा,
अमर्योत आई,
  भट्टा ऐन,
चचैंडा गोदड़ी भी।
आलू पिंडाळु तैडु
मौंण गाड़ी भैर,
इसकोस भैजी की बुलाई मीटिंग मा,
गोदड़ी ब्वनू किलै बुलाई
हमुतै आज सारी मा,
इसकोस ब्वन्नू भोल स्वयंबर च
ऐ जाया तुम सबि ब्यो मा
चचेंडा गोदड़ी न,
कोट पैंट पैरी छे,
आलू पिंड़ाळा पर भी,
धोती खूब जमणीं छे,
अमर्योत भी टोपलि धौंरी
पौंछी स्वयंबर मा,
दयेखी जब ब्योलि कंडाळी त
भभराट ह्वेगी जिकुडि मा।
आपसे मा भिभड़ाट
ह्वोण लगी, भुज्यूं मा,
दारू पीक लिंगड़ू आयूं
गाळी द्योणू सबुमा,
अर ब्वन्नू –
कन कांड़ा लगिन,
कंडाळी तेरा गात मा,
हम त क्वे भी नी औंण्या,
तेरी बरात मा,
कंडाळी तै गुस्सा ऐगि
भुज्यूं पछांण ह्वेगि ,
अर तखि देखदा-देखदि,
भिभड़ाट उठिगि
रुंआ-धुंवा मा, किकलाट मचिगि,
यन स्वयंबर छो कंडाळी कु,
कि
भुज्यूं मा इतिहास बणिग्ये।
सिमरन , रिंगेड, बैनोली,  रूद्रप्रयाग ।

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