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हे निर्दयों तुमतै दया भी नि आई

हे निर्दयों तुमतै
 दया भी नि आई
चार रूपयों बाना ,
तुमुन,
 मैं नोंचि-नोंचि  खयूं।

न मैती वैन मेरा ,
न वैन मेरा स्वरी,
केन बोलि बेटी च!
त कैन बौली ब्वारी !

कबि बेटी धर्म त,
 कभि ब्वारी कर्म निभै,
स्वार्युन दस मनख्युं बीच पूछी,
ब्वोल ब्वारी देजा मा क्या ल्याई?

जरा जब मैंन आवाज उठै
क्य दीनी मेरा मैत्युन दैज मा
हकलन्दी आवाजन बुलै।

मेरा ब्वै- बाबुन सैंती-पाळिऽ
 ब्यैटी  दान कर्ली।
 जीवन भरै सैंती  पूंजी
 तुमरा नौं कर्ली।

क्य ल्ये तु दैज मा,
 क्य दीनीं तेरा   मैत्युन,
यु पूछी-पूछी तुमुन मैं ,
सर्रि जगा बदनाम कर्लयूं।

भूख लगण पर मैं भी र्वयूं
ब्वै-बाबो  सांका पर स्ययूं,
घौरे लाड़-लड़्याली रै,
दादा-दादी की प्यारी रै।

नौनू तेरू अपरु मांजी,
 मैं सदानी परायूं रै!
कै बैरिन  रीवाज बणै,
चार रुप्युं बाना
मैं सदनी यनि पिथाई।

द्वि-द्वि घौर,  दी तै भी मैंतै,
 कभि यत कबि वत नचै,
देज परथा बाना मैं ,
सदानी यनि सतै।

तन दान,मन दान,
अपरा सभी अरमान
अपरु कर्म कर्तव्य समझी,
 करि द्वी घौरु सम्मान।

त्वैन सु जाची नी, परखि नी!
अपरा कर्म-कर्त्तव्यु से तू,
जरा सा भी सरकी नी,
तेका भट्यांण पर
 दैजा बाना  तेरु जिकुणु
खणि-खणि खाण पर,
खरी खोटि सुणै त्वेन
मेरा ब्वै-बाबा  गरीब पछ्यांण पर!

किलै त्वैन मुंडळि झुकै,
 वैका यति सतांण पर,
ना निभौ तु, यूँ
बेमतलब का रीति-रिवाजों तै।
ना लुको तु, यूं देज़ का अत्याचार्यों तै।

तू क्वै सामान नी!
 तेरु लेन देन कु काम नी?
ना झुक तू ये कलजुगी समाज मा!
 यख नि मिलण्यां त्वै क्वै राम नी?

शुद्व ,सरल,शब्दों  मा,
 पुछदु तुमते आज मैं,
क्या नारी कु क्वै स्वाभिमान नी?
क्या नारी कीक्वे पछांण नी?
वेदिका सेमवाल  बैनोली रूद्रप्रयाग ।

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