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ज्वोन सी मुखुडी वैंकी , काजल लगी आंखी

ज्वोन सी मुखुडी वैंकी ,
काजल लगी आंखी
सजी धजी बैठी च बेटुळि
बाबा जी की  सांखी।

चाै तरफ हँसी फैली ,
खुशी अईं च बार,
नाैनी आज बडी ह्वेगी ,
ब्याें च तैंकू आज ।

काम की किसाण
सगाैर की खान  वा ,
मन मयालू छाै वैंकु ,
कुछ इन्हीं छै वा।

बाबा जी न  आज ,
दीली  नाैनी दान
फली फूली राजी खूशी रय्यां
 मेरी लठ्याली बांद ।

माँ जी न भी दीली आज
 सुहागवंती आशीस,
सासु ससुर की सेवा करी ,
 रखि कुल की रीत |

चली गे अब स्वामी दगडी ,
स्वामी जी का देश ,
जख क्वे देखण लेग्यां
तैमा ब्याेलि कु रूप
 त क्वे द्येंखणा
ताेला साेना मा सज्यूं  सिंगार।

कै की त नज़र जांणी कि
सामान क्या ल्याई दगडा!

        बाबा जी न,
अपरि जिकुडि दान करी
क्या नि ख्वे होलु?
फुंड फूका! जू वे, सु वे ,
 
बारा साेच का लाेग छिन,
पर कुछ हफ्ता बाद ह्वेगी ,
घर मा भी तनि हाल!
बूबा न तेरा क्या दीनी ?
सासू पूछणी च आज ।

ससुरा जी न भी चुप्प रांया
बात सुणीक  आज
स्या बिचारी भी चुप सुंण्णी,
ब्वे-बाबा जी की लाज धनी।
आँखाें मा, आंसू औंणा,
 स्होंणि सबि धांणि चुप्प,
र्वोंणी, कबि चित्त बुझौंणी।

कुछ दिन की, ही बात च,
एक मैना, आषाढ़ कू बीती ,
 एक गती साैंण च आज
 सजी धजी क भैर आंयी
 सुंण्णी साडयूं  नै डिमांड,
बीस लाख, नगद ल्यौंण त!
मैत पठाए ग्ये, स्या आज।

मन मा सोंचणी छे वा,
निरासीं क, या बात,
कनके बाेलिली बाबा जी मा,
फुक्येणी रे सैरी रात।

साेची-साेची थकी स्या,
,क्या करु, मैं आज,
मन मा तैंका ख्याल ऐ ,
बची भी क्या कन यख,
फांसी पर लटकी,
स्या निखाड्या!
देखी समाज का हाल।

ब्वे-बाबु की लठ्याली ह्वेगी ,
 दहेज की शिकार
हैंसदी मुखुडि माैन ह्वेगि आज
   शरीर निरपरांण!
क्या पायी हाेलु बाबाजी न
अपडि लाड़ि दीक दान
अपडि लाड़ि दीक दान—–

रिंकी काला  मयाली रूद्रप्रयाग ।

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