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नै पीढ़ी की कलम मा गढ़भाषा

उदय दिनमान डेस्कः नै पीढ़ी की कलम मा गढ़भाषा,  आज भौत सारा लोग जख गढवाली मा गीत संगीत का सुंण्णदरा छिन तखि भौत सारा नै छ्वाळि का ज्वान दगड्या अपडि भाषा की तरफां मुडी तै लिखण पढण की शुर्वात कना छिन।


यि सब लगभग पंद्र साल बटि तीस बरस का हौंसिया ज्वान छिन ईं उमर मा जख लोग वेस्टर्न संस्कृति की तरफां रीझ जांदन तखि यौं देखी तै हमारी भाषा साहित्य-संस्कृति की तागत भी बढ़णी च।


अर ह्वो भी कन ना जख लोग सरमांणा ह्वोन अपडि भाषा बुलाण मा, पढण अर लिखण त आसमान की छ्वीं छिन तख। यन मा जरूर हमुतै यूंतै उळार्या दगड्यों कौ प्रोत्साहन बढ़ोण की जुम्बारि उठोण ही पडलि।


छि भै!  यीं
आँनलैन पढ़ै मा,
 कनुक्वे  ह्वौण
भल्यार!
कखि बच्चों मु फोन नी!
त कखि नेटवर्क नी !

छि बै, या निरभागी
बीमारी भी कन काल
बणी ऐ!
देश परदेश गयां सबि लोग
कन बेरोजगार ह्ववैन?

क्या होलू, कन होलू
ब्वै-बाबा भी दौन ह्वेगि,
आँनलैन पढ़ै त,
तन फोन नी?
फोन छौ, त
नैटपैक नी?
 नेटपैक औंण कखै
जब
बच्चों का ब्वै-बाबा,
बेरोजगार ह्वेगिन।

घौर मा भी,
रोजगार कु क्वे
साधन नी !
द्वी- चार फुंगड़ी छै
सि बि बांजि छोड़िन।

सालौऽ बै छौड़ी,
  घौर कूड़ी छै
        त!
स्या बि अब सप्पा टूटी ।

सबि ब्वन्ना आँनलैन
 पढ़ें  ह्वोणी,
कखि बच्चों मा फोन नी!
त कखी नेटवर्क नी! 

सबि बुना आँनलैन
पढ़ै चलणी,
ब्वै -बाबा पर,
 घौर मा औंणी
 नखरी सन्नि!

द बोला यन मा
कनक्वे क्या ह्वलु
देश कु भविष्य
कन बणलू?

कविता कैंतुरा खल्वा लुटियाग चिरबटिया ।

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