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ओ पंछी बौड़ी औ, तिबारी-डंडयाळि

औ पंछी बौडी औ’

ओ पंछी बौड़ी औ,
 तिबारी-डंडयाळि
 सुन्न पड़यां छन,
दै-दादा की रगर्यंदी आंखी,
नाती – नतेणौं तै ख्वजण लगी छन।

सोच!
जरा अफसोस त्वै होलु!
कर्ज चुकै नी! त्वीन बे – बाबा कु!
पहाड़ी ह्णोंण पर त्वै शर्म च औंणी
नौं डुबेलि  त्वीन दै – दादों कु।

घौर बै लसपस्या घ्यूं छोड़ी
डालडा मखन खांण लगयुं च,
क्या लगी होली यन बिमारी,
सब सैर बजार तीर बस जांण
 लग्यां छिन।

सुबेरि उठण  अर खांणु खांण
दिन भर लुकारा प्वच्चा मारी
लम्पसार पड्या छन,
पिज्जा -बर्गर, पेस्ट्री मोमो
फास्ट – फूड खेक म्वटयार
पड्या छिन।

क्या नीं कनीं सरकार सबुतै
छत्तीस द्वळि सुविधा दीनी छिन,
सबुतै चेंदु सेंणु – सपाटु
पलायन की  यख
 दुविधा दीनीं छिन।

सबुका  कूड़ा ताळा लग्यां,
जन बांजा घौर सुन्न पड्या छिन
धांण -काज छोडी,आलस जामिग्ये
खटिया लगै क टवड्गा पड्या छन।

दाढ़ी कु कट यन तौंकु  कर्युं
जन बाघ न मुख पर
  दाढ़ मारी ह्लोलि,
बाळ रंदन यन खड़ा कर्या
जन कुकुर-बिराळो न
फाळ मारी ह्वोलि।

काकड़ी – मुंगरी, तरबूज,खिरक्यंडा
चचैंडा करेला कख चाखंण त्वेन
तेरी जग्वाळ रंदा था बैठया बांदर
तु चलिख्ये अब सी भी गैन।

कोदू– झंगोरु, भट्ट गौथ त्वीन
म्वलेकु खांण शहरों मा,
शिक्षा कु बस बानुं बणायूं
ताळु लगायूं तेरा घौर मा।

आड़ू,पोलम,नासपती,च्यूरीं
यौं सब तीं तु, छोड़ी ना जा!
यु पहाड़  गमगमा आंसू बगौंणा,
हे पंछी! तु  झट्ट, बोड़ी ऐ जा।

औ पंछी बौड़ी औ,
 तिबारी-डंडयाळि
 सुन्न पड़यां छन,
दै-दादा की रगर्यंदी आंखी,
नाती – नतेणौं तै ख्वजण लगी छन।

  कविता – सचिन रावत
ग्राम – बजीरा लस्यां रूद्रप्रयाग ।

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