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नै छ्वाळि- नै प्रयोग

 ठेठ  नैनीडांडा पौडी गढवाल बटि—रविंद्र सिंह रावत@ रविन्द्र सिंह रावत

चौबीस साल कु उळार्या ज्वान दगड्या—‘स्नातक गणित-विज्ञान दगडि, स्नातकोत्तर रसायन विज्ञान कु छात्र, जु अबि बीएड की पढ़ै, पैठाणी पौडी गढवाल बटि कनू च। औपचारिक पढ़ै-लिखै दगडि अनौपचारिक रूप से सोशल साइट पर गढवाली भाषा-साहित्य तै, लोकधुनों तै, खूब फैलास द्यौणू च।    मूल नैनीडांडा पौडी गढ़वाल कु रविंद्र कलम पेन कु उम्दा कलमकार च, जु सादारण पेन भी असादारण तरीका से चलोंदू अर ये बात रविंद्र तै आम से खास बणै द्यैंदि।

     जेकि कलम मा गणित का सूत्र,  विज्ञान का समीकरण बड़ी कलाकारी सुलेख बणीं निकळदा। तखि माटि की खुशबू भी खूब गैरै तक बसीं च, तबे त रविंद्र पंद्रा-पंच्चीसी की श्रृंगार रस की ईं उमर मा गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी जी दगडि भौत सारा स्थापित साहित्यकारों रचना पढणू, सुंण्णू अर अपडा मन का भाव गंठयोंणू च।अपडि स्वरचित कविता गीत लिखण सजांण मा कलम चलौणू च।लोकगीत थडिया चौंफुलो तै भी सूंणी समझी तै कौरा कागज मा सजौंणू च।  बच्चों तै सिखोणू च अर आंदि-जांदि भलीऽ भौंण मिस्योणू च। 

 समाज मा रळयां लोकगीत छांणी तै ल्यौंणू च, अर अपडि कलम से यनि सजौंणू कि भौत सारा द्येखदरा सोशल साइट मा रविंद्र की तरफां खिंचणा छिन।  यु आकर्षण भौत सारा नै छ्वाळि का दगड्यों तै भी आकर्षित कनू च।  एक बेहतरीन कलाकार दगडि रविंद्र लिख्वार भी च, जु गढभाषा की सुंदर रचना कविता भी लिखणूं च।

   रविंद्र का विज्ञान का सुंदर  सजिळा नोट्स भी काफी लोकप्रिय छिन।  भौत सारा छात्र आज यूं नोट्स कु भी फैदा उठौणा छिन । पेन कलम से भौत सारा बेहतरीन रेखाचित्र-ड्राइंग भी खेंचणू च।  छात्र अध्यापन का दौरान टींचिग अभ्यास कर्दि दौ रविंद्र लोकगीतों की धुन भी स्कूली बच्चों तै सिखौंणू च गुंणमुंणाणू च ।

    यि सब बात रविंद्र तै खास बणै द्योंदा, अर यन भी उम्मीद-आशा,कर्दा कि औंण वौळा टैम पर भाषा-संस्कृति, साहित्य की सेवा कर्दि रौलू  अर यनि उळार्या हौंसिया बणींतै नया आयाम स्थापित कर्दि रौलू—–   रविन्द्र की एक रचना देखी आप मुल्यांकन करा—
मि कनकै बिसरी जौं ?
ते चौक अर वा डिन्डयाळिजख सीखि मिन ग्वय्या लगाणूं,ब्वे की खुचिली माकभी दणमण रौंणू,त कभि खिलपत हैंसणु
वा चुली खांदी गवै द्येलिदादी की कथा बातों की,बाड़ी-कंडाली अर चेंसु- फ़ाणू,कनि भली रस्याण रसिला हात की
घुघुति -बसूती अर बाळापन का दगड्यालुका-छिपी, चोर-सिपै अर पिट्ठू-पंचगाराकाफल, बेडु, किनगोडा, हिसरचैत-बैसाख का मैना, ग्यों जौं का भारा।
घुगति-घिंदुड़ी अर कफ्फु-हिलांस,रूडी का कौथिग अर द्यबतों का थानचौमासा का दिनों मा, डाँड़यों की गोठ,खैरी का दिनों कि वा, तड़तडी उकाळ।
खाजा-बुखणा अर रोट- अरसा,गौं खोलौं मा बेटी ब्वार्यों का पैंणा,गाड़-गदरा अर ह्युंचुला डांडा,घनघोर औंसी बाद, जुन्याली राता गैंणा,मि कनकै बिसरी जौं ?—-@रविन्द्र रावत

आज भौत सारा नै बच्चा कोशिश  कना छिन अपडि भाषा संस्कृति से जुडणे समझणे कोशिश कना जु एक सकारात्मक तस्वीर च हमारी भाषा संस्कृति तैयन शानदार लिखदि रा,  कोशिश कर्दि रा नै छवाळि कु गढभाषा मा नजीक औण भौत जरूरी च। 

            संकलन———अश्विनी गौड़ दानकोट रूद्रप्रयाग।

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