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सिमरन :शारिरिक अस्वस्थ ह्वोण का बाद भी कलम किताब से भौत गैरी दगडि कर्दि

नौं -सिमरन पिताजी- वीर सिंह रावतमाताजी -सुनीता देवीगौं -रिंगेड, बैनोली जनपद रूद्रप्रयाग उमर-चौबीस बसंतपढै- हाइस्कूल अर अगने भी जारीसमाज तै रैबार – नशा मुक्त रा स्वस्थ रा।
सिमरन एक यन बालिका जु शारिरिक अस्वस्थ  ह्वोण का बाद भी कलम किताब से भौत गैरी दगडि कर्दि।तमाम कोशिश कना बाद भी शरीर स्वास्थ्य मा खास सुधार नी च  सामान्य बच्चों चार हिटण घूमण मा दिक्कत  च।सिमरन फिर भी हिम्मत नि हारी अर जीवन की जीवटता का कांडा-मूंडा छंट्ये तै कविता कहानी लिखण पर लगी च।

माँ सरस्वती कि भी यन कृपा च कि सिमरन की कहानी कविता मा संवेदना रळी-मिली च।कहानी लिखण पढण मा –‘मैं नीर भरी दुख की बदरी’- महादेवी वर्मा,  जन संवेदना निकळन आसान नी पर सिमरन की जीवन का चौबीस साल की जीवटता तैकि कलम किताब मा छपणीं छिन। लिखण पढण की संस्कृति सिमरन तै राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त आदर्श अध्यापिका डॉ गीता नौटियाल बहिनजी से मिली च, अर नौटियाल बहिनजी की शिक्षा दिक्षा की यन छाप पड़ी च, कि सिमरन जीवन का आदर्श कलम का रंग सब अपडि आदर्श अध्यापिका मु बथै द्यौंदि। 

खूब हौंस उलार दगडि गीता दीदी न, सिमरन कु हाथ पकडि तैंतै समै बितौणौ किताब घौर तक पौछेन, अर खूब हुर्से पढण अर लिखणौ तै। संवेदना दगडि सिमरन खूब पढ़ी अर कथा- कविता लिखिन, तब गीता दीदी तक पौछैन।गीता दीदी की सकारात्मक प्रेरणा से सिमरन लिखदि रै, अब गीता नौटियाल दीदी न सिमरन की रचनौ तै संग्रै बणौण की , छपौंण की भौत कोशिश करिन अर  रंगड़-धंगड़ बाटों हिटदि हिटदि श्रीनगर मा आदरणीय गीता असनोडा मैडम से बात करी त काफी हौंसला मिलि अर सिमरन की कलम एक पोथी बणीतै छपी। 

  आदरणीय गंगा असनोडा दीदी की निस्वार्थ मैनत किताब मा खूब दिख्येणि च।ये वास्ता डॉ गीता नौटियाल दीदी कु भौत भौत प्रणाम ।  अबि किताब वैश्विक महामारी का बीच ही फँसी च,  पर  मजबूत ठंवाण जन खडा गीता नौटियाल अर गंगा असनोडा का सांसू बणौंदि हाथ सिमरन तै खूब सांसू बढौंणा।सिमरन की पारिवारिक परिस्थिति  ज्यादा बेतर भी नी!पर मां-पिताजी कु छैल बरौबर सिमरन तै मिलणू च, फिर भी सिमरन की विशेष परिस्थिति मा कलम पकड़ी लिखणै डगर मा हम सबुकि मदद  ईं बालिका तै फर्श बटि अर्श तलक पौछोणै तागत रखदि।  ईं  बालिका का पंख जीवन की ईं धुकधुकि मा भी खूब फैलास ल्यौन,


अबि सिमरन की कलम शब्दों मा भौत सुधार की जरूरत भी च, पर हमुतै यन संवेदनाओं तै अग्वाड़ि बढ़ौण की तरफां हुर्स्योंण चैंदु अर ह्वै सकु त यथासंभव #आर्थिक# साहित्यिक मदद जरूर कन चैंद      सिमरन की एक सौदी रचना मा, कल्पना देखा—-


—‘ब्यो’—-कंडाळि तै ब्यौ कि स्यांणि लगिनकंडाळि न बोलि मैन ब्यो कनइसकोस दगड़ि!समझ नि आई इसकोस तै!टोपलि उतारि खजाळिकनै मुंडमा,ब्योकु न्योतू द्योण बैठी सबुमा,छुंई लगणी पुंग्ण्यूं सार्यू मा,अमर्योत आई,  भट्टा ऐन,चचैंडा गोदड़ी भी।आलू पिंडाळु तैडुमौंण गाड़ी भैर,इसकोस भैजी की बुलाई मीटिंग मा,गोदड़ी ब्वनू किलै बुलाई हमुतै आज सारी मा,इसकोस ब्वन्नू भोल स्वयंबर चऐ जाया तुम सबि ब्यो माचचेंडा गोदड़ी न,कोट पैंट पैरी छे,आलू पिंड़ाळा पर भी,धोती खूब जमणीं छे,अमर्योत भी टोपलि धौंरीपौंछी स्वयंबर मा,दयेखी जब ब्योलि कंडाळी त भभराट ह्वेगी जिकुडि मा।आपसे मा भिभड़ाटह्वोण लगी, भुज्यूं मा,दारू पीक लिंगड़ू आयूं गाळी द्योणू सबुमा,अर ब्वन्नू -कन कांड़ा लगिन, कंडाळी तेरा गात मा,हम त क्वे भी नी औंण्या,तेरी बरात मा,कंडाळी तै गुस्सा ऐगिभुज्यूं पछांण ह्वेगि ,अर तखि देखदा-देखदि,भिभड़ाट उठिगिरुंआ-धुंवा मा, किकलाट मचिगि,यन स्वयंबर छो कंडाळी कु,किभुज्यूं मा इतिहास बणिग्ये।
अश्विनी गौड़ दानकोट रूद्रप्रयाग बटि

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