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अंतरिक्ष की संपत्ति पर दावा ठोंकेगा देवास?

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मुंबई। देवास और उसके शेयरहोल्डर्स को अंतरिक्ष के ब्रिटेन के ऐसेट्स और रेवेन्यू को जब्त करने के लिए न्यायिक समर्थन मिल गया है। इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (इसरो) की कमर्शल यूनिट अंतरिक्ष के खिलाफ 67.2 करोड़ डॉलर (करीब 4.5 हजार करोड़ रुपये) का आर्बिट्रेशन ऑर्डर पास हुआ था।
इस डिवेलपमेंट से वाकिफ एक व्यक्ति ने बताया, ऑर्डर ब्रिटेन में पास किया गया है। सरकार के पास लंदन कमर्शल कोर्ट में अपील करने के लिए 14 दिनों का समय होगा। अंतरिक्ष ने पहले ही फ्रांस की कोर्ट, ट्राइब्यूनल डे ग्रांड इंस्टांस डे पेरिस में अपील दाखिल कर दी है। इस कोर्ट ने कंपनी के लोकल रेवेन्यू को जब्त करने का आदेश दिया था। मामले की सुनवाई नवंबर में होनी है।
इस बारे में देवास और अंतरिक्ष के अधिकारियों से संपर्क नहीं किया जा सका। देवास ने दो लॉन्च होने वाले सैटलाइट्स पर ट्रांसपॉन्डर कपैसिटी के लिए अंतरिक्ष के साथ 2005 में लगभग 30 करोड़ डॉलर (करीब 2 हजार करोड़ रुपये) की डील की थी। हालांकि, 2011 में देवास को सूचना दी गई कि यह कॉन्ट्रैक्ट रद्द कर दिया गया है क्योंकि उसे अलोकेट की जाने वाली एस-बैंड की 70 एमएचजेड फ्रीक्वेंसी डिफेंस, रेलवे और अन्य सरकारी उपक्रमों के लिए इस्तेमाल की जाएगी।
देवास ने इसे लेकर सरकार के खिलाफ एक इंटरनैशनल आर्बिट्रेशन का मामला दायर किया था और कंपनी को इसमें जीत मिली है। इंटरनैशनल कमर्शल कोर्ट ने उसे 18 पर्सेंट इंट्रेस्ट के साथ 67.2 करोड़ डॉलर का हर्जाना देने का आदेश दिया है। यह हर्जाना इंट्रेस्ट के साथ बढ़कर अब 75 करोड़ डॉलर (करीब 5 हजार करोड़ रुपये) का हो गया है। एक सूत्र ने बताया कि देवास के पास ऑर्डर को लागू कराने के लिए अमेरिका में कार्यवाही शुरू करने का विकल्प है।
भारत ने न्यू यॉर्क कन्वेंशन ऑफ आर्बिट्रेशन पर साइन किए हैं। इसके तहत 154 देशों में दिया गया कोई भी फैसला स्थानीय अदालतों की अनुमति के साथ अपने आप लागू करने योग्य हो जाता है। देवास जॉइंट वेंचर है और इसमें डोएचे टेलिकॉम, कोलंबिया कैपिटल और टेलिकॉम वेंचर्स का इन्वेस्टमेंट है। कोलंबिया कैपिटल और टेलिकॉम वेंचर्स ने मॉरीशस में स्थापित कंपनियों के जरिए देवास में इन्वेस्टमेंट किया था और इन दोनों ने कॉन्ट्रैक्ट रद्द करने को चुनौती देने के लिए भारत के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते का सहारा लिया है। अंतरिक्ष ने कहा था कि कॉन्ट्रैक्ट को पूरा करने की उसकी अक्षमता के लिए सरकार जिम्मेदार है।
कोर्ट ने कहा है कि कॉन्ट्रैक्ट साइन करने से उसे रद्द करने तक की पांच वर्ष की अवधि के दौरान वैल्यू में नुकसान के लिए देवास के शेयरहोल्डर्स को भुगतान करने के मकसद से भारत सरकार जिम्मेदार है। कोर्ट का कहना था कि कॉन्ट्रैक्ट रद्द करने के फैसले और वास्तविक नोटिफिकेशन के बीच अंतराल था और सरकार को इसके लिए नुकसान की भरपाई करनी चाहिए।

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