पलायन : देवताओं जुग जुग जीना प्रभो, जुग जुग जागृत रहना प्रभो। ’’

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पलायन:देवताओं आप सदैव मेरे पहाड़ पर ही रहना
पलायन:देवताओं आप सदैव मेरे पहाड़ पर ही रहना

‘‘ हे ! मेरे गांव घर के देवताओं आप सदैव मेरे पहाड़ पर ही रहना, यहाँ के लोगों की तरह पलायन न करना वरना कौन मेरे पहाड़ पर आयेगा। हे! देवताओं जुग जुग जीना प्रभो, जुग जुग जागृत रहना प्रभो। ’’

पहाड़ से सब पलायन कर रहे है, पलायन के इस रगड़-बगड़ में अच्छा हुआ पहाड़ के देवताओं ने पलायन नही किया। हमारे प्रवासी लोग ही नहीं गांव छोड़ कर कस्बों बाजारों में रह रहे लोगों को भी अब अपने गांव, घर की मिट्टी वापस नहीं बुलाती। देवताओं को पूजने के बहाने ही सही लोग अपने घर गांव कभी न कभी आ ही जाते है।

कौन लौटता है अब गांव की मिट्टी और बूढ़े माँ बाप की याद के आकर्षण में घर गांव। कभी खुशी तो कभी तमाम इलाज के बावजूद भी जब स्वस्थ नहीं होते या बरक्कत नही मिलती तब कोई कहता है कि घर गांव का देवता नाराज है, दोष लगा हुआ है, जाइये उसे पूजिये सब ठीक हो जायेगा। लोग इस बहाने ही सही घर और गांव लौटते है , देवता को पूजते है। गांव घर का देवता भले ही बड़े मंदिरों में न रहते हों, छोटे सी मनुडी में ही रहते हो, इनका इतना प्रभाव है कि वे ही अपने घर गांव से दूर गये और इन्हे भूल गए लोगों को ये देवता कभी न कभी वापस बुला लेते है।

धन्य हो मेरे घर गांव के देवताओं आपके बहाने ही सही लोग कभी न कभी अपने घर गांव वापस लौटते है, इसी बहाने घर की देहरी, नोले, पनघट , धारे , गांव की चौपाल जिसे बिसार दिया गया था, उनकी भी याद आ जाती है। हे मेरे गांव घर के देवताओं आप सदैव मेरे पहाड़ पर ही रहना, यहाँ के लोगों की तरह पलायन न करना वरना कौन मेरे पहाड़ पर आयेगा। हे देवताओं जुग जुग जीना प्रभो, जुग जुग जागृत रहना प्रभो। आप जागृत रहेंगे तो लोग घर आएंगे।
क्रांति भट्ट
मंदिर पथ गोपेश्वर उत्तराखंड

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