udaydinmaan, News Jagran, Danik Uttarakhand, Khabar Aaj Tak,Hindi News, Online hindi news कण-कण में देवताओं का वास » Hindi News, Latest Hindi news, Online hindi news, Hindi Paper, Jagran News, Uttarakhand online,Hindi News Paper, Live Hindi News in Hindi, न्यूज़ इन हिन्दी हिंदी खबर, Latest News in Hindi, हिंदी समाचार, ताजा खबर, न्यूज़ इन हिन्दी, News Portal, Hindi Samachar,उत्तराखंड ताजा समाचार, देहरादून ताजा खबर

कण-कण में देवताओं का वास

Spread the love

manani-maain
उत्तराखण्ड देवभूमि है । यहाँ कण-कण में देवताओं का वास हैं । यह अपनी देव संस्कृति,सांस्कृतिक पंरपराओं, देव उत्सवों व डोलियों संग यात्राओं अर्थात जातों के लिए भी जग प्रसिद्व हैं । पुराणों में उत्तराखण्ड हिमालय को देवाधिदेव भगवान षंकर व माँ भगवती की गृहभूमि माना जाता हैं । माँ भगवती षिव की षक्ति के रुप में स्थापित हैं। हिन्दुस्तान में माँ दुर्गा के विभन्न रूपों को अलग-अलग स्थानों पर भिन्न-भिन्न नामों से स्थापित कर पूजा की जाती है। अर्थात माँ भगवती उत्तराखण्ड हिमालयी क्षेत्र के गाँवो में पहाड़ की धियाण के रूप में पूर्ण भक्ति भाव एवं अनुश्ठान आयोजनों के साथ घर घर में पूजी जाती हैं । विष्व प्रसिद्व केदार घाटी में केदारनाथ धाम व आस पास का क्षेत्र ही नहीं बल्कि नंदा देवी षिखर की तलहटी में भगवती पराम्बाँ का नंदा रूप में पूजन अर्चन होता है ।
यूँ तो उत्तराखण्ड के पहाड़ी क्षेत्र में स्थित गाँवों से भगवती के विभन्न रूपों को देवरा यात्रा पर देवप्रयाग, गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ आदि स्थानों पर बडे धार्मिक उत्सव के रूप में महीनोे तक ले जाया जाता है और अंत में बडे़ अयुत यज्ञों के साथ विष्व कल्याण की प्रार्थना कर समापन किया जाता है। इसी प्रकार की एक प्राचीन,घार्मिक आध्यात्मिक पौराणिक ऐतिहासिक महत्व की सांस्कृतिक यात्रा उत्तराखण्ड की प्रसिद्व श्री नंदा राजरात है । प्राचीन समय से इस देव यात्रा को सम्पन कराने में गढ़वाल राजपरिवार की महत्वपूर्ण भूमिका रही है । इसीलिए इसे राजरात के रूप में पहचान मिली हाँलाकि इस यात्रा का प्रारम्भिक स्वरूप भी छोटा रहा होगा।
गढवाल की केदार व मध्यमहेष्वर घाटियाँ अपनी धार्मिक व सांस्कृतिक परमंपराओ के लिए जानी जाती हैं । यहाँ भी प्राचीन काल से ही भगवती माँ की पूजा पूरे विधि विधान व हर्शोल्लास के साथ की जाती है ।
कुछ स्थानों में जैसे कालीमठ में काली, राँसी में राकेष्वरी, ऊखीमठ में चामुण्डा, कालीषिला, सिलोंजामाई गुप्तकाषी में, ललितामाँ नाला में आदि। वहीं कुण्जेठी, मनसूना, कोटिमाहेष्वरी (खोनू) और राँसी में माँ भगवती की पूजा अर्चना मनणा माता के रूप में की जाती है। राँसी को छोडकर इन गाँवो में मनणी माईं के मंदिर भी विद्यमान हैं । जबकि राँसी में राकेष्वरी माता के मन्दिर में ही मनणी माई की पूजा होती है ।
वैसे माँ मनणा का मुख्य मंदिर मनणी नामक विषाल बुग्याल में केदारनाथ और मध्यमहेष्वर के बीच में मन्दानी नदी के तट पर स्थित है । समुद्र तल से जिसकी ऊँचाई लगभग 14 हजार फीट है । यह स्थान हिमबुक से लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर विषाल हिमालय की तलहटी में है । यह चौखम्बा के बाँयी ओर व केदार पीक के दाँयी ओर के हिमालय की तलहटी में है । मनणा धाम का बुग्याल कई वर्ग किमी. में फैला हुआ है हालाँकि 2013 की आपदा में मंदानी नदी ने बुग्याल को काफी नुकसान पहुँचाया है । माँ का मंदिर बुग्याल के बीचों बीच हल्के टापू पे बना है । मंदिर के दक्षिण तथा पीछे की ओर के मैदान को देखने से प्रतीत होता है कि कभी प्रकृति ने सदियों पूर्व इस पवित्र स्थान पर भी 2013 की केदार आपदा की तरह कहर बरपा होगा। मन्दिर के पीछे की ओर के मैदान में भूस्खलन के लक्षण साफ झलकते हैं । मन्दिर के चारों ओर विखरे सुन्दर व तरासे गये बडे़-बडे़ प्रस्तर खण्ड व मन्दिर का आगे की ओर धंसा (झुका) होना इसका संकेत देता है ।
वैसे तो मंदिर के पास बाँयी ओर जल धारा के भी प्रमाण हैं। यहाँ पर जल धारा अर्थात मंगरा, का मुख मगरमच्छ का है जिसमें अब पानी नहीं है। लगता है मंदिर के पीछे के भूस्खलन में यह पानी का स्रोत भी बन्द हो गया। जबकि मंदिर के पीछे आधा किमी की दूरी पर एक और बुग्याल स्थित है। जो कि काफी ऊँचाई पर है और उसके पीछे फिर ऊँचे- ऊँचे पहाड़ हैं इसी बुग्याल में हिमालय की ओर से प्राकृतिक नहर पूरे मनणा धाम के समानान्तर बह रही है। ऐसा लगता है कि वह इस स्थान के लिए पानी का स्रोत रहा होगा। हालाँकि मंदिर के उत्तर की ओर हिमालय की तरफ मैदान मे पानी के कई स्रोतांे से छोटे-छोटे तालाब भरे रहते हैं जिस कारण वहाँ दलदल भी है। वैसे मंदिर के सामने ही 200 मी0 की दूरी पर मंदानी नदी भी प्रवाहित हो रही है और यहीें से मंदिर पहुँचने वाले श्रृद्धालु एवं भेड़ पालक पानी का उपयोग करते हैं।
मंदिर के उत्तर में लगभग 2 किमी की दूरी पर विषाल हिमालय खड़ा है। जिस पर षेशनाग की आकृति श्रृद्धालुओं को अपनी ओर आकर्शित करती है। मान्यता है कि इसी इसी हिमालय की जड़ में माँ भगवती सहित सभी देवी-देवताओं का भण्डार है। जहाँ सतऔशधि का स्रोत भी है। माना जाता है कि इस सत औशधि में अमरता की षक्ति थी। इसी को पाने के लिए महिशासुर हिमालय की ओर जा रहा था और वहीं दलदल में फँसकर माँ भगवती द्वारा इस राक्षस का अंत किया गया। आज भी केदारघाटी सहित दूर-दूर के मंदिरों में पूजा अर्चना के लिए इस स्थान से ही विषेश विधि व नियमों को मानते हुए सत औशधि निकाली जाती है।
मंदिर के सामने कल-कल करती मंदानी नदी मानो इस वीराने में माँ मनणा के चरणों को पखारती हो और श्रद्धालुओं की अनुपस्थिति में माँ की सेवा में रहती है। मंदानी के दूसरी ओर भी विषाल बुग्याल हैं जो कि मनणी धाम की विषालता को और अधिक विस्तृत कर लेते हैं। मंदिर के उत्तर में विषाल मैदान में कई आकृतियां व कुण्ड हैं कहीं पद विषाल खड्ग की आकृति के कुण्ड तो कहीं घास पर षेर आदि की आकृतियां प्रतीत होती हैं। मंदिर के आस-पास वैसे वृक्ष नहीं हैं परन्तु नदी के दूसरी ओर दक्षिण दिषा में काफी दूर जाकर कई प्रजाति के वृक्ष हैं। जहाँ से श्रद्ध्लुओं भोजन बनाने के लिए लकड़ी का इंतजाम करते हैं।
मंदिर का निर्माण:- मंदिर का निर्माण बड़े-बड़े सुंदर तराषे गये पत्थरों से किया गया है। मंदिर आज अपूर्ण दषा में है। लगता है मंदिर कभी भूस्खलन की चपेट में आया होगा। मंदिर के चारों ओर बड़े-बड़े तरासे प्रस्तर खण्ड मंदिर के वैभव को बयान करते हैं। मंदिर के गर्भ गृह में प्राचीन महिशासुर षिला के ऊपर माँ महिश मर्दिनी की दिव्य मूर्ति विराजमान है। इस प्रधान मूर्ति के दक्षिण में श्री गणेष जी व षिव पार्वती की दो मूर्तियां हैं जबकि उत्तर की ओर एक और मूर्ति विराजमान है जो देखने में पुरुश देवता की लगती है। उस मूर्ति पर अन्य आकृतियां भी हैं। मंदिर के पुजारी के अनुसार वह भी भगवती का ही रूप है। इसके अतिरिक्ति अन्य लिंग एवं धातु के मुखौटे भी हैैं मंदिर के आगे भी छोटा सा वनदेवताओं का मंदिर क्षतिग्रस्त स्थिति में है। जबकि उत्तर की ओर स्थित षिला में भैरव व दैत्य की पूजा होती है। मंदिर में भक्तों द्वारा त्रिषूल, घंटियां आदि निषान भी चढ़ायें गये हैं
क्या कहते हैं पुरातत्व वेत्ताः- श्रीकृश्ण संग्रहालय, कुरुक्षेत्र के क्यूरेटर प्रसिद्ध पुरातत्वविद् एवं भूगर्भ विज्ञानी श्री राजेन्द्र सिंह राणा का कहना है कि मूर्तियों व मंदिर निर्माण में प्रयुक्त पत्थरों के चित्रों को देखकर यह लग रहा है कि यह मंदिर लगभग बारहवीं सदी का रहा होगा उन्होने बताया कि मुख्य मूर्ति पर भी कुछ लिखा हुआ हैं जिसको पढ़ने से मूर्ति के बारे में और अधिक स्पश्ट हो जायेगा। फिर भी पुरातत्व विभाग यदि मनणी जाकर सही प्रकार की खोज करे तो सत्यता प्रमाणित हो सकती है। उनका कहना है कि उत्तराखण्ड सरकार को इस प्रसिद्ध मंदिर के विकास एवं इतिहास को जानने के लिए आगे आना होगा और वहाँ पुरातत्व विभाग की टीम को भेजना चाहिए।
क्या कहते हैं पुजारीः-
राँसी निवासी मनणा के पुजारी 65 वर्शीय भगवती प्रसाद भट्ट कहते है कि बचपन से उन्होंने अपने पिताजी व दादाजी को राँसी से मनणा आकर पूजते देखा है। उनके दो थोक (परिवार) हैं जो मनणा और राँसी स्थित राकेष्वरी माई की बारी-बारी पूजा करते हैं। उन्होंने बताया कि प्राचीन परंपरा के अनुसार प्रति वर्श सावन के महीने राँसी के ग्रामीणों द्वारा पुजारियों की अगवानी में मनणा की मूर्तियों को राँसी मंदिर से मनणी धाम लाकर पूजा जाता हैं जिसमें कि पुजारी सहित दो-चार लोग ही भाग लेते थे परन्तु 2010 से गुप्तकाषी स्थित जीवन निर्माण एजुकेषन सोसाइटी के प्रयासों से इसे भव्य जात (यात्रा) के रूप में संचालित किया गया। उनके प्रयासो से ही इस दुर्लभ षक्तिपीठ पर एक साथ 100 से अधिक यात्रियों ने माँ मनणा के दर्षन किये।
सितम्बर 2016 में पुनः जीवन निर्माण एजुकेषन सोसाइटी द्वारा गुप्तकाषी से कालीमठ, चौमासी होते हुए मनणी धाम के लिए 9 दिवसीय चण्डी पाठ एवं सकलीकरण अनुश्ठान यात्रा का आयोजन किया जिसमें लगभग 55 सदस्यों के दल में श्रेश्ठ, ब्राह्मण आचार्यांे, पुजारियों व तीर्थ पुरोहितों की मण्डली द्वारा तीन दिवस धाम में रहकर चण्डी, रूद्री, षिवाश्टक, विश्णु सहस्रनाम, महाविद्या, पाठ, जलयात्रा, यज्ञ एवं षकलीकरण पूजन कर माँ की आराधना की।
स्कन्द पुराण के केदार खण्ड में वर्णन:- केदारखण्ड में कालीतीर्थ महत्व तथा रणमण्डना महादेवी नामक षीर्शक के तहत इस धाम का वर्णन मिलता है। वर्णन है कि इस स्थान का स्मरण मात्र ही प्रत्यक्ष फल दिया है। यदि कोई मनुश्य इस स्थान पर पहुँचकर भक्ति भाव पूर्वक भगवती का पूजन करता है उसे रूद्र लोक की प्राप्ति होती है। सैकड़ों वर्श तप के पुण्य का लाभ यहाँ तीन रात्रि निवास करने के बराबर है।
इस स्थान पर स्वर्ण, भूमि, धेनु आदि दान देने का भी अभीश्ट फल है। इसी स्थान पर ब्रह्मा आदि देवताओं को परम सिद्धि की प्राप्ति हुई थी । इस स्थान पर नदी में स्नान करके पितृगण, देवगण, और ऋशियों को तृप्त करने से सम्पूर्ण जगत तृत्त हो जाता है और पित्रों का उद्धार हो जाता है, इस स्थान पर प्राणों का परित्याग काषी में मरने व गया में श्राद्ध के समान है और वह जीवन मृत्यु के बन्धन से मुक्त हो जाता है ।
सघन जंगल, जड़ी – बूटियाँ व औशधियों का भण्डार:- यहाँ हिमालय की गोद में अत्यंत स्वच्छ और पवित्र स्थान व आसपास के बुग्यालों में अनेकों प्रकार की जड़ी- बूटियों और औशधियाँ सुंदर घास, व वनस्पतियाँ हैं समय-समय पर ऋतुओं व तापमान के हिसाब से अनेकों प्रजाति के पुश्प खिलने से इस बुग्यालों की छटा धरती पर स्वर्ग का बोध कराती है।
इस ऊँचाई पर सफेद रंग के बुराँस भी अपनी ओर आकर्शित करते हैं। इस मार्ग में बाँज, बुराँस, नेर, थुनेर, खर्सू, मोरू, देवदार, आदि के साथ भोज पत्र के सघन जंगल हैं जो ऊँचाई बढ़ने के साथ समाप्त हो जाते हैं। फिर खड़ील अर्थात लम्बी घास के बुग्याल षुरू हो जाते हैं , और एक निष्चित ऊँचाई के उपराँत इस घास के स्थान पर ममच्याण अर्थात मछली की गंध जैसे घास के बुग्याल मिलते हैं ।
और फिर आगे कुखड़ी, जटामासी, जया-विजया, काँथला, बज्रदंती, मीठाजड़ी, ब्रह्मकमल, फेन कमल, सूर्य मुखी, इन्द्र जौ, कुटकी (कड़वी), अतीस, भूतकेषी, सालममिश्री, गरुड़पंजा, पाशाणवेद आदि अनेकों औशधियों के भण्डार भरे हैं। इसी मार्ग में दगला नामक स्थान पर श्रावण मास की आमावस्या को अनेकों जड़ी-बूटियाँ प्रकाष मान होकर स्वंय अपना परिचय भी देती हैैं । आज भी यदि कुश्ठ जैसे चर्म रोगों से ग्रसित व्यक्ति इस स्थान पर नग्न होकर दलदल में स्नान करता है तो उसे उन रोगों से मुक्ति मिल जाती है। ऐसे कई उदाहरण हैं जिन्हांेने इस स्थान पर पहुँचकर अपने रोगों से मुक्ति पायी ।

मनणी धाम में चण्डी पाठ एवं सकलीकरण अनुश्ठान यात्राः-
जीवन निर्माण एजुकेषन सोसाइटी के तत्वाधान में डॉ. जैक्स वीन नेषनल स्कूल के सहयोग से मनणीधाम के लिए 9 दिवसीय चण्डी पाठ एवं सकलीकरण अनुश्ठान यात्रा का आयोजन किया गया इस यात्रा में 55 लोगों के दल ने प्रतिभाग किया । यह यात्रा विष्वनाथ मन्दिर गुप्तकाषी से प्रारम्भ होकर, कालीमठ, रूच्छ, चामुण्डा होते हुए पहली रात्रि विश्राम के लिए चौमासी पहुँची, यहाँ पर निबतर प्राथमिक विद्यालय में ग्रामीणों द्वारा यात्रियों के भोजन व रहने की व्यवस्था की गई थी, इसके अलावा ग्रामीणों द्वारा अनेकों यात्रियों को अपने घर ले जाकर भी खाने व रहने का बहुत संुदर इंतजाम किया गया । दूसरे दिन यात्रा निबतर से खाम बुग्याल के लिए रवाना हुई इस अवसर पर चौमासी के ग्रामीणों व प्रधान श्री ………………………………. ने यात्रा की सफलता के लिए षुभकामनायें प्रदान की । चौमासी से खाम तक लगभग 15 किमी. की दूरी के बीच कई सुन्दर पड़ाव एवं खर्क हैं, जिनमें सबसे पहले खुड़म खर्क पड़ता है जो कि खड़ील क्षेत्र है, इसी स्थान पर चौमासी और आसपास के गाँवों की भेड़-बकरियों का लौ अर्थात ऊन उतारने का त्यौहार हर वर्श मनाया जाता है । इसके उपराँन्त कला चाैंरी नामक स्थान है, ग्रामीणों का मानना है कि गढ़वाल पर आक्रमण के दौरान यहाँ आतताइयों के हथियार छूटे थे। फिर पयालू है जहाँ ग्रामीणों की छानियाँ हैं यहाँ लोग अपने पालतू पषुओं के साथ रहते हैं। इस स्थान पर लोगों ने भी अपनी सामर्थ्यानुसार यात्रियों की सेवा की और अपने दःुख दर्द भी बाँटे आगे बढ़ने पर कई खर्क पड़े परन्तु छीपी व ल्यनडवाँणा के खर्कों पर पालसियों (भेड़पालकों) ने यात्रा का स्वागत किया कई यात्रियों ने जलपान के साथ यहाँ भोजन भी किया। भेड़-बकरियों के छोटे-छोटे बच्चों को कूड़े अर्थात भेड़पालकों के टेंटों मे सुरक्षित रख गया देखकर सभी लोगों का कौतुहल बना रहा। वहीं भोटिया कुत्तों को भेड़ों के बड़े-बड़े झुण्डों को देखना और पालसी की एक सीटी पर एकत्रित होना बहुत ही मनोहारी था । आगे बढ़ते हुए मार्ग में थुनेर बाग, गौला, खैडोरा आदि स्थानों से होते हुए यात्रा का दूसरा पड़ाव खाम आया। यहीें कार्यकर्ताओं द्वारा टंेट लगाकर रहने-खाने की व्यवस्था की गई। यहाँ पहुँचते-2 सभी लोग काफी थक चुके थे । इसलिए यहीं पर रात्रि विश्राम हुआ। कई दर्जन घोड़े भी इस पयार (क्षेत्र) में देखने को मिले क्योंकि घाटी के गाँवों से यहाँ घोड़े-खच्चर भी चुगान के लिए छोड़ दिये जाते हैं। वैसे अकेले ये पषु भी रात्रि के समय स्वंय एक ही स्थान पर एकत्रित होते देखे गये जिससे लगता है कि पषुओं में भी अपनी सुरक्षा का बोध होता है।
यात्रा के तीसरे दिन खाम बुग्याल में काली नदी के तट पर श्रद्धालुओं व ब्राह्मणों द्वारा स्नान कर देवी- देवताओं की पूजा अर्चना की गई। तदोपराँत सुबह का नाष्ता कर यात्रा आगे बढ़ी, कुछ दूरी पर बाँयी ओर विषाल षिला के ऊपर इस क्षेत्र के आराध्य देव चणनाख (भैरव) की पूजा कर पताका फहराई गई। आपदा से पूर्व रहने के लिए लोग इसी षिला के नीचे बनी गुफाओं का उपयोग करते थे। कुछ ही दूरी चलने पर विषाल गगन चुम्भी पर्वत पर 5 पाण्डव खेालियाँ के दर्षन हुए जिन्हें द्वार कहते हैं। माना जाता हैं कि इन्हीं द्वारों (खोलियों) से पाण्डव श्री केदारनाथ के लिए गये थे। वैसे भी ठीक इसी पर्वत के पीछे की ओर श्री केदार धाम में भगवान रूद्र विराजमान हैं। इन खोलियों पर महिलाओं की आकृतियाँ भी प्रतीत होती हैं जिन्हें स्थानीय लोग कुन्ती व द्रौपदी के साक्षी मानते हैं। इस पर्वत से कई जलधारायें भी निकलती हैं जो कि अधिकतर बरसाती प्रतीत होती हैं। इस स्थान से ज्योंही इस छोटी चढ़ाई को चढ़कर ऊपर चोटी पर पहँुचे सामने षुभ्र हिमालय जैसे यात्रियों के स्वागत में खड़ा हो यहाँ से पहली बार इस यात्रा के दौरान नदी के उद्गम स्थान से रूबरू हुए जो कि हम से कुछ ही दूरी पर स्थित था। आगे बढ़कर सभी यात्रियों ने भ्वींता (लकड़ी के कच्चे पुल) के सहारे नदी को पार किया। वैसे इस नदी का स्पान भी 2013 की आपदा के कारण बहुत अधिक बड़ा हुआ है। फिर बीच में एक टापू को चढ़ने के बाद उतरकर दूसरी ओर झरने को पार कर धीरे-धीरे सिमतोली की खड़ी चढा़ई पर सभी ने अपनी जान लगा दी। कुछ लोगों ने बल्द जोतियां अर्थात भीम के दो जुते बैलों की तरह दो विषाल षिलाओं के दर्षन कराये। जैसे-तैसे इस खड़ी चढा़ई को पार करने के बाद छोटा षिला समुद्र आया जहाँ से ब्रह्मकमलों के दर्षन होने लगे। बस अब सभी लोग अंदाजे से ऊपर की ओर चढ़े क्योेंकि अधिकांष कार्यकर्ता टेंट आदि सामान को सुखाने के बाद ही पिछले पड़ाव से चल रहे थे जिस कारण गाइड आदि सहयोगी काफी पीछे थे। हमारे साथ बन विभाग की टीम व कुछ रास्ते के जानकार अगवानी कर गाइडों की कमी महसूस नहीं होने दे रहे थे। वैसे रास्ते में गाइड आदि कार्यकर्ता भी तेजी से चलकर हमें पकड़ लेते। बस सिमतोली धार पहँुचने पर ऐसा लगा जैसे सारी चढ़ाई पार कर ली है। इस स्थान की ऊँचाई लगभग 14 हजार फीट रही होगी। यहाँ पहँुचकर अधिकतर यात्रियों ने सुबह के तैयार भोजन पैकेटों से भूख मिटाई परन्तु अब कहीं आसपास पानी नहीं था।
यहाँ से प्रकृति के नजारे अत्यंत ही दर्षनीय थे। कुछ आराम के बाद गाइड ने आगे बढ़ने के लिए कहा। सभी ने आज मनणी धाम पहुँचने का निष्चिय किया था। अब इस बुग्याल के दूसरी ओर उतरते हुए बिना रास्ते के घास के सहारे सभी आगे बढ़ने लगे। कई उतार-चढ़ाव से भरे पर्वतों पर चलकर भंडार नामक स्थान पर पहुँचे जो काफी समतल है जिसके बीचोंबीच छोटी जलधारा प्रवाहित हो रही है। लगभग सभी यात्रियों के इस स्थान पर पहँुचने पर आगे बढ़ने का निर्णय लिया गया कुछ लोग काफी दूर तक चले भी गये थे परन्तु अचानक यात्रा के संयोजक ने समय को देखते हुए वापस भंडार में ही रहने की घोशणा की जिस पर अधिकांष यात्री भड़क उठे। फिर भी यही अंतिम निर्णय मानकर सभी यात्री वापस भंडार पहुँचे। इस स्थान सबसे अधिक समस्या लकडि़यों की है जिसका इंतजाम कार्यकर्ताओं द्वारा दो-तीन किमी दूर से करना पड़ा। आखिर कठिन परिश्रम एवं कम लकडि़यों की मदद से रात्रि का भोजन तैयार किया गया। आज मनणी जाने की इच्छा पूर्ण नहीं हो पायी।
चौथे दिन पुनः प्रातः कार्यकर्ताओं एवं गाइड द्वारा यह बताने पर कि मनणी धाम 2-3 घंटे का रास्ता है सभी यात्री व्रत के साथ चलने को राजी हो गये। अब जैसे-जैसे यात्रा आगे बढ़ती रही दो तीन घंटे गुजर गये परन्तु मनणी धाम का कहीं अता-पता नहीं लगा। ऊँचे-ऊँचेे पर्वतों पर घास के सहारे आगे रेंगते हुए यात्रियों को नीचे की ओर जमीन और ऊपर की ओर आसमान कहीं नजर नहीं आ रहा था तो माँ मनणा का नाम जपते-जपते सिर्फ अपने पैरांे के आगे की जमीन पर ही नजर गढ़ाये हुए आगे बढ़ते रहे। इस बीच डेलधार, घुघती आदि खड़े बुग्यालों को भूखे पेट माँ की कृपा से पार करने में सभी यात्री सफल रहे परन्तु रास्ता न होने के कारण यात्री दो टोलियों में बँट गये। क्योंकि मनणा धाम नदी के किनारे है इसलिये जिन यात्रियों ने नीचे की ओर रुख किया वे दूसरी टोली से काफी आसानी से धाम की ओर बढ़े। आखिर सात-आठ घंटों की कठिन एवं साहसिक यात्रा के उपरान्त वह घड़ी आ गई जब सभी यात्री मनणी माँ के दर पर पहुँचे। धाम की सुंदरता एवं माँ की षक्ति से मार्ग में आयी कठिन विपत्ति को सभी यात्री भूल चुके थे। विधिवत् स्नान आदि के बाद पुजारी द्वारा मंदिर के गर्भगृह के पट खोले गये। सभी श्रद्धालुओं और ब्रह्ममंडली द्वारा इस कलयुग में पहली बार मंत्रोच्चारण के साथ तीन दिवसीय चण्डी पाठ एवं सकलीकरण अनुश्ठान प्रारम्भ किया गया।
आयोजकों का मत:- वर्श 2010 से श्री मनणा षक्तिपीठ धाम में धार्मिक व साहसिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए जीवन निर्माण एजुकेषन सोसाइटी एवं डॉ0 जैक्स वीन नेषनल स्कूल गुप्तकाषी प्रयासरत हैं। सोसाइटी के चेयरमैन लखपत राणा ने बताया कि वर्श 2008 में मनणा धाम के बारे में उन्हें सामाजिक कार्यकर्ता आत्माराम बहुगुणा द्वारा बताया गया था। इस जानकारी के आधार पर राँसी गाँव के ग्रामीणों से वार्ता करने पर वे राजी हुए और पहली बार प्रसिद्ध गढ़कवि नरेन्द्र सिंह नेगी व हजारों ग्रामीणों की उपस्थिति में 18 जुलाई 2010 को पहली बार मनणी धाम के लिए भव्य मनणा यात्रा निकाली गई थी। इस यात्रा के सफल संचालन एवं पहचान के लिए जीवन निर्माण एजुकेषन सोसाइटी के द्वारा श्री मनणा माई जात/यात्रा सेवा समिति के नाम से राँसी के ग्रामीणों की सुविधा के लिए संस्था का भी विधिवत् पंजीकरण किया गया है।

Leave a Reply

Your email address will not be published.

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.