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खूनी जमीन का करेंगे क्या किसान?

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INDIA - AUGUST 26:  Indian police patrol in front of the unfinished Tata Nano plant during a protest in Singur, India, on Tuesday, Aug. 26, 2008. West Bengal Chief Minister Buddhadeb Bhattacharjee said his government may compensate farmers at Tata Motors Ltd.'s factory in the Indian state to resolve a dispute that threatens production of the $2,500 Nano car.  (Photo by Prashanth Vishwanathan/Bloomberg via Getty Images)

मोहम्मद सफ़ी शम्सी

सिंगूर। कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता! कहीं ज़मीन नहीं तो कहीं आसमान नहीं मिलता! कोलकाता से 45 किमी दूर स्थित है सिंगूर। वो स्थान जो पश्चिम बंगाल को उद्योग जगत में एक ऊंचा मुक़ाम दिलाने वाला था। 2006 में, उस वक़्त की वाम-फ्रंट सरकार ने सोचा कि टाटा की छोटी-गाड़ी के कारखाने के लिए यहां की ज़मीन देना उचित है। पर अब दस साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में इस ज़मीन अधिग्रहणको ही गैर-कानूनी ठहरा दिया है।सिंगूर की इस तकरीबन 1,000 एकड़ ज़मीन पर अब भी फैक्ट्री-शेड-नुमा ढांचा खड़ा है। कहीं ऊबड़-खाबड़ ज़मीन है तो कहीं लंबी घांस उग आई है। एक दीवार ने इस तिलस्मी-स्वप्न को मानो दस साल के लिए कैद कर रखा हो।सिंगूर से आरंभ हुआ ममता बनर्जी का ज़मीन से जुड़ा आंदोलन। इसमें जुड़े नंदीग्रामऔर लालगढ़ भी। और इसी सिंगूर के दम पर ममता ने 2011 के चुनावों में वाम-सरकार को जड़ों से उखाड़ फेंका। पर अब दस साल बाद सिंगूर की गलियां कुछ बदल चुकी हैं। टाटा-साइट के पीछे दीवार ले लगे मोहल्लों में अब काफी पक्के-मकान हैं। पतली लेकिन पक्की सड़कें हैं। किसान हैं, जिन्होंने मुआवजा लिया और वो भी जिन्होंने मुआवजे को नकार दिया। अब कोर्ट के फैसले के बाद, फिर एक हलचल है। मानो वही दिन, आंदोलन वाले वापस लौट आए हों। जश्न भी ख्यालों में है। यादें भी।करीब 80 बरस के हो चुके बसुदेब दास के एक भाई और पांच बहनें हैं। 7 बीघा ज़मीन वापस मिलने की उम्मीद भी है। पर… क्या हल चल पायेगा? क्या ज़मीन पर फिर से उसी तरह से फसलें होंगी? आशा है…होंगी! पर, सैफुल… जिसके पिता ने ज़मीन दी थी, को लगता है कि अब इस ज़मीन का इस्तेमाल कल-कारखानों के लिए ही किया जा सकेगा।वैसे, सिंगूर के तब से अबतक बदलने के दौरान बहुत कुछ बदल भी चुका है। माटी के आंदोलन से जुड़े कई लोग अब गाड़ियों में घूम रहे हैं। वहीं, जमीनें बेचकर गाड़ियां खरीदने वाले लोग अब पैदल हो चले हैं। पर जिन किसानों ने न तो जमीनें बेचीं, न ही उन्हें खेती करने दिया गया। वो तबाही की हालत में हैं। कल जिस जमीन पर बंपर फसल होती थी, अब उसमें फसल होगी, इस बात पर बड़ा प्रश्नचिह्न लग चुका है। कभी गिट्टियों और मोरंगों के साथ सीमेंट पर कोई फसल उगी है?बहरहाल, किसान तो बर्बाद हुए ही हैं, साथ ही अब सिंगूर भी जो आबाद होने के सपने देखने लगा था वो उजाड़ हो चला है। सिंगूर तो अब सिर्फ हमेशा के लिए बंगाल के इतिहास का न-भुलाया जा सकने वाला अंश मात्र बन कर रहा है।

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