राज्य बना, लेकिन अभी तक नहीं बन पायी उत्तराखंड की स्थायी राजधानी

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गैरसैंण
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उत्तराखंड राज्य बनने के साथ ही राजधानी का विवाद शुरू हो गया था। इसके पीछे भाजपा और कांग्रेस की पहाड़ विरोधी मानसिकता और दोनों दलों के स्थानीय नेताओं का जरूरत से ज्यादा हाईकमान पर निर्भर रहना था। कांग्रेस तो घोषित रूप से अलग राज्य की विरोधी थी ही भाजपा ने भी इस मुद्दे को किसी वैचारिक आधार पर नहीं बल्कि रणनीतिक तौर पर ही उठाया था।

यही वजह है कि राज्य आंदोलन में उसने उत्तराखंड के स्थान पर उत्तरांचल को प्राथमिकता दी। मामला केवल नाम का नहीं बल्कि उसके साथ जुड़े सामाजिक और सांस्कृतिक सरोकारों का भी था। उत्तराखंड जहां पर्वतीय राज्य की कल्पना करता था, वहीं उत्तरांचल पर्वतीय लोगों की पहचान खत्म करने का ही एक षड्यंत्र था। यह शब्द भाजपा के हिंदूत्ववादी दृदृष्टिकोण देवभूमि का ही पर्याय भर था। यह षड्यंत्र राज्य गठन के समय सामने भी आ गया। भाजपा ने राज्य गठन में पहाड़ी राज्य की अवधारणा की भूण हत्या तब कर दी, जब उसने पहाड़ और मैदान के संतुलन के नाम पर हरिद्वार को इसमें शामिल कर दिया।

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देहरादून में 9 नवंबर, 2000 को राज्य गठन के बाद पहली सरकार शपथ ले रही थी तो कुछ उत्तराखंड के आंदोलनकारी गैरसैण में सभा कर रहे थे। वे मांग कर रहे थे कि जनभावनाओं के अनुरूप देहरादून की जगह गैरसैण को नए राजधानी घोषित किया जाए। तब से अब तक पहाड़ी जनभावनाएं गैरसैण को राजधानी बनाने की मांग पर कायम हैं और उत्तराखंड की सरकार अस्थाई राजधानी देहरादून से चल रही है। इधर, उत्तराखंड में आजकल भाजपा और कांग्रेस के बीच राजधानी-राजधानी का खेल खूब जोरों पर चल रहा है। दोनों ही दल जनभावनाओं को भुनाने के लिए राजधानी के मुद्दे को हवा देने में लगे हैं। राजधानी के बहाने भाजपा और कांग्रेस खुद को पहाड़ का सबसे बड़ा हितैषी साबित करना चाहते हैं। राजधानी के मामले में सबसे बड़ा आश्चर्य क्षेत्रीय पार्टी उत्तराखंड क्रांति दल की निष्क्रियता को लेकर हो रहा है, जो इस परिदृष्य में कहीं भी नहीं दिखाई दे रही है।

आज स्थिति यह है कि अकेले हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर से कुल विधायकों का लगभग 28 प्रतिशत चुनकर आता है। यदि इसमें देहरादून और नैनीताल जैसे अर्ध पहाड़ी जिलों के मैदानी इलाकों को जोड़ दिए जाए तो यह प्रतिशत 47 के पास पहुंच जाता है। दूसरे, भाजपा ने राज्य का मुद्दा राजनीतिक मजबूरी के चलते रणनीतिक कारणों से उठाया था तो वह राजधानी के सवाल पर लगातार चुप रही। यहां तक कि उत्तराखंड के साथ बने झारखंड और छत्तीसगढ़ के लिए तो राजधानी निर्धारित कर दी गई लेकिन उत्तराखंड राज्य गठन विधेयक में भी राजधानी का कोई जिक्र नहीं था। इसकी जिम्मेदारी नए राज्य की सरकार पर सौंप दी गई।

जबकि मुलायम सिंह के दौर में अलग राज्य के लिए बनी रमाशंकर कौशिक मंत्रिमंडलीय कमेटी की रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया था कि उत्तराखंड के अधिकांश लोग गैरसैण को राजधानी बनाने के पक्ष में हैं। इतना ही नहीं उत्तराखंड में राज्य के प्रति गंभीरता दिखाने के लिए उत्तर प्रदेश की कल्याण सिंह सरकार ने 1991 में गैरसैण में शिक्षा निदेशक पर्वतीय का कार्यालय खोला था और उसकी कुछ बैठकें भी वहां हुई थीं लेकिन यह कितना गंभीर था इसका पता इससे चलता है कि वहां नियुक्त निदेशक का वेतन दो साल बाद राज्यपाल मोतीलाल बोरा के दौर में निकला। जनवरी, 1993 में उत्तराखंड क्रांति दल ने गैरसैण में चंद्र सिंह नगर के नाम पर राजधानी का पत्थर भी लगा दिया था। राज्य आंदोलन के दौरान भी गैरसैण को राजधानी बनाने की लगातार मांग की जाती रही।

इस पर कभी किसी दल को आपत्ति नहीं हुई।बिना राजधानी का राज्य का विधेयक पारित होने के बाद राजधानी खोजनी शुरू की। अंतरिम सरकार में बहुमत भाजपा के पास था और वे राज्य बनने से इतने अभिभूत थे कि उन्हें कुछ सूझ ही नहीं रहा था। उसमें भी अधिकांश का शासन चलाने से कभी वास्ता पड़ा ही नहीं था। इसलिए सत्ता की कमान पूरी तरह से नौकरशाहों के हाथ थी, जो लखनऊ के तौर-तरीकों में रची-बसी थी। नौकरशाहों ने देहरादून को अस्थाई राजधानी घोषित करवा दिया और अंतरिम सरकार के नेता मान गए।

देहरादून को अस्थाई राजधानी बनाने का विरोध शुरू हो गया। इधर, अंतरिम सरकार राजधानी के विशय पर कोई निर्णय नहीं ले पा रही थी। क्योंकि देहरादून और मैदानी जिलों का देहरादून से राजधानी न हटाने का दबाव था। दूसरी ओर तमाम आंदोलनकारी और कुछ राजनीतिक संगठन गैरसैण के लिए आंदोलन करने लगे। इस तरह के परस्पर विरोधी मामले को शांत करने के लिए सरकारें आयोग का सहारा लेती हैं। नित्यानंद स्वामी सरकार ने भी यही किया और 11 जनवरी, 2001 को सेवानिवृत न्यायाधीश दीक्षित के नेतृत्व में एक सदस्यीय राजधानी चयन आयोग बना दिया। इसे छह माह में रिपोर्ट देनी थी। तात्कालिक तौर पर राजधानी का मामला ठंडे बस्ते में चला भी गया। जिस राजधानी चयन आयोग को अपनी रिपोर्ट छह माह में देनी थी, उसका कार्यकाल बढ़ता चला गया। दीक्षित आयोग का कार्यकाल 17 बार बढ़ाया गया और अंत में इसने जुलाई, 2009 में अपनी रिपोर्ट दी।

इसकी रिपोर्ट में राजधानी के लिए देहरादून को सबसे उपयुक्त स्थल बताया गया। इस बीच गैरसैण को राजधानी बनाने के लिए बाबा उत्तराखंडी ने आमरण अनशन किया और 9 अगस्त, 2008 को उनकी मृत्यु भी हो गई। उत्तराखंड महिला मंच ने भी इस मांग को लेकर आमरण अनशन किया। दीक्षित रिपोर्ट के बाद भी राजधानी का मामला शांत नहीं हुआ। इधर, सरकारें अस्थाई राजधानी में स्थाई व्यवस्थाएं करती रहीं। राजधानी को लेकर एक नया विचार दिया जाने लगा कि प्रदेश में शीतकालीन और ग्रीष्मकालीन दो राजधानियां बना दी जाएं। लोकसभा चुनाव से पहले इस मांग के सबसे बड़े समर्थक कांग्रेसी नेता थे। उनमें भी सतपाल महाराज का नाम सबसे आगे था। कारण यह था कि गैरसैण सतपाल महाराज के लोकसभा क्षेत्र में आता था।लोकसभा चुनाव में भाजपा की बुरी तरह पराजय के बाद भी भाजपा ने राजधानी के मुद्दे पर गंभीरता नहीं दिखाई। भाजपा अपनी आंतरिक गुटबाजी में बुरी तरह उलझी रही।
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विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की जीत के बाद यह मामला फिर से सुर्खियों में आने लगा। इस बार भी कांग्रेस की ओर से कमान सतपाल महाराज के हाथ ही रही। उन्होंने कोशिश की कि गैरसैण में कम से कम कैबिनेट की बैठक हो जाए। यह बात टिहरी उपचुनाव से पहले जोरों से उठाई गई। टिहरी उपचुनाव में मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के इस्तीफा देने के बाद उनके बेटे साकेत ने चुनाव लड़ा था।

लेकिन वह हार गए। पहले दो अक्टूबर को कैबिनेट की बैठक होनी थी लेकिन चुनावी आचार संहिता के कारण इसे नौ नवंबर, राज्य स्थापना के दिन तक स्थगित कर दिया गया। खैर नौ नवंबर को गैरसैण में बहुगुणा सरकार की कैबिनेट बैठी। पूरी कवायद प्रतीकात्मक थी। बाद में बहुगुणा सरकार ने वहां विधानसभा भवन बनाने की घोषणा भी कर दी और हर वर्ष एक सत्र चलाने और उसके लिए पचास करोड़ रुपए अवमुक्त करने की बात की गई।राजधानी के विशय पर कांग्रेस की सारी पहल कदमी के पीछे वित्त आयोग से मिलने वाली धनराशि भी थी।

बारहवें वित्त आयोग ने उत्तराखंड में राजधानी के लिए एक अरब रुपए का प्रावधान रखा था। लेकिन भाजपा ने इस धन का कोई उपयोग नहीं किया और यह लैप्स हो गया। अब तेरहवें वित्त आयोग ने एक बार फिर 88 करोड़ की धनराशि को राजधानी के लिए रखा है। इसी धनराशि से गैरसैण में विधान भवन और सचिवालय का निर्माण होना है। राजधानी की कवायद में बुरी तरह से पिछड़ने के बाद भाजपा के विधायकों की चेतना वापस लौटी। विधानसभा के शीत-कालीन सत्र में भाजपा विधायक और पूर्व मंत्री मदन कौशिक ने सदन में एक निजी विधेयक रखा, जिसमें गैरसैण को प्रदेश की ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने का प्रस्ताव था।

इस पर सदन में चर्चा हुई। इसका उत्तर देते हुए सरकार की ओर से संसदीय कार्यमंत्री इंदिरा हृदयेश ने बड़ा ही गोलमोल जवाब दिया। उन्होंने सरकार की कैबिनेट मीटिंग, वहां बनने वाले विधान भवन और सचिवालय का जिक्र तो जरूर किया लेकिन राजधानी बनेगी या नहीं इस पर कुछ भी नहीं कहा। एक तरह से उन्होंने गैरसैण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने को अस्वीकार कर दिया।

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सदन में यह प्रस्ताव गिर गया। सबसे आश्चर्य यह है कि पहले गैरसैण को ग्रीष्मकालीन राजधानी का समर्थन करने वाले सतपाल महाराज भी अब केवल एक सत्र चलाने की बात करने लगे हैं।देखा जाए तो इस प्रस्ताव का अर्थ यही निकलता है कि राजधानी तो देहरादून की रहेगी लेकिन पहाड़ वालों को संतुष्ट करना है तो गैरसैण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बना दो। यानी यह देहरादून को स्थाई राजधानी बनाने का ही उपक्रम भर था। भाजपा को देहरादून के मामले में पहल लेता देख कांग्रेस की ओर से उसके विधायक शैलेंद्र सिंघल ने देहरादून को स्थाई राजधानी घोषित करने का प्रस्ताव पेश किया। इसे भी चर्चा के लिए स्वीकार कर लिया गया, पर चर्चा होनी बाकी है।

स्थिति यह है कि भाजपा और कांग्रेस के बीच राजधानी-राजधानी खेला जा रहा है। दोनों ही पार्टियां राजधानी को देहरादून से बाहर ले जाने को तैयार नहीं हैं क्योंकि इससे मैदानी इलाके के मतदाताओं के नाराज होने का खतरा है। इतना ही नहीं राजधानी के मसले पर विधायक पार्टी लाइन से हटकर मैदानी और पहाड़ी क्षेत्र के आधार पर बंटे हैं। इसलिए कोई भी पार्टी स्पष्ट बात कहने से बच रही है। कांग्रेस के बड़े नेता हरीश रावत, जिनके बारे में कहा जाता है कि उनका उत्तराखंड में जनाधार है, राजधानी पर चुप्पी साधे हैं क्योंकि अब वह मैदानी इलाके हरिद्वार का प्रतिनिधित्व करते हैं। हां, उनके लेफ्टिनेंट अल्मोड़ा के सांसद प्रदीप टम्टा जरूर गैरसैण के बारे में आवाज लगा देते हैं।

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