धन्नासेठों, भूमाफिया और प्रभावशाली नेताओं तथा नौकरशाहों में मची अफरा-तफरी

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गैरसैंण uttarakhand news
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उत्तराखंड की कांग्रेस सरकार ने देहरादून से इतर गैरसैंण में हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और महाराष्ट्र की तर्ज पर अल्पकाल के लिए एक और राजधानी की व्यवस्था की दिशा में कदम तो बढ़ा दिया है, मगर इसके साथ ही गैरसैंण के निवासियों के भविष्य पर भी आशंकाओं के बादल मंडराने लगे हैं। डर है कि जिस ग्रीष्मकालीन राजधानी का नाम सुन कर जो लोग इतने इतरा रहे हैं, उसके लिए सरकार द्वारा जमीनों के अधिग्रहण के कारण कहीं वे अपने ही गैरसैंण में गैर न हो जाय।

राज्य कैबिनेट के निर्णय के तत्काल बाद गैरसैंण में जमीनें हथियाने के लिए धन्नासेठों, भूमाफिया और प्रभावशाली नेताओं तथा नौकरशाहों में मची अफरा-तफरी को देखते हुये राज्य सरकार भी कहां पीछे रहने वाली थी। इसलिये इतने बड़े तामझाम के लिये समय रहते राज्य सरकार ने वहां जमीनों की खरीद-फरोख्त पर ही रोक लगा दी। अगर रोक न लगती तो सरकार को ही वहां पांव टिकाने की जगह नहीं मिलती। बहरहाल सरकार के इस निर्णय का संदेश यही निकलता है कि विशाल सरकारी भूखण्डों और ध्न्नासेठों के दूर-दूर तक फैले चाय बागानों के अलावा सरकार की नजर गैरसैंण निवासियों की जमीनों पर भी है। अगर इन लगभग 1 हजार परिवारों के पांवों तले की जमीनें छीनीं जाती हैं तो उनकी आने वाली पीढिघ्यों का सहारा ही छिन जायेगा और वे अपने ही पुरखों के गैरसैंण में गैर हो जायेंगे।

15 अगस्त 1996 को तत्त्कालीन प्रधानमंत्री ए.डी. देवगौड़ा की उत्तराखंड राज्य बनाने की घोषणा जैसी ही अल्हादित करने वाली थी। दरअसल राज्य निर्माण के बाद विकास की दृदृष्टि से पहाड़ और मैदान के बीच जितना अधिक असन्तुलन हुआ और खास कर विकास की चाह में जिस तरह पहाड़ के लोगों ने मैदान की ओर पलायन किया उस दृष्टि से यह घोषणा बहुत ही महत्वपूर्ण थी। हालांकि विधानसभा अध्यक्ष गोविन्द सिंह कुंजवाल और गढ़वाल के सांसद सतपाल महाराज इसे गैरसैंण में स्थाई राजधानी बनाने की दिशा में ही एक महत्व कदम बता रहे हैं, मगर सच्चाई यह है कि देहरादून ने राजधानी के पांव इस तरह जकड़ लिए हैं कि अब उनके उखड़ने की संभावनाएं लगभग क्षीण ही हैं, फिर भी गैरसैंण में कुछ समय के लिए राज्य की सत्ता के ठहरना भी अपने आप में बड़ी बात है। इतनाभर से ही राज्य में एक और हिल स्टेशन बन जाएगा जो कि मसूरी और नैनीताल के बाद राज्य की तीसरी पहाड़ों की रानी होगी। चूंकि जनसंख्या के भारी दबाव के कारण नैनीताल और मसूरी की कैरीइंग कैपैसिटी ;धारक क्षमताद्ध समाप्त हो चुकी है, जिस कारण इन पर्यटन नगरों का आकर्षण भी नाममात्र का ही रह गया है।

अब अगर पूरे 187 साल बाद पहाड़ों में एक और हिल स्टेशन बनता है तो निसंदेह वह मसूरी और नैनीताल की जैसी बूढ़ी पर्वत रानियों की तरह नहीं, बल्कि एक आधुनिक की तरह ही होगी, जो कि बड़े पैमाने पर पर्यटकों को आकर्षित करेगी। यही नहीं उसके आसपास भी छोटे-छोटे सुन्दर कस्बे उभरने लगेंगे। वहां बड़े पैमाने पर होटल, स्कूल और अस्पताल जैसे व्यवसायों पर निवेश होगा। इसके साथ ही भावी हिल स्टेशन में क्या रेहड़ी-ठेली लगाने, होटलों में बर्तन धोने और मजदूरी करने के अलावा भी आजीविका के अवसर मिलेंगे?

विधान भवन के अलावा वहां राज्यपाल, मुख्यमंत्री, विधानसभा अध्यक्ष और मंत्रियों के आवासों के साथ ही विधायकों और अधिकारियों के लिए हास्टल और मिनी सचिवालय भवन भी बनना है। राजधानी के चयन के लिए गठित दीक्षित आयोग ने राजधानी के लिए कम से कम 450 हैक्टेयर जमीन की आवश्यकता बताई थी। गैरसैंण के आसपास इससे कहीं अधिक जमीन उपलब्ध है, लेकिन सरकार ने अपने विभागों और प्रभावशाली चाय बागान मालिकों के बजाय साफ्रट टारगेट के तौर पर गरीबों की जमीनें कब्जा लीं तो फिर सदा के लिये यह सवाल खड़ा हो जायेगा कि उत्तराखंड को गैरसैंण मिला, मगर गैरसैंणवासियों को क्या मिला? वे अपने ही पुरखों की जमीन में गैर हो जायेंगे। वर्तमान में गैरसैंण को नगर पंचयात का दर्जा हासिल हो चुका है। उसमें सलियाणा, ग्वाड़, गैरसैंण, धारगैड़, रिखोली, सौनियांण, गांवली और सिलंगी ग्राम पंचायतें शामिल की गयी है। इन ग्राम पंचायतों में कुल 948 परिवार रहते हैं। ताजा 2011 की जनगणना के अनुसार इन 8 गांवों की आबादी 4388 है। इनमें से बड़ा गांव गैर हैं जहां 474 परिवारों की 2012 आबादी है। सबसे कम 37 परिवार धारगड़ में रहते हैं। गैर के बाद सलियाणा बड़ा गांव है, जहां 119 परिवार रहते हैं।

गैरसैंण में अगर स्थाई राजधानी बनती है तो वहां जमीन की कमी नहीं है। सन् 1856 में ब्रिटिश कमिश्नर लुशिगटन ने गैरसैंण के लोहवा में पेशकारी दफ्रतर बनाया था, जिसमें नायब तहसीलदार को रखा गया। उन्होंने इसे सबसे बेहतरीन स्थान बताते हुए प्रशासन का केंद्र बनाने का प्रस्ताव प्रांतीय सरकार को भेजा तथा सिल्कोट टी इस्टेट और अन्य चाय बागानों को मिलकर चाय बगान का मुख्यालय भी बनाया। गैरसैंण के पास ही रीठिया चाय बागान के पास 100 हैक्टेयर, सिलकोट के पास 300 हैक्टेयर और बेनीताल चाय बागान के पास 350 हैक्टेयर जमीन पड़ी है। इन बागानों के मालिक गैरसैंण में राजधानी आ जाने की प्रतीक्षा में हैं, ताकि इन विशाल बागानों पर शानदार रिसॉर्ट बनाये जा सकें। इन बागानों के राष्ट्रीयकरण की मांग लम्बे समय से की जा रही है। प्रख्यात समाजसेवी स्वामी मन्मथन और कम्युनिस्ट नेता विजय रावत तथा मदनमोहन पाण्डे इन चाय बागानों के अध्ग्रिहण के लिये 1978 में आन्दोलन भी चला चुके हैं।

हालांकि चाय बागानों के अधिग्रहण और भूउपयोग परिवर्तन की प्रक्रिया काफी जटिल है, फिर भी वह प्रक्रिया पूरी होने तक राज्य सरकार स्थानीय काश्तकारों की जमीन हथियाने के बजाय गैरसैंण स्थित शिक्षा विभाग की 102 नाली और रेशम विभाग की 150 नाली जमीन के साथ ही वन पंचायत की जमीन का भी उपयोग कर सकती है। अगर चाय बागानों की जमीनें ली जाती हैं तो यह देश का सबसे खूबसूरत शहर बन सकता है। हरियाणा की नीति के अनुसार औद्योगिक या बुनियादी क्षेत्र की परियोजनाओं के लिए जो जमीन ली जाती है, उसके लिए किसान को बाजार भाव पर मुआवजा दिया जाता है। किसानों को पूरी राशि एक बार में नहीं दी जाती, बल्कि हर वर्ष उन्हें रायल्टी दी जाती है। इसके साथ ही रोजगार की गारंटी मिलती है। हिमाचल प्रदेश के लैण्ड टेनेंसी और भू सुधार कानून में तो बाहरी व्यक्ति द्वारा वहां उद्यम लगाने पर स्थानीय भूस्वामी को उद्योग में भागीदार बनाना अनिवार्य है। ऐसी ही व्यवस्था उत्तराखंड में भी की जा सकती है।

हरियाणा सरकार ने हाल ही में एक अहम फैसला लेते हुए भूमि अधिग्रहण नीति में और अध्कि सुधार कर किसानों की भूमि के अधिग्रहण की ऐवज में औद्योगिक प्लाट आवंटित किये जाने वाले औद्योगिक प्लाट के आकार को अधिग्रहीत क्षेत्र के साथ जोड़ दिया है। इस प्रकार, अब एक से दो एकड़ की अधिग्रहीत भूमि के लिए 450 वर्ग मीटर, दो से चार एकड़ अधिग्रहीत भूमि के लिए 800 वर्ग मीटर और चार एकड़ से अधिक अधिगृहीत भूमि के लिए 1,000 वर्ग मीटर का औद्योगिक प्लाट आवंटित किया जाएगा। दरअसल किसानों की जमीन को कमोडिटी के बजाय जीवन का आधार माना जाना चाहिए और अगर किसी की जमीन लेना राष्ट्रहित में जरूरी है तो उसकी भावी पीढिघ्यों के लिये सहारे की व्यवस्था पहले ही की जानी चाहिए।बदहाल है

राज्य आज से तकरीबन 12 साल पहले अस्तित्व में आये उत्तराखंड की हालत इन दिनों कुछ खास अच्छी नहीं है। बाहर से देखने पर तो यह एक चमकदार, तेजी से प्रगति करता हुआ और संभावनाशील राज्य नजर आता है, लेकिन इसकी आर्थिक दशा बेहद खराब है। साढ़े तीन हजार करोड़ रुपये के कर्ज के साथ उत्तर प्रदेश से अलग करके बनाये गये उत्तराखंड राज्य पर इन दिनों लगभग बाईस हजार करोड़ रुपये का कर्ज चढ़ चुका है। भाजपा और कांग्रेस दोनों राजनीतिक दल बारी-बारी से यहां शासन कर के हैं, लेकिन दोनों ही इस नवजात राज्य की तकलीफों को न तो समझ सके हैं, न ही उसका निदान ढूँढने की कोशिश करते नजर आते हैं। इसे विडम्बना नहीं तो और क्या कहेंगे कि अपने अस्तित्व में आने के एक दशक बाद भी यह राज्य स्थायी राजधानी के लिये तरस रहा है। देहरादून अस्थाई रूप से इसकी राजधानी है। उत्तरांचल का जब आंदोलन चला था तो श्रीनगर या गैरसैण राजधानी बनायी जानी थी। राजधानी मामले में आज तक अंतिम फैसला नहीं लिया जा सका है। उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के बीच सम्पत्तियों का बंटवारा अभी तक नहीं हो सका है। कुमाऊं और गढ़वाल के बीच वर्चस्व की लड़ाई आज भी जारी है और यह दोनों एक म्यान में दो तलवारों जैसी हालत में किसी तरह रह रहे हैं।
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उत्तराखंड के गठन के साथ ही यहां पर 9 नवम्बर 2000 को भाजपा के नित्यानंद स्वामी ने मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार संभाला था। वे उत्तराखंड के पहले मुख्यमंत्री थे। 29 अक्टूबर 2001 को भाजपा हाईकमान द्वारा हटाये जाने के बाद 30 अक्टूबर 2001 को भगत सिंह कोष्यारी ने सत्ता की बागडोर संभाली। वे 1 मार्च 2002 तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे। इसके बाद प्रदेश में पहली बार विधानसभा चुनाव हुये जिसमें कांग्रेस ने भाजपा को पटखनी देते हुये सत्ता संभाली। दो मार्च 2002 को इस राज्य की कमान कांग्रेस के वरिश्ठ नेता एनडी तिवारी को सौंपी गई, जो इससे पहले भी चार बार उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके थे। हालांकि कांग्रेस की जीत में तब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहे और उत्तराखंड के तेजतर्रार नेता हरीश रावत का महत्वपूर्ण योगदान था। रावत और तिवारी के समर्थकों में भीतर ही भीतर गुटबाजी चलती रही। इसके बावजूद इस नवसृजित राज्य के विकास के लिये खासकर बुनियादी अवस्थापना के लिये तिवारी के संबंधों तथा विशाल राष्ट्रीय एवं अंतरर्राष्ट्रीय अनुभव का उत्तराखंड को खासा लाभ मिला। यहां पर इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य उद्योगों के स्थापना के लिये महत्वपूर्ण पहल की गयी। सात मार्च 2007 को जब कांग्रेस सरकार का कार्यकाल समाप्त हुआ, तो प्रदेश में दूसरी बार विधानसभा चुनाव हुए। इसमें भुवनचंद्र खंडूड़ी को भाजपा की जीत के बाद राज्य का मुख्यमंत्री बनाया गया। 8 मार्च 2007 से 23 जून 2009 तक वे मुख्यमंत्री के पद पर बने रहे। इसके बाद रमेश पोखरियाल निशंक 24 जून 2009 को मुख्यमंत्री बने, फिर भुवन चन्द्र खंडूड़ी को भाजपा ने इसी कार्यकाल में मुख्यमंत्री पद पर बैठाया। इस बार यानी 2012 में कांग्रेस विजय बहुगुणा के मुख्यमंत्रित्व में फिर सत्तासीन है।

मगर उत्तराखंड की अंदरूनी हालत जस के तस हैं या ये कहें कि बिगड़े ही हैं। फिजूलखर्ची, भ्रष्ट्राचार, अदूरदर्शिता और सियासी निकम्मेपन के बाद उत्तराखंड देश के शीर्ष राज्यों उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल की पंक्ति में खड़ा दिखायी दे रहा है।कांग्रेस की एनडी तिवारी सरकार ने जब भाजपा को सत्ता सौंपी थी, तो राज्य ग्यारह हजार करोड़ रुपये के कर्जे में डूबा हुआ था। राज्य की हालत तब और खराब होगी जब वर्श 2013 से उसे कर्ज पर ब्याज की अदायगी के साथ-साथ मूलधन की भी वापसी करनी पड़ेगी। अभी यह राज्य मुख्य रूप से केन्द्र से मिलने वाले अनुदान पर ही निर्भर है। चुनाव वर्ष में केन्द्र की संप्रग सरकार इसकी अनुदान राशि में कोई कटौती नहीं करने जा रही है, लेकिन इस बात की कौन गारंटी देगा कि राज्य अगले दो-तीन सालों में अपने पैरों पर खड़ा हो जायेगा।
यह मांग उठी है केदारघाटी ;उत्तराखण्डद्ध के अगस्त्यमुनि कस्बे से। केदार घाटी में हुए जल प्रलय में अगस्त्यमुनि नगर पंचायत के विजयनगर, सिल्ली, गंगानगर, पुराना देवल आदि स्थानों में भारी नुक्सान पहुंचा था। बड़ी-भारी संख्या में लोग बेघर हो गए, लोगों की सम्पत्ति नष्ट हो गयी, होटल, लॉज आदि बह गए। संपन्नता की श्रेणी में आने वाले लोग एक ही रात में सड़क-छाप हो गए। लोगों को समझ नहीं आ रहा था की यह क्या हो गया? कई लोग बदहवाशी की स्थिति में थे।

उत्तराखंड के पहाड़ और प्राकृतिक आपदाओं का लम्बा इतिहास है। पहाड़ों में लगभग हर साल प्राकृतिक आपदा आती है। बादल फटने, भू-स्खलन जैसी घटनाएं अब आम हो गयी हैं। इन घटनाओं में भारी मात्रा में संपत्ति नष्ट होती है। कई लोग असमय काल के गाल में समा जाते हैं। सरकार फौरी तौर पर राहत और बचाव के कार्य करती है।

आपदा प्रभावितों को नाममात्र की कुछ मुआवजा राशि वितरित की जाती है और सरकार अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेती है। पीडि़तों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है। इसके विपरीत सरकार और उसके कर्ताधर्ताओं की मानों लाटरी खुल गयी हो। वो आपदा के नाम पर अधिक से अधिक पैकेज हड़पने के लिए जुट जाते हैं। जिस आपदा के नाम पर सरकारी तंत्र बड़े-भारी बजट को ठिकाने लगा देता है, उस आपदा में पीडि़त लोग शरणार्थियों सा जीवन जीने को विवश होते हैं।

यह आश्चर्यजनक तथ्य है कि इतनी आपदाओं के बावजूद उत्तराखंड में पीडि़तों के विस्थापन व पुनर्वास की कोई ठोस नीति नहीं है और नहीं कभी किसी भी स्तर पर इसकी जरुरत महसूस की गयी। सरकार हो या गैर सरकारी संगठन, बौ(िक जुगाली करने वाले लोगों आदि तक ने भी इस दिशा में सोचने की कोशिश नहीं की। इसका परिणाम यह रहा कि आपदा पीडि़तों को दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर होना पड़ता है। जिला प्रशासन विस्थापन व पुनर्वास के नाम पर संवेदनशील गाँवों की भू-गर्भीय जांच करा कर सरकार को भेज देता है। सरकार उस गाँव को विस्थापित होने वाले गाँवों की सूची में डाल कर ठंडे बस्ते में फेंक देती है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक आज प्रदेश में इस श्रेणी में लगभग तीन सौ से भी अधिक गाँव हो गए हैं।

सरकार ने विस्थापन व पुनर्वास के मुद्दे को कभी गंभीरता से नहीं लिया। राजनैतिक दलों को तो आरोप-प्रत्यारोपों से फुर्सत मिले तो वे इस बारे में सोचें। पीडि़तों की तरफ से भी कभी अपने विस्थापन व पुनर्वास की मांग ठोस तरीके से नहीं उठी। शायद यही कारण रहा की किसी ने भी इसकी जरुरत नहीं समझी। पीडि़तों का हाल ये है की वो सरकार द्वारा दी गयी मुआवजा राशि को पर्याप्त मान कर संतुष्ट हो जाते हैं। पीडि़तों को लगता है की उन्हें जितनी भी मुआवजा राशी मिली है, वह सरकार की कृपा ही है। पीडि़तों को कभी किसी ने यह नहीं बताया की सरकार जो मुआवजा राशि उन्हें दे रही है, वो सरकार की कृपा नहीं बल्कि उनका अधिकार है। यह सरकार का कर्तव्य है कि वो अपने नागरिकों की सुरक्षा करे, उनके कल्याण के बारे में सोचे। मगर अब पीडि़तों को यह अहसास होने लगा है और पीडि़त अपनी लडाई लड़ने को भी तैयार हो रहे हैं। पीडि़त अपने विस्थापन व पुनर्वास की मांग भी उठाने लगे हैं।

यह मांग उठी है केदारघाटी के अगस्त्यमुनि कस्बे से। केदार घाटी में हुए जल प्रलय में अगस्त्यमुनि नगर पंचायत के विजयनगर, सिल्ली, गंगानगर, पुराना देवल आदि स्थानों में भारी नुक्सान पहुंचा था। बड़ी-भारी संख्या में लोग बेघर हो गए, लोगों की सम्पत्ति नष्ट हो गयी, होटल, लॉज आदि बह गए। संपन्नता की श्रेणी में आने वाले लोग एक ही रात में सड़क-छाप हो गए। लोगों को समझ नहीं आ रहा था की यह क्या हो गया? कई लोग बदहवाशी की स्थिति में थे।

कल्पना की जा सकती है की लोगों के जीवन भर की जमा-पूँजी एक झटके में पानी में समा जाए तो उनकी क्या हालत होगी? मगर इस स्थिति के बावजूद कुछ पीडि़त युवाओं ने हालात से निबटने की सोची और लोगों का मनोबल बढाने की कोशिशें की। उन्होंने पीडि़तों को इकट्ठा करना शुरू किया। निराशा छोड़ कर संगठित होने की मुहीम छेड़ी। यह सूत्र वाक्य दिया की जो हो गया, सो हो गया-अब आगे की सोचो। कुछ ही दिनों में इस मुहिम ने रंग लाना शुरू कर दिया। पीडि़तों ने एकजुट होना शुरू किया और अपने हक के लिए लड़ने का ऐलान किया। अलग-अलग राजनैतिक दलों के लोग शायद ही कभी किसी मंच पर एक साथ और एक जुबान में बोलते हुए दिखलाई पड़ते हैं। मगर इस लड़ाई के लिए राजनैतिक निष्ठाओं को ताक पर रख दिया गया। भाजपा, कांग्रेस, उक्रांद जैसी किसी की कोई पहचान नहीं है। पहचान आपदा पीडि़त के रूप में ही दिखती है। पीडि़तों ने अपनी इस लडाई को लड़ने के लिए केदारघाटी विस्थापन व पुनर्वास संघर्ष समिति ;केवीपीएस-2द्ध का गठन किया। संगठन ने पीडि़तों के मुआवजा वितरण से लेकर उनके पुनर्वास व विस्थापन तक के मुद्दे को अपने एजेंडे में शामिल किया। पहली बार आपदा पीडि़तों के विस्थापन व पुनर्वास की मांग को लेकर आंदोलनात्मक कार्यक्रम हो रहे हैं। संगठन आपदा पीडि़तों के विस्थापन व पुनर्वास को पीडि़तों का अधिकार मानते हुए सरकार पर कई स्तरों से दबाब बनाने की कोशिशों में जुटी हुयी है।

केवीपीएस-2 ने पीडि़तों को ही नहीं, बल्कि अन्य लोगों को भी यह समझाने की कोशिश की कि यह लड़ाई केवल आपदा पीडि़तों की लड़ाई नहीं है। यह पहाड़ के भविष्य की लड़ाई है। आपदा का क्रम हर साल का है। आज यहाँ तो कल वहां। इसलिए लोगों को एकजुट होकर यह लड़ाई लड़ने की जरुरत है। संगठन की अपील का असर भी दिखाई पड़ा। लोग एकजुट होने लगे हैं और सरकार द्वारा विस्थापन व पुनर्वास किये जाने को अपना अधिकार समझने लगे हैं। संगठन ने विस्थापन व पुनर्वास की मांग उठाई तो सरकार ने पीडि़तों को प्री-फेब्रिकेटेड घर बना कर देने की घोषणा की। मगर पीडि़तों ने इसका विरोध किया और सरकार की नियत पर कई सवाल खड़े किये। संगठन ने प्री-फेब्रिकेटेड घरों की बजाय पीडि़तों को आर्थिक पैकेज देने की मांग उठाई। शुरुवात में ना-नुकुर के बाद सरकार रेडिमेड घर के बजाय पांच लाख रूपये के आर्थिक पैकेज के मुद्दे पर राजी हो गयी। पर पीडि़त इससे संतुष्ट नहीं हैं। उनकी मांग है की सरकार आर्थिक पैकेज को और अधिक करे।

संगठन प्रदेश में विस्थापन व पुनर्वास की एक ठोस नीति बनाने को लेकर लगातार संघर्षरत है। संगठन ने इसके लिए बाकायदा हस्ताक्षर अभियान भी छेड़ा। इस अभियान को व्यापक जन समर्थन भी मिला। प्रदेश में कांग्रेस की ही सरकार होने के बावजूद संगठन द्वारा चलाये जा रहे अभियान में केन्द्रीय जल संसाधन मंत्री हरीश रावत ने भी अपने हस्ताक्षर किये। संगठन के अध्यक्ष अजेन्द्र अजय कहते हैं की शुरुवात में उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती पीडि़तों का मनोबल बनाने की थी, जिसमे उन्हें बहुत हद तक सफलता मिली है। वे मानते हैं की अभी लड़ाई लम्बी है। उनका कहना है की अब समय आ गया है की सरकार जल्द-से-जल्द विस्थापन व पुनर्वास की ठोस नीति घोशित करे। सरकार उनकी इस मांग को अब नजरंदाज नहीं कर सकती है। संगठन ने केदारघाटी में आयी आपदा के सौ दिन पूरे होने पर रुद्रप्रयाग में पीडि़तों की पंचायत भी बुलाई थी। पंचायत में बड़ी संख्या में दूर-दराज के क्षेत्रों के पीडि़तों ने भी भाग लिया। इससे भी संगठन के पदाधिकारी उत्साहित हैं।

केवीपीएस-२ के आन्दोलन को हतोत्साहित करने वालों की भी कमी नहीं है। कई लोग मानते हैं की सालों गुजर गए, किन्तु अभी तक कई गाँवों के विस्थापन व पुनर्वास की मांग ठंडे बस्ते में पड़ी हुयी है। ऐसे में संगठन द्वारा की जा रही कार्रवाही कितनी कारगर होगी? मगर संगठन ऐसे सवालों से बेफिक्र होकर अपने अभियान में जुटा है और उसे धीरे-धीरे विभिन्न सामाजिक संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पर्यावरणविद्दों का समर्थन भी हासिल हो रहा है। बहरहाल, संगठन को अपने लक्ष्य की प्राप्ति में कितनी सफलता मिलती है, यह भविष्य के गर्भ में है। पर संगठन ने एक ऐसे मुद्दे को उठाया है, जो बहुत पहले ही इस आपदाग्रस्त राज्य की नीति में शामिल होना चाहिए था।

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