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जंगी पोतों के निर्माण में हो रही है देरी

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नई दिल्ली। देश की समुद्री सुरक्षा को चुस्त-दुरुस्त करने के लिए रक्षा मंत्रालय ने सार्वजनिक क्षेत्र की चार कंपनियों को जंगी पोत बनाने की अहम जिम्मेदारी सौंपी है। लेकिन पिछले तीन-चार सालों में इन्हें आधुनिकीकरण के लिए स्वीकृत धनराशि का दसवां हिस्सा भी जारी नहीं किया गया है। नतीजा यह है कि जंगी पोतों के निर्माण की तमाम परियोजना देरी से चल रही हैं जिसमें छह स्कॉर्पीन पनडुब्बियां भी शामिल है। रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार मझगांव डॉक लिमिटेड (एमडीएल)के आधुनिकीकरण के लिए 966 करोड़ रुपये स्वीकृत हुए थे। जिनमें से 846 करोड़ रुपये केंद्र से दिए जाने थे और 120 करोड़ रुपये एमडीएल को खुद जुटाने थे। लेकिन पिछले दो सालों में केंद्र ने सिर्फ 157 करोड़ रुपये जारी किए। नतीजा यह है कंपनी अपनी क्षमताओं का विस्तार नहीं कर पा रही है। यदि आधुनिकीकरण का कार्य पूरा हो जाता तो यह कंपनी सालाना पांच जंगी पोत तैयार कर सकती है। जबकि अभी मुश्किल से तीन कर पा रही है। इसी प्रकार सालाना छह पनडुब्बी तैयार कर सकती है। जबकि अभी तीन भी समय पर नहीं हो पा रही हैं। छह स्कॉर्पीन पनडुब्बी बनाने का जिम्मा भी इसी कंपनी के पास है। दूसरी कंपनी गार्डनरीच शिपबिल्डर्स इंजीनियर्स (जीआरएसई) है। इसके आधुनिकीकरण के लिए 606 करोड़ रुपये की योजना मंजूरी की गई थी। जिसमें से 331 करोड़ रुपये केंद्र सरकार की तरफ से दिए जाने थे। लेकिन दो साल बीत गए। केंद्र की तरफ से कोई राशि जारी नहीं की गई। इस कंपनी के पास विध्वंसक पोत बनाने का जिम्मा है। आधुनिकीकरण के जरिये ये कंपनी मार्डन तकनीक अपनाना चाहती है लेकिन धन की समस्या आड़े आ रही है। गोआ शिपयार्ड लिमिडेट (जीएसएल) के पास माइन काउंटर पोत बनाने का जिम्मा है। लेकिन इसके तीसरे एवं चौथे चरण के आधुनिकीकरण का कार्य लंबित है। पहले एवं दूसरे चरण के का आधुनिकीकरण का कार्य 2011 में पूरा हो चुका है। तीसरे, चौथे चरण के लिए केंद्र ने 480 करोड़ रुपये मंजूर किए थे जिसमें से केंद्र ने 100 करोड़ ही अब तक जारी किए हैं। आधुनिकीकरण होने के बाद जीएसएल की क्षमता 6000 टन क्षमता के पोत बनाने की होगी जबकि अभी यह सिर्फ 1500 टन तक ही सीमित है। सार्वजनिक क्षेत्र की चौथी पोत निर्माण कंपनी हिन्दुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड (एचएसएल) है। 2011 के इसका आधुनिकीकरण लंबित चला आ रहा है। कारण केंद्र से धनराशि जारी नहीं होना। 2011 में 457 करोड़ रुपये आधुनिकीकरण के लिए मंजूर किए गए थे लेकिन कोई राशि अभी तक जारी नहीं हुई है। इस शिपयार्ड की तमाम मशीनें पुरानी पड़ गई हैं जिनकी या तो मरम्मत होनी है या फिर नई खरीदी जानी है। इस कंपनी के पास पेट्रोलिंग पोत, लैंडिग डॉक तथा टैंकर आदि के निर्माण की जिम्मेदारी है। चार दर्जन पोत निर्माणाधीन-नौसेना के करीब चार दर्जन विभिन्न किस्म के पोत निर्माणाधीन हैं। इनमें से कई परियोजनाएं दो-चार साल की देरी से चल रही हैं। 2027 तक नौसेना को पोतों की संख्या दो सौ तक करनी है जबकि अभी 137 पोत नौसेना के पास हैं। देश में पोत निर्माण की प्रक्रिया इतनी धीमी है कि जब तक दो पोत नौसेना को मिलते हैं तब तक एक पोत सेवानिवृत्त हो जाता है।

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