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जान हथेली पर

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रुद्रप्रयाग। मन्दाकिनी घाटी में ट्राली का सफर ग्रामीणों के लिए दु:खदायी बनता जा रहा है। सरकार है कि पैदल पुल लगाने की दिशा में अभी तक आधी भी प्रगति नहीं कर पाई है। ग्रामीण आज भी जान हथेली पर लेकर सफर करने को मजबूर हैं। खासकर स्कूली बच्चों और वृद्घों को कॉफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। सुबह से ही लाइनों में लगे स्कूली बच्चों की पीड़ा भी सरकारी वाशिन्दों की नींद नहीं तोड़ पाई। दिनों दिन बढ़ते हादसों ने आखिर जनता के सब्र का बांध तोड़ा और चन्द्रापुरी में युवक के बहने के बाद बुद्घवार को राष्ट्रीय राजमार्ग पर जाम लगाकर जनता ने अपनी भड़ास निकाली। लेकिन यह पहला मौका नहीं था कि जनता ने पुल की मांग को लेकर जाम लगाया। इससे पूर्व भी जनता पुल की मांग को लेकर कई आन्दोलन कर चुकी है। परन्तु शासन प्रशासन इस ओर से आंखे मूंदे ही रहा और आन्दोलन के दिनों में केवल आश्वासन देकर जनता को पुचकार कर फिर गहरी नींद में सो गया।
वर्ष 2013 में केदारघाटी में आई भीषण बाढ़ में मंदाकिनी नदी पर बने कई पुल बह गये थे। ासल्ली, विजयनगर, चन्द्रापुरी आदि स्थानों पर स्थित ये पैदल पुल जनता की लाइफ लाइन थे। इन पुलों के माध्यम से पुल पार की आबादी न केवल मुख्य मार्ग से जुड़ी थी, ूल्कि उनकी आर्थिकी भी जुड़ी हुई थी। अगस्त्यमुनि, चन्द्रापुरी आदि विकसित बाजार पुल पार के ग्रामीणों के विपणन के मुख्य केन्द्र थे। इन बाजारों में ग्रामीण दूध, सब्जी इत्यादि बेचकर न केवल बाजार वालों की जरूरतों को पूरा करते थे ूल्कि यह उनकी आजीविका का भी मुख्य स्रोत थे। परन्तु आपदा में पुलों के बहने से ये ग्रामीण न केवल मुख्य बाजारों से कट गये ूल्कि इनकी आजीविका पर भी गहरा असर पड़ा। आपदा के बाद से सरकार ने केदारनाथ यात्रा पर अपना पूरा ध्यान केन्द्रित कर दिया, मगर इन ग्रामीणों की कोई सुध नहीं ली। ग्रामीण कई माह तक इन्तजार करते रहे कि सरकार उनकी समस्याओं को हल करेगी। आखिर कई माह तक इन्तजार करने तथा ट्रॉली के सफर में कइयों के चोटिल होने के बाद ग्राामीणों के सब्र का बांध टूट गया और वे सड़को पर उतर कर आन्दोलन करने लगे। यह एक स्थन की बात नहीं थी। ासल्ली में पुल लगाने का मामला हो या विजयनगर में या चन्द्रापुरी में। सभी जगहों पर सरकार पुल बनाने की ओर एक कदम तभी चली जब वहां की जनता ने लम्बा आन्दोलन कर राष्ट्रीय राजमार्ग जाम किया। जनता के आन्दोलन का यही अन्जाम मिला कि सरकार ने पक्के पुल के बजाय अस्थाई पुल बनवा दिए। जो मात्र छ: माह ही जनता को राहत दिला पाये और नदी में पानी बढऩे के साथ ही फिर से जनता को उन्हीं ट्रॉली के डरावने सफर पर ही निकलना पड़ा। इसमें सबसे अधिक दिक्कत हुई पीक ऑवर में स्कूली बच्चों को जिन्हें सात बजे की स्कूल के लिए घर से पांच बजे निकलना पड़ता है और फिर भी समय पर स्कूल नहीं पहुंच पाते हैं। स्कूल से वापसी का तों कोई समय ही नहीं है।
शासन प्रशासन ने पहले विभिन्न स्थानों पर हाथ से चालित ट्रॉलियां लगाई। और जब इनमें कइयों के हाथ कटने तथा गिरने की घटनाओं में वृ़िद्घ होने लगी तो कुछ जगहों पर मोटरचालित ट्रॉलियां भी लगाई गई। इन ट्रॉलियों में एक बार में केवल चार लोग ही सफर कर सकते थे। परन्तु भीड़ होने के कारण ये ओवरलोड होने लगी तथा ये अधिकांश बार खराब होने लगी। जिससे जनता को हाथ से खींचने वाली ट्रॉलियों से ही सफर करने को मजबूर होना पड़ा। सरकार भी इन ट्रॉलियों एवं अस्थाई पुलों को लगाकर पुलों का निर्माण करना भूल ही गई। साल दर साल यही व्यवस्था जनता की नियति बन गई। विभिन्न स्थानों पर पुलों के बजाय पहले मैन्युवली फिर स्वचालित ट्रॉली एवं अस्थाई पुल निर्माण करना सवालों के घेरे में है। नगर पंचायत अध्यक्ष अशोक खत्री, वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता कुलदीप सिंह रावत, उक्रांद के नेता दरम्यान सिंह बिष्ट का कहना है कि ट्रॉली का सफर कई बार जानलेवा हो चुका है। बुद्घवार की घटना से पूर्व भी चन्द्रापुरी में एक बालक का हाथ ट्रॉली की भेंट चढ़ चुका है। फिर भी शासन प्रशासन मौन रहता है। यह उनकी संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। जनता आन्दोलन ही कर सकती है। परन्तु अब तो आन्दोलन से भी सरकार नहीं जाग रही है। ऐसे में जनता उग्र हो जाय तो फिर किसका दोष होगा। वहीं पूर्व विधायक श्रीमती शैलारानी रावत का कहना है कि सरकार सिर्फ केदारनाथ तक ही सीमित रही। आपदा प्रभावित क्षेत्रों में जनता की जीवन रेखा मानी जाने वाली यातायात व्यवस्था में पुलों की अहम भूमिका होती है, लेकिन आपदा के तीन वर्षों के बाद भी सरकार पुलों के निर्माण कराने में पूर्ण विफल रही है। अगर केदारघाटी में आपदा के बाद पलायन की गति बढ़ी है तो उसमें पुलों का निर्माण न होना भी अहम रहा है। इसके लिए सरकार को बख्शा नहीं जायेगा। तथा जनता को साथ लेकर बड़ी लड़ाई लड़ी जायेगी।

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