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शिक्षा संस्थानों में अनुसंधान और उसकी गुणवत्ता पर ध्यान नहीं पैसे दो, डॉक्टरेट लो!

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उच्च शिक्षा में रिसर्च या शोध की भूमिका सबसे अहम होती है। शोध के स्तर और उसके नतीजों से ही किसी विश्वविद्यालय की पहचान बनती है और छात्र-शिक्षक उसकी ओर आकर्षित होते हैं। शोध के महत्व पर यूजीसी के पूर्व चेयरमैन और शिक्षाविद् प्रोफेसर यशपाल कहते हैं, जिन शिक्षा संस्थानों में अनुसंधान और उसकी गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया जाता वो न तो शिक्षा का भला कर पाते हैं और न समाज का। यानी जिस विश्वविद्यालय में शोध की गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया जाता उसका महत्व शैक्षणिक तो हो सकता है लेकिन विषय को आगे बढ़ाने, उसका विस्तार करने और ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में नए आयाम जोड़ने में वो पिछड़ जाता है। लेकिन भारत में उच्च शिक्षा में शोध को बहुत गंभीरता से नहीं लिया जाता।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति बीबी भट्टाचार्य इसकी वजह बताते हुए कहते हैं, भारत में जब उच्च शिक्षा संस्थानों की शुरुआत हुई थी तो टीचिंग के ऊपर ज्यादा ध्यान दिया गया, रिसर्च को बहुत महत्व नहीं दिया गया और इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि शोध का भारतीय समाज में बहुत मान नहीं है। अमरीका का उदाहरण देते हुए प्रोफेसर भट्टाचार्य कहते हैं कि वहां शोध की समाज में बहुत कद्र है और इसी वजह से वहां नोबेल पुरस्कारों की भरमार नजर आती है।

भारत सरकार के उच्च शिक्षा सचिव अशोक ठाकुर बताते हैं कि भारत में सकल घरेलू उत्पाद का मात्र 0.8 फीसदी शोध पर खर्च किया जाता है जो कि चीन और कोरिया से भी काफी कम है और इसे कम से कम दो फीसदी होना चाहिए।

ये भी एक तथ्य है कि दुनिया के जितने भी बड़े उच्च शिक्षा के आक्सफोर्ड, केंब्रिज, हार्वर्ड जैसे केंद्र हैं वो अपने शोध के ऊंचे स्तर और शोधार्थियों की गुणवत्ता की वजह से ही जाने जाते हैं। अमर्त्य सेन ;हार्वर्ड विश्वविद्यालयद्ध, जगदीश भगवती ;केंब्रिज विश्वविद्यालयद्ध, हरगोविंद खुराना ;लिवरपूल विश्वविद्यालयद्ध ने अपने शोध की वजह से न केवल भारत का नाम रोशन किया बल्कि जिन विश्वविद्यालयों से ये जुड़े, उनकी प्रतिष्ठा को भी इन्होंने आगे बढ़ाया। जेएनयू के पूर्व कुलपति बीबी भट्टाचार्य मानते हैं कि शोध का भारतीय समाज में बहुत मान नहीं है। भारत में वस्तुस्थिति यह है कि पहले के मुकाबले यहां शोध के क्षेत्र में सुविधाएं बढ़ी हैं। विश्वविद्यालयों में प्रयोगशालाओं का स्तर सुधरा है, इंटरनेट की सुविधा आज शोधार्थियों को आसानी से उपलब्ध है, आर्थिक रूप से भी सरकार शोध करनेवालों को पर्याप्त मदद देती है। छत्तीसगढ़ में बिलासपुर के एक पिछड़े इलाके में स्थित गुरुघासीदास विश्वविद्यालय में राजनीतिशास्त्र में शोध कर रहे शमशाद अहमद बताते हैं कि विश्वविद्यालय परिसर में इंटरनेट की अच्छी सुविधा है, लाइब्रेरी में हर तरह की किताब मिल जाती है और दुनिया भर के जर्नल वहां मंगाए जाते हैं।

वहीं राजस्थान विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र में शोध कर रही निधि बंसल भी स्वीकार करती हैं कि शोध के लिए हर तरह की सुविधा छात्रों को उपलब्ध है, कमी है तो सिर्फ विद्यार्थी के स्तर पर शोध को लेकर गंभीरता की। ऐसे में सवाल उठता है कि जब तुलनात्मक रूप से सुविधाएं बढ़ी हैं तो शोध का स्तर क्यों नहीं बढ़ रहा। प्रोफेसर यशपाल कहते हैं, अच्छा शोध हमेशा विषय के दायरे के बाहर होता है। अगर ऐसा करने की इजाजत न दी जाए और शिक्षक सिर्फ परंपरागत तरीके से काम करते रहे तो कभी शोध का भला नहीं हो सकता, महज विशेषज्ञ बनने से काम नहीं चलने वाला। एक अच्छा शोध ऐसे शैक्षणिक परिवेश की मांग करता है, जहां शिक्षकों का स्तर अनुसंधान और अन्वेषण को बढ़ावा देने वाला हो और छात्र लगातार विषय में कुछ नया जोड़ने के प्रयास में लगे हों।

राजस्थान विश्वविद्यालय में पोस्ट डॉक्टरेट कर रही निधि बंसल का कहना है कि आज शोध के लिए सुविधाएं पहले के मुकाबले बढ़ी हैं। लेकिन भारत के कई बड़े विश्वविद्यालयों में शोध के लिए जरूरी अन्वेषणपरक इस बुनियादी प्रवृत्ति का अभाव-सा नजर आता है। कभी भारत में शिक्षा और ज्ञान-विज्ञान का केंद्र रहे बिहार के पटना विश्वविद्यालय में आज शोध छात्र और शिक्षक दोनों के लिए खिलवाड़ बन गया है। शिक्षक जहां पैसे लेकर शोधकार्य करवा रहे हैं, वहीं छात्र बिना किसी योग्यता के डॉक्टरेट की डिग्री हासिल कर रहे हैं। पटना विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के प्रोफेसर रघुनंदन शर्मा शिक्षा की इस अराजक स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं कि न तो अच्छे छात्र शोध के क्षेत्र में आ रहे हैं और न ही शिक्षक ऐसे हैं जो छात्रों को अच्छे शोध के लिए प्रेरित कर सकें, वो शोध को व्यवसाय की नजर से देखने लगे हैं। प्रोफेसर शर्मा कहते हैं,
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श्हिंदी प्रदेशों में कुछ शिक्षक इस स्तर तक गिर गए हैं कि वो पैसे लेकर डिग्री बांट रहे हैं। वो बाकायदा गारंटी लेते हैं कि डॉक्टरेट दिलवा देंगे। यही वजह है कि बिहार और यूपी में रिसर्च की स्थिति अच्छी नहीं दिख रही। ये स्थिति केवल पटना विश्वविद्यालय की ही नहीं है। ऐसे तमाम विश्वविद्यालय हैं जहां पीएचडी थीसिस तो थोक के भाव से जमा हो रहे हैं, लेकिन उनमें लिखी सामग्री से विषय का कोई भला नहीं हो रहा, वो केवल यहां-वहां से, इंटरनेट से चुराई सामग्री का संकलन भर होता है जिसे न तो छात्र गंभीरता से लेते हैं और न ही उनके शोध निर्देशक पटना विश्वविद्यालय के कई छात्रों और शिक्षकों ने शोध में धांधली की बात स्वीकार की। शोध के क्षेत्र में आई इस गिरावट की एक वजह की ओर इशारा करते हुए पटना विश्वविद्यालय के एक छात्र शकील अहमद कहते हैं, आज एक आईएएस या बैंक अधिकारी की समाज में जो इज्जत होती है वो एक रिसर्च करनेवाले छात्र की नहीं होती। उसके बारे में यही मान लिया जाता है कि वो प्रतियोगिता परीक्षाओं में अच्छा नहीं कर सका या उसमें क्षमता नहीं थी इसलिए वो शोध में समय बर्बाद कर रहा है।

शोध की खराब हालत का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू है- शोधार्थियों का शोध निर्देशकों के हाथों शोषण। पटना विश्वविद्यालय के एक छात्र पंकज कुमार बताते हैं, शोधार्थी को समय न देना, चौप्टर समय पर पढ़कर न लौटाना, उसकी छात्रवृत्ति को रोक कर रखना इत्यादि ऐसे तरीके हैं जिनसे शिक्षक छात्रों को परेशान करते हैं।

ऐसे शिक्षकों का लक्ष्य अपने अंतर्गत पीएचडी छात्रों की संख्या बढ़वाकर अपना बायोडेटा ठीक करना तो होता है लेकिन शोध की गुणवत्ता कतई उनके चिंतन और कार्यशैली के केंद्र में नहीं होता।
पटना विश्वविद्यालय में शोध कर रहे प्रद्युम्न सिंह बताते हैं, विश्वविद्यालय में शोध का आलम ये है कि शिक्षक छात्र की हैसियत और काबिलियत देखकर उन्हें अपने अंतर्गत शोध की अनुमति देते हैं और विषय चयन से लेकर थीसिस जमा करने तक या तो उनसे पैसे ऐंठते हैं या फिर उन्हें तरह-तरह से परेशान करते हैं। और हद तो तब हो जाती है जब शोध निर्देशक शोधार्थी से थीसिस का चौप्टर पास करने या वजीफे के कागज पर दस्तखत करने से पहले अपने घर का काम करवाते हैं, सब्जी-राशन मंगवाते हैं और अपने सेमीनार के पर्चे के लिए सामग्री जुटाने के लिए यहां-वहां दौड़ाते हैं।

ऐसा इसलिए संभव हो पाता है क्योंकि शोध की प्रक्रिया पूरी तरह से विद्यार्थी और उसके शोध निर्देशक के बीच संपन्न होती है और छात्र के पास शोध को पूरा करने के लिए गुरुजी के आगे घुटने टेकने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होता। शोध के लिए सबसे जरूरी होता है कि लाइब्रेरी में विश्व स्तरीय किताबें उपलब्ध हों। छात्रों की इस स्थिति का फायदा उठाकर कई शोध निर्देशक महिला शोधार्थियों से अनुचित फायदा उठाने की कोशिश भी करते हैं। हालांकि इस तस्वीर का दूसरा रुख भी है। शोध की खराब हालत के लिए केवल शिक्षकों का रवैय्या ही जिम्मेदार हो ऐसा ही नहीं है। कई बार शोधार्थी भी शोधकार्य के दौरान शिक्षकों को नाकों चने चबवा देते हैं।

छात्र कई-कई महीने शिक्षक से नहीं मिलते, पीएचडी में दाखिला लेकर विश्वविद्यालय की तमाम सुविधाएं ले लेते हैं और साथ ही छुप-छुपाकर नौकरी करने लगते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय में कोरियन स्टडीज के प्रोफेसर संदीप मिश्रा कहते हैं, ऐसा हो सकता है कि कुछ शिक्षक छात्रों को परेशान करते हों लेकिन मेरा मानना ये है कि आधे से अधिक मामले ऐसे होते हैं जिनमें छात्र का भी कुछ दोष होता है। कई छात्र ऐसे होते हैं जो महीनों गायब रहते हैं, चौप्टर नहीं देते, बुलाने पर भी नहीं आते और अचानक जब थीसिस जमा करने की मियाद सिर पर आती है तो कुछ यहां-वहां से लिखकर दे देते हैं और उम्मीद करते हैं कि उसे उसी रूप में स्वीकृति दे दी जाए।

शिक्षक खुद परेशानी में पड़ जाता है कि वो क्या करे। यानी कुछ हद तक दोश दोनों तरफ से है। कहीं छात्र शिक्षक के हाथों परेशान हो रहा है तो कहीं शिक्षक छात्र के गैर जिम्मेदाराना रवैये से कुपित हैं और इन दोनों ही स्थितियों में असल नुकसान हो रहा है शोध का। हालत ये है कि षोध के लगातार गिरते स्तर की वजह से भारत के क्लासिक विश्वविद्यालय कहलाने वाले जेएनयू, एएमयू, बीएचयू और इलाहाबाद जैसे विश्वविद्यालयों की छवि दिन ब दिन खराब होती जा रही है। दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति दिनेश सिंह का कहना है कि शोध के स्तर में गिरावट के बावजूद कुछ स्तरीय रिसर्च आज भी हो रहे हैं। बहरहाल, कुल मिलाकर भारत में आज शोध की स्थिति पीठ थपथपाने वाली नहीं कही जा सकती। विकास और उसे समाजोपयोगी बनाने के लिए ये बेहद जरूरी है कि छात्र और शिक्षक दोनों की अनुसंधान के प्रति सोच ईमानदार हो और वो विषय में कुछ नया जोड़ने के उद्देश्य से ही इस दिशा में आगे बढ़ें।

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