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बंधुवा मजदूरों से भी गई गुजरी है पत्रकारों की हालत

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दीपक आज़ाद-

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मजीठिया पे-कमीशन की सिफारिशों के मुताबिक पत्रकारों को वेतन-भत्ते दिलवाने को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत में चल रही कानूनी लड़ाई के बीच उत्तराखंड के श्रमायुक्त डॉ आनन्द श्रीवास्तव ने अदालत से उसके आदेशों का अनुपालन न किए जाने को लेकर माफी मांग ली है। लेकिन जिन पत्रकारों को कानून के अनुसार वेतन-भत्ते दिलवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया मालिकों के पसीने छुड़ा रखे हैं, उनका हाल यह है कि उत्तराखंड से ज्यादातर पत्रकार मालिकों से वेतन-भत्तों की मांग तक करने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। राश्टीय सहारा के लिए काम करने वाले  पत्रकार अरूण श्रीवास्तव जैसे कुछ एक नामों को छोड़ दें तो अमर उजाला से लेकर दैनिक जागरण और दैनिक हिन्दुस्तान समेत दूसरे कारपोरेट मीडिया मालिकों की नौकरी कर रहे पत्रकार इस कदर असहाय नजर आ रहे हैं जैसे वे किसी बंधुवा मजदूर से भी गये गुजरे हों। बंधुआ मजदूर भी मौका मिलने पर अपने मालिकों के खिलाफ प्रतिरोध के स्वर बुलंद करने से पीछे नहीं रहते, लेकिन यहां पत्रकारों ने मुनाफाखोर मालिकों के आगे अपनी रीढ़ ही पूरी तरह जमीन के बल दंडवत कर दी है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार मजीठिया वेतन आयोग के तहत श्रमायुक्त के पास नये वेतनमान के लिए दावा प्रस्तुत किया जाना जरूरी है। उत्तराखंड का श्रम विभाग पहले ही सर्वोच्च अदालत को बता चुका है कि उत्तराखंड में सभी मीडिया कंपनियां अपने कर्मचारियों को मजीठिया पे कमीशन के अनुसार वेतन-भत्ते दे रही हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि उत्तराखंड से हर साल करोड़ों का मुनाफा पीटने वाले मीडिया घराने पत्रकारों व गैर पत्रकारों को बेहद ही मामूली वेतन दे रहे हैं। मीडिया मालिक नया वेतनमान देने से बचने के लिए पर्दे के पीछे कई तरह के छल-कपट का खेल खेला जा रहा है।उत्तराखंड के श्रम आयुक्त डा. आनंद श्रीवास्तव ने 23 अगस्त, 2016 को मजीठिया मामले में रखी गई सुनवाई की तिथि को उपस्थित ना हो पाने के लिए सवोच्च न्यायालय से माफी मांगी है। सुप्रीम कोर्ट में दायर शपथपत्र में उन्होंन कहा है कि यह सब अनजाने में गलतफहमी के चलते हुआ है, वह यह समझ बैठे थे कि श्रम आयुक्त को अपने वकील के माध्यम से कोर्ट में उपस्थित होना है। ज्ञात रहे कि कि पिछली तारीख 19 जुलाई 2016 को कोर्ट ने निर्देश दिए थे कि उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, नागालैंड और मणिपुर के श्रम आयुक्त कोर्ट रूम में व्यक्तिगत तौर पर अपने वकील के साथ मौजूद रहेंगे, ताकि वे मजीठिया वेजबोर्ड के क्रियान्वयन की स्थिति के संबंध में पूछे जाने वाले सवालों का जवाब दे सकें।जबकि 23 अगस्त, 2016 को सुनवाई वाले दिन चार राज्यों उत्तरप्रदेश, हिमाचल प्रदेश, नागालैंड व मणिपुर के श्रम आयुक्त अपने-अपने वकील के साथ कोर्ट में मौजूद थे, वहीं उत्तराखंड की ओर से कोई भी उपस्थित नहीं हुआ था। तब  न्यायमूर्ति रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति पीसी पंत ने उत्तराखंड के श्रम आयुक्त के जमानती गिरफ्तारी वारंट जारी किए थे, ताकि अगली तारीख को कोर्ट द्वारा मांगी गई जानकारी के साथ उनकी उपस्थित सुनिश्चित की जा सके।श्रमायुक्त के इस माफीनामे के बीच असल सवाल यह है कि क्या सरकार राज्य में मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करवाने के लिए थोड़ी भी गंभीर है। जिस तरह से राज्य का श्रम विभाग मीडिया मालिको की हां में हां मिला रहा है उससे इसके कोई संकेत नहीं मिलते। इसके उलट मीडिया मालिको की श्रम विभाग से चल रही मिलीभगत के चलते इस तरह का माहौल पैदा किया गया है कि पत्रकार मालिकों के गुस्से का शिकार होने की आशंका से दावा तक पेश करने का साहस तक नहीं जुटा पा रहे हैं। ऐसा नहीं है कि यह स्थिति केवल उत्तराखंड की ही है। कम, ज्यादा पत्रकारों का यह असहायपन पूरे देश में एक बीमारी की शक्ल ले रहा है।कारपोरेट मीडिया में काम करने वाले तकरीबन 80 फीसदी पत्रकार 10 हजार से लेकर 25 हजार रूपये तक की ही पगार पाते हैं। नये वेतन आयोग के अनुसार करीब करीब केन्द्रीय कर्मचारियों के बराबर ही पत्रकारों को वेतन-भत्तों का प्रावधान है। ऐसे में जिन पत्रकारों को वेतन आयोग का लाभ होना है वे ही मालिकों के आगे नौकरी जाने के असुरक्षा बोध से मिमियाते फिर रहे हैं तब कोई अदालत कर भी क्या सकती है? पत्रकारों का यह असहायपन नागरिक समाज के लिए एक प्रमुख चिंता होनी चाहिए। यह केवल वेतन आयोग की सिफारिशों पर हक जताने भर का मामला नहीं, बल्कि इस तरह अगर पत्रकारों में असहायपन का शिकार होने की प्रवृत्ति बढ़ती रहेगी तो हमारे जैसे समाज जिन पर अलोकतांत्रिकरण की ओर बढ़ने का खतरा मंडराता रहता है, ऐसी प्रवृत्तियां उसको ही आक्सीजन देने का काम करेंगी।

दीपक आजाद बाचडॉग पतिका और बाचडॉग न्यूज पोर्टल के एडिटर है

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