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भवानी और उनकी उन्मुक्त हँसी

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गंगा असनोडा

भवानी जी के व्यक्तित्व का सबसे पहला आकर्षण था- उनकी उन्मुक्त हँसी। ठहाके के साथ जोर से हँसना, उनके आस-पास के लोगों को उनकी ओर खींचने की ताकत रखता था। जो कोई उनसे घड़ी- दो घड़ी भी मिला हो तो उनकी निश्छल हँसी की गूंज आज भी महसूस कर सकता है।
पहली मुलाकात पर बातचीत करते हुए जब वो मेरे सम्मुख हँसे थे, तो मुझे पहले कुछ अटपटा लगा। फिर उन्होंने कुछ कहा और वे दुबारा हँसे। फिर बातचीत के दौरान कई बार हँसे। अब मुझे वही अटपटी हँसी उनका आकर्षण लग रही थी। फिर तो कई दौर की बातें उनके साथ हुई और उनकी यह हँसी मुझे प्रभावित कर गई। मैं इसका ऐसे आनंद लेती जैसे कोई बच्चा पार्क में जाकर घिस्सारोड़ी का लेता है। मैं फिसलती चली गई अनंत आह्लाद के साथ।

शादी के बाद मैंने अपनी इस अनुभूति का जिक्र उनसे भी किया था। शायद इसीलिए मुझे क्रोध में देखने पर वो किसी के साथ एक ठहाका जरूर लगा देते। उन्होंने भी मुझसे कहा था एक बार- तेरा गुस्सा तो दूध का उबाल है, जिस पर मेरी हँसी की छमक पड़ी नहीं कि सीधे नीचे बैठ जाता है।

मुझे उनकी हँसी पर फिसलना आज भी भाता है। मैं उनकी यादों में घिस्सारोड़ी में बैठ आज भी उस आनंद की अनुभूति करती हूँ। उनकी हँसी में मधुर संगीत जैसी ऊर्जा थी, सकारात्मकता थी, उनके विचारों की अभिव्यक्ति थी, संवेदनशील समाज की कामना थी, हर पल खुश रहो की भावना थी, चलते रहो का सन्देश था, जाग्रत रहो की चेतावनी थी, गंगा की तरह निर्मलता थी, ऑक्सीजन जैसी शुद्धता थी, नदी की लहरों सा वेग था और भी बहुत कुछ था, जो सिर्फ प्रेरणा देता है।

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