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भवानी और हम- 1

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गंगा असनोडा

पति-पत्नि यानि विवाह का तकनीकी अर्थ इस समाज में दो शरीरों का रिश्ता होता है। मैंने भी नौ वर्ष और तीन माह वैवाहिक जीवन के गुजारे, लेकिन इतने समय में इस रिश्ते को कुछ नए तरीके से पहचाना और समझा है। मैंने जाना कि पति-पत्नी का रिश्ता कुछ और भी हो सकता है। जैसे- सबसे मजबूत मित्र। भवानी और मेरा भी पति-पत्नी के इतर एक और प्रगाढ़ रिश्ता था। गुरू और शिष्य का। भवानी पहली मुलाकात से ही मेरे गुरू की तरह रहे। इसीलिए पहली मुलाकात से लेकर मृत्यु तक वो मेरे सर ही थे। ’वो मुझे सिखाते रहे और सिखाते चले गए। मैं नहीं जानती कि मैं कितना सीखी, पर जो सीखी, बाबूजी की पाठशाला के बाद उनसे ही सीखी। हम कभी भी समाज के हिसाब के दंपत्ति थे ही नहीं। सिवाय दो बच्चों के माता-पिता होने के। फिर भी हमने शिद्दत से महसूसा था एक-दूसरे को। उनके जाने के बाद भी रीजनल रिपोर्टर के एक-एक अंक से उनकी आवाज आती है मुझे। नहीं मालूम कि पाठकों को आती है या नहीं, पर मुझे तो आती ही है।

हां! वो तपस्वी थे। उनका तप बार-बार याद आता है। रुलाता है, फिर ढांढ़स बंधाता है। कमजोर करता है और फिर अचानक मेरी मुट्ठियां बांध देता है। उसके न रहने का मलाल होता है, फिर भी उम्मीद बाकी है। वो जीवित नहीं है, पर उसका विचार आज भी जिंदा है, सदियों तक रहेगा- रीजनल रिपोर्टर के रूप में।

क्रमशः

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