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भवानी और हम

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गंगा असनोडा
भवानी मुझे बहुत तड़पाते थे। निष्ठुरता, बेपरवाहगी, मेरी किसी बड़ी समस्या को बहुत छोटा आंकना जैसा दिखाते, मेरे व्यक्तिगत काम के लिए कम से कम एक बार मुझे तगड़ी डांट लगाना और फिर तुरंत सबसे बेस्ट तरीके से करके दे देना। आखिर कुम्हार रूपी गुरू थे वो और मैं घड़ा रूपी शिष्य। फिर वो खोट कैसे न निकालते मुझमें। अन्तर से सहारा भी उन्हीं का होता था। ये अन्तर, मेरा मन था। उन्होंने तो कभी जताया ही नहीं। पर तब भी मैंने अपने मन की ही सुनी। संभवतः वो और मैं कभी अलग थे ही नहीं। इसलिए जैसा मेरा मन कहता, मैं जबरन मनवाने की कोशिश करती कि आप भी यही चाहते हो। मैं अपने आंकलन से कहूं, तो भवानी जी अपनी उम्र से कम से कम डेढ़ से दो दशक आगे के व्यक्ति थे। उनके हर शब्द, हर व्यवहार, हर विचार में यह परिपक्वता दिखती। उनके सामने मेरा ज्ञान नगण्य था। छोटी सी उम्र से ही स्वाध्याय के शौक से उन्होंने खुद को ऐसे सींच लिया था कि किसी भी विचार पर वे किसी भी विशेषज्ञ के साथ चर्चा के लिए तैयार रह सकते। इसके बावजूद पत्नी होने के अधिकार पर मैं कई बार उन्हें कुतर्कों से घेर लेती। शायद यही मेरे प्रेम जताने का तरीका था और उनका प्रेम पाने का भी। वो शायद मेरे उस प्रेमाग्रह को समझते भी थे और खूब मजे भी लिया करते थे ऐसी स्थिति में। मुझे परिपक्वता की ओर ले जाने का उनका तरीका था शायद ये। एक बार का वाकया है-

मैंने किसी काम पर उनसे जबरदस्ती उलझना चाहा और कहा, आप ये नहीं करोगे। उन्होंने कहा- क्यों नहीं? जरूर करूंगा। मुझे ठीक लगता है, इसलिए करूंगा। मैंने कहा- मेरे मन को ठीक नहीं लगता, इसलिए नहीं करोगे। उन्होंने कहा- मन….! मैंने फिर कहा हां- मन, जो आपके पास भी था कभी, आपका वो मन अब मेरे पास है। समाया हुआ है मुझमें। फिर जब तक न चाहूं, तुम कैसे कर लोगे कोई काम। वे जोर के ठहाके के साथ हॅंसे और मेरे कान के पास आकर बोले- मेरा मन, तुम्हारे पास है- फिर थोड़ा जोर से कहा- गिरवी रखवाया था क्या मैंने? मैंने एकटक उनकी आंखों में गौर से देखकर फिर जोर देते हुए कहा- नहीं, आपने यहां-वहां फेंक दिया था, मैंने संभाल लिया, अपने पास। वो एक बार फिर उसी ठहाके के साथ हॅंसे, अपना सिर हल्के से मेरे सिर से टकराया और फिर आंखों में देखकर सवाल की मुद्रा में बोले- तुमने! और संभाल लिया? इस पर मुझे भी मन ही मन हॅंसी आ रही थी कि मेरा डायलाॅग गलत दिशा में चला गया है। मैं झूठ नहीं बोल सकती। मैं तो यहां-वहां फेंक देती हूं। तरतीब से रखना या संभालना तो इनको आता है। मैंने अपनी बात बदली, नहीं-नहीं मैंने नहीं, संभाला तो आपने, शायद मेरा मन ही आपके पास है। जिसे मैंने कहीं खो दिया था, आपने संभाल लिया। तुम अच्छे संपादक ही नहीं, अच्छे प्रबंधक भी हो। मुझे तो संशय है कि अपने मन से अटूट कर दिया आपने मेरा मन। उन्होंने मेरी ओर तिरछी नजर करके देखा और फिर थोड़ा रुककर कहा- अच्छा! संशय है, विश्वास नहीं। ये ‘संशय’ सब तोड़ देता है मैडम। विश्वास रखो, जो सब जोड़ता है। मैंने फिर अपनी बात बदली- मुझे संशय है, पर आपको विश्वास है ना कि मेरा मन आपके मन में समाया हुआ है। इसलिए मेरा मन नहीं करता कि आप ये करो। तो आपको नहीं करना चाहिए। वो फिर ठहाका लगाते हुए कमरे से बाहर निकल गए- धीमी सी आवाज मुझे सुनाई दी बहुत संयत ढंग से उसी सिर हिलाने के अंदाज में उनके बाहर निकलने से पहले- ‘पगली है ये।’ उनके प्यार जताने का ढंग ऐसा ही था कि मेरी उलजुलूल बातों में भी वे मुझे कुछ न कुछ सिखाने की कोशिश में रहते। मुझे उन पर तब भी उतना ही विश्वास था, जितना आज। भवानी सशरीर नहीं, पर वह विश्वास उसी रूप में जिंदा है, जैसा रखने की उन्होंने सीख दी थी।

सचमुच उनका वो आसमानी प्रेम बहुत अलग था, करीने का था न था, लेकिन था आसमान के जितना ही बुलंद और वास्तविक।

क्रमशः

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