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मेरे मन के ज्वालामुखी और सुनामी- 5

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गंगा असनोडा

भवानी जी जितने स्पष्टवादी थे, उनकी सोच या मानसिकता भी उतनी ही स्पष्ट और पैनी। विवाह के इतने वर्षों में मैंने उनकी कथनी और करनी में अन्तर नहीं पाया।

पितृसत्तात्मक समाज के इस दर्प से वे पूरी तरह अछूते थे। एक बेहतर समाज और बेहतर राष्ट्र निर्माण के उनके स्वप्न में महिलाओं को समान अधिकार दिए जाने तथा सशक्त किये जाने की जरूरत भी शामिल थी। इस पर सिर्फ भाषण दिए जाने को वे बकवास मानते थे। कहते- चेतना से ही यह संभव है।

भवानी जी के साथ बहस मेरी जीवनचर्या का हिस्सा था। हम दोनों कब, किस बात पर वजह पड़ें, यह किसी को समझ नहीं आ सकता था। इसका कारण यह था कि हम जबरदस्त बहस के तुरंत बाद भी एक- दूसरे के साथ ऐसे व्यवहार में होते, जैसे अभी-अभी कुछ हुआ ही नहीं। कारण यह था कि भवानी जी मुझे परफेक्शन की और ले जाने के लिए जान बूझकर कोई बहस छेड़ते थे। मुझे भी इसका पूर्ण आभास रहता था। वो मुझे ऐसे लताड़ते थे कि मैं चुप हो जाती। फिर कुछ देर बाद उन्हें याद दिलाने की कोशिश करती कि आपने गृह लक्ष्मी को ऐसे डांटा, अब मैं अपनी दरियादिली दिखाने की कोशिश करते हुए चुटकी लेती कोई और होती ना तो मायके भाग जाती और तुम देखते ही रह जाते। मेरे ऐसा कहने पर वो खिलखिलाकर हँस देते और कहते जा न यार, कहीं चलने की बात करो तो तेरे पास छुट्टी नहीं होती। मायके के लिए भी शनिवार- रविवार का इंतजार करती है। मायके भागने वाली कुछ और होती हैं। तेरे बस में नहीं मायके भाग जाना।

उनकी इन सब बातों में कोई बनावटीपन नहीं होता। मुझ पर चीखते जरूर थे पर मैं भी पत्नी होने का पूरा सुख लेती थी बड़बड़ाकर।

उन्होंने पितृसत्ता की धौंस नहीं दिखाई। मैंने सब्जी- रोटी बनाई, तो वे परोस देते थे। मेरे लिए लंच को इंतजार करना ताकि मैं उनके कारण हर हाल में पहुँचूँ खाना खाने। जब से स्पोंडलयटिस की समस्या हुई, तो मेरे नाश्ता तैयार करने तक बच्चों को नहलाना और उनके कपड़े धोना भी अपने जिम्मे ले लिया। मैं बरस पड़ती आपने क्यों किया, और वो जोर से कहते- क्योंकि आपको नहीं करना था।
घोर पारंपरिक परिवार के बावजूडमेरे घर में महिला को इतनी बराबरी का अधिकार मिलना वास्तव में बड़ी बात थी। आज के समय में भी मैंने देखा है कि परम्पराओं के नाम पर ही महिलाओं का सबसे अधिक शोषण होता है। क्रमशः

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