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मेरे मन के ज्वालामुखी और सुनामी-6

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भवानी जी महिला सशक्तिकरण के सच्चे हिमायती थे-2

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विशुद्ध रूप से परम्पराओं के पोषक परिवार की इस बहू ने एक राष्ट्रीय समाचार पत्र में ट्रेनी रिपोर्टर से लेकर ब्यूरो चीफ तक के पद पर जिम्मेदारी के साथ काम किया। पिता के घर से ही सिद्धांतों की गठरी साथ लायी यह पत्रकार भवानी जैसे व्यक्ति के साथ ही अपने संस्कारों की मिल्कीयत को संभालने में सक्षम रही। वो भी तब जब भवानी आठ वर्षों से उसी शहर से एक मासिक पत्रिका का सम्पादन कर रहे थे।
वे मानते थे कि खबर की नैतिकता तभी कायम रहेगी, जब पत्रकार की नैतिकता बची रहेगी। एक पत्रकार के तौर पर मैंने जब उनसे, जैसा सहयोग माँगा, बिना डांट खाये मिला। छुट्टी के दिन भी जब मैं खबर की वेल्यू समझकर उनके ऑफिस में अपने ऑफिस के लिए खबर बनाने बैठ जाती, तो वे अपने ऑफिस के साथियों के साथ ठहाका लगाकर कहते- देखो जुनूनी पत्रकार के जूनून को, छुट्टी के दिन भी चैन नहीं। मैं भी खबर बनाने के बाद मैं बड़े प्यार से उनसे कहती- ये जूनून तब पूरा होगा, जब ये खबर छपेगी और छपेगी तब, जब समय पर पहुंचेगी। इसलिए इसे मेल करके जुनूनी पत्रकार के पति होने का फर्ज पूरा कीजिये। वो अपने सिर पर हाथ मारकर जैसे थोडा नाराजगी में सर हिलाते। मैं इतने देर में वहां से रफूचक्कर। थोड़ी देर में मुझे ढूंढते हुए कमरे तक या किचेन तक पहुँच जाते, कहते कन्फर्म कर लेना खबर पहुंची या नहीं।
मेरी प्रगति में उनका साथ ख़बरों के मूल्य को समझने-समझाने में सबसे अधिक रहा। मेरे उस गुरु ने हमेशा यही समझाया कि खबर, सिर्फ दो पक्षों की बात रखने तक सिमित नहीं हो सकती। वास्तविकता और विश्लेषण को ख़बरों से दूर रखना सिर्फ मेन्युपुलेशन हो सकता है, खबर नहीं।
मुझे मेरी आजादी, निर्भीकता से काम करने की ललक और ईमानदारी से खबर लिखने की प्रेरणा उन्होंने हर पल दी। अखबार में रहते हुए मैंने कभी भी, किसी से भी पत्रिका के लिए विज्ञापन नहीं लिया। हाँ! पत्रिका के लिए लिखने और सम्पादन में मैं पूरा सहयोग करती। भवानी जी कहते तू सामने होती है, तो काम में मन लग जाता है। इसलिए तू बैठी रहा कर। दरसल जब वो काम करते, तो एक- एक पेज डिजाइन कर मुझे दिखाते, फिर प्रूफ देखने को कहते। वे इतने साफदिल व्यक्ति थे कि अपनी पत्नी के सामने उन्हें यह मानने में कतई हिचक नहीं थी कि हिंदी की बिंदी में उनका हाथ तंग है।
क्रमशः

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