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“मैती मुल्क ” की परम्परा और संस्कृति

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कुछ सालों पहले त्रिजुगीनारायण जाती एक ठसा -ठस भरी जीप में बैठी,केदार घाटी की ठेठ ग्रामीण महिला ने अचानक ड्राईवर को जीप रोकने को कहा।
जीप रुकते ही वह महिला आराम से बाहर उतरी और जीप में बैठे एक आदमी को बाहर उतरने को कहा। आदमी के उतरते ही महिला ने उस पर झापडों और मुक्कों की बरसात कर दी। बुरी तरह पिट रहा यह आदमी , जीप में महिला से छेड़ा-खानी करने की कोशिश कर रहा था।
त्रिजुगीनारायण की उस पहाड़ी माता को तब से सारा इलाका “दीपा दारोगा” के नाम से पुकारता है। उनके पति मंदिर के आयोजनों में”रणसिंघा” बजाते हैं। दीपा जी का मायका मेरे मित्र सूबेदार सुरेन्द्र सिंह जी के गांव “त्युडि” है।
9 सितम्बर को “हिमालय दिवस” के दिन त्रिजुगीनारायण मेले का उद्घाटन करने के लिये मुख्यमंत्री हरीश रावत को आना था। उस दिन लोक गायक नरेंद्र सिंह नेगी को भी कार्यक्रम देना था।पाखले(काले उन की धोती) पहने, सर पर झुलका (सर ढकने का पल्लू) रखे , नाक में सोने की बुलाक , गले गुलबंद व चाँदी का कंठहार , हाथों में पैजी पहनी और मेहमानो के स्वागत हेतु गांव में उगे डहेलिया के चटक फूलों की माला लिए, अब अधेड़ हो चुकी दीपा दारोगा तथा उनकी टीम आने वाले अतिथियों के स्वागत में मुस्तैद खड़ी थी। अनुशासन इतना कि, “ब्लैक कैट कमांडो” भी पानी भरने लगे। ये माताये बिना आवाज किये पंक्तिबंद हो कर अतिथियों के पीछे खड़ी रहती। उनका हर एक्शन ड्रिल के हिस्से की तरह था।उस दिन बारिस के कारण मुख्य्मंत्री नहीं आने पर मुख़्य अतिथि और गायक दोनों की भूमिका निभा रहे, उत्तराखंड की छवि के” ब्रांड अम्बेस्डर “, नरेंद्र सिंह नेगी जी की आवभगत में उनके पीछे छाया की तरह चल रहा माताओं का यह दल, उत्तराखंड की महिलाओं की एक अलग पहचान पेश कर रहा था।
1990 से मैं बदलते चमोली-रुद्रप्रयाग को समझने की कोशिश कर रहा हूं। हमारे इस इलाके की परम्परा,सिक्छा और संस्कृति की सारे गढ़वाल में मिसाल दी जाती थी। कभी पूरे उत्तराखंड में हमारे इलाके के अध्यापकों ने ज्ञान की रोशनी जगाई।
पर लगभग दो दशकों से कुछ अधिक समय से दीपा जैसी शेरदिल, चरित्रवान, संस्कृति व परंपरा की रक्छा करने वाली इन माताओं के बजाय, कुछ आयातित दुर्दांत महिला नेत्रियां , केदार घाटी और रुद्रप्रयाग का प्रतीक बन गयी। ये हर हथकंडे में माहिर हैं, इनके कारनामों और गिरोहबंदी के सामने यू पी- विहार के शातिर नेता भी पानी भरते हैं।
ऐसे में शालीन ,सर पर हमेशा पल्लू रखकर चलने वाली लेकिन हर बुराई का प्रतिकार करने वाली हमारी माता- बहिने हमारे सामाजिक- राजनीतिक परिवेश में हासिये पर चली गयी हैं। हाल ही में इस बदलते चरित्र पर मैंने गढ़वाली हास्य कवि मुरली दीवान जी की मजेदार कविता का आनंद, मालकोटि गांव में लिया था।
मन्दाकिनी नदी के दोनों और की “मूल निवासी” दीपा जी और उनकी जैसी और कही माता- बहिनों को मेरा सलाम। ये ही तो मन्दाकिनी के “मैती मुल्क ” की परम्परा और संस्कृति के बीज नयी पीढ़ी में डाल रही हैं।
वरिष्ठ पत्रकार मनोज रावत की फेसबुक वाल से

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