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“”—शख्स से शख्सियत Y S Negi जी-“””

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पक्षी विशेषज्ञ Y S Negi(यशपाल सिंह नेगी ) जी के साथ मिलने का मौका मिला। ऊनके निवास मक्कूमठ मै, पक्षियों की 300 से ज्यादा प्रजातियों की रिपोर्टिग कर चुके भेजी नेगी जी इन पक्षियों की हर एक आदतों से हैबिटैट से भली भाॅति वाकिफ है।
नेगी जी ने अपने घर को ही पक्षी म्यूजियम बनाया है। चारों और अपने द्वारा ली गई फोटो लगाई है, सारा काम ग्राउंड लेवल पर किया है।
आज अपने आप मैं एक सेलिब्रिटी बन चुके नेगी जी को देश के कोनो कोने से लोगों के फोन आते है,तो नेगी जी अपाॅइंमैन्ट का समय देकर बुला लेते है उन्हें और पक्षियों की हर एक आदत से फिल्ड मै वाकिफ करवाते है।
घरेलू चिड़िया गौरैया को बचाने मैं दुनिया की सबसे बड़ी संस्था IUCN लगी है बहुत सारी योजनाएँ बनाई जा रही है। पर हमारे घर आंगन मैं चहकने वाली ये चिड़िया घेन्दुडी रेड डाटा बुक मे जाने को तैयार है। इसी चिंता के मद्देनजर श्री नेगी जी ने अपने घर गाँव के मकानों मैं ईट के बीच छोटे छोटे छेद बनवाये है ताकि इस पोथळी को बचाया जा सके। और इसी से प्रेरित होकर मैंने घर आते ही पहला घेन्दुडी घर अपने मकान की दीवार मैं बनाया।
सवाल ये है कि आखिर क्यों इस चिड़िया को हम कृत्रिम घोंसला बनवाये?
जंगल मे पेडो पर बना लेगी।
जी हाँ प्रश्न जायज है पर उत्तर ;
जंगलों की बणांग आग,
शिकारी पक्षियों द्वारा इनका शिकार,
भोजन पानी की कमी,
घटती हरियाली,
बंदरो द्वारा इनके घौसले से इनके अण्डे बच्चे खा लेना, और बड़े पक्षियों द्वारा इनके घौसलो मैं अतिक्रमण करना ये सब कई कारण है जो इनको विलुप्ती के कगार पर पहुँचाने को काफी है।
अब हमें इनके लिए अपने मकानों मे छोटे ऐसे छेद बनाने है कि छेद का म्वोर-दरवाजा, इतना बडा न हो, कि इसमे बडे पक्षी अतिक्रमण करे। दूसरा हमारे द्वारा इनको घर बनवाने से हमारे घर मकानों को कोई नूकसान नही पहुँचेगा।
घेन्दुडी गौरैया को क्यों बचाया जाये? इसका जबाब है—-
1-इन चिड़ियो की चहचाहट मन को सुकून देती है
2-अपने आप मैं तनाव से निजात की बैस्ट थैरेपी है
3-फल-फूलों के परागण मे इनका अमुल्य योगदान होता है।
4-हानिकारक कीट पतंगो ,मच्छर के लार्वा को नष्ट करते है ।
5-इनका धरती को हरा-भरा करने मैं अहम योगदान होता है
6-फारेस्ट इकोसिस्टम को संतुलित बनाने मे अहम कड़ी है पक्षी।

तो आशा है आप भी अब अपने घर आॅगन को पुनः इन पक्षियों के कलरव से रंग बिरंगी बसंती रंग मे रंगोगे।
अपने नये पुराने मकानों मे दीवारों पर छत के नीचे ये कृत्रिम आवास घौसले बनवाकर घेन्दुडी बचाने मैं अपना अमुल्य योगदान देंगे।
वरना वो दिन दूर नहीं जब हमारे बच्चे हमसे पूछेंगे कि ये घेन्दुडि कैसी होती थी? कहाँ रहती थी?
मनुष्य का आस्तित्व को बचाने के लिए आज प्रकृति के घेंदुडि गौरैया जैसे जीवों को बचाना हमारा न सिर्फ़ नैतिक अपितु संवेदी कर्तव्य भी है।

aswani

अश्विनी गौड़ “लक्की” दानकोट, लोकभाषा आंदोलन रूद्रप्रयाग बिटि
अध्यापक विज्ञान, राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय पालाकुराली जखोली रूद्रप्रयाग।

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