udaydinmaan, News Jagran, Danik Uttarakhand, Khabar Aaj Tak,Hindi News, Online hindi news सांठ - गांठ से रची साजिश (आदर्शवादी ही मचाने लगे लूट . भाग - २ )

सांठ – गांठ से रची साजिश (आदर्शवादी ही मचाने लगे लूट . भाग – २ )

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सांठ – गांठ से रची साजिश (आदर्शवादी ही मचाने लगे लूट . भाग – २ )

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सरकारी जमीनों की लूट बिना तंत्र से साठं-गांठ के संभव ही नही होती। उस पर आदर्शवादी ही मध्यस्यता में दिन रात एक कर दें, तो घोटाले यथार्थ के धरातल पर आकार ले ही लेते है। हैरत की बात ये कि जिन उॅचाईयों पर ये कुण्डली मारे बैठे है वहां से इन्हें सारा समाज रैगते कीड़ो सा नजर आता है। इस सत्य कथा में दो ऐसे लोगो का नाम आया है जो उत्तराखण्ड की राजनीति में अपनी ठोस जमीन तलाश रहे है।

पिछले भाग के हवाले से
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वेद प्रकाश अग्रवाल ने अपने अधिनस्थों को बड़ी रकम देकर वन विभाग तथा राजस्व विभाग से साठ गांठ कर विवादित भूमि हेमंत चंद्र पांडे को बेच दी। जिसमें इमारत के रूप में एक बड़ा व्यवसायिक प्रतिष्ठान स्थापित कर दिया गया है। इस अवैध प्रतिष्ठान, जिसका नक्शा भी साजिशन वैध घोषित किया गया है। सरकारी मशीनरी व न्याय व्यवस्था के मुंह पर करारे तमाचे जैसा है।

पृष्ठ भूमि-
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12 नवम्बर सन् 1968 में उक्त विवादित भूमि वेद प्रकाश अग्रवाल ने पंजीकृत बैनामे से खरीदी। जो वेदवृत एवं वेद बंधु सगे भाईयो के साथ ग्राम हल्द्वानी मल्ली के खेत संख्या -13 के खेत नंबर 179 एवं 180 मेें दर्ज थी। जिसका कुल रकवा 5 बीघा 6 बिस्वा था। घर बटवारे में यह जमीन श्रीमती दुर्गा देवी पत्नी देशबंधु व उसके पुत्रों के नाम दर्ज हो गयी थी। जिसका साबिक खेत नं. 179 एवं 180 वर्तमान नं. 45 ;कद्ध है।

साजिश का चक्रव्यूहः-
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उक्त विवादित भूमि में वेद प्रकाश अग्रवाल की साजिश कोई नई नहीं है। जिला सर संघचालक की साजिशे रचने की महारथ 5 दशक पुरानी है। बस हर बार मोहरे जरूर बदल लेते है। वेद प्रकाश जी सन् 1970 में ‘जमीदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियिम’ लागू होने के चलते हिस्सेदारी का गांव होने से उक्त भूमि खतौनी वर्ग-1 ;कद्ध श्रेणी में दर्ज होनी चाहिए थी। मगर वेद प्रकाश की रची साजिशो मेें शामिल तहसील कर्मियों ने इसे वर्ग-5 ;डद्ध बंजर भूमि में दर्ज कर दिया। इस तरह के काम गलती से नही बल्कि साजिशन किये जाते है। राजस्व विभाग को आक्सीजन भी पटवारियोें की ऐसीे कलम से मिलती है।

राजस्व से जुगलबंदी-
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एक बार पटवारी इंट्री बदलता है तो उसे ठीक कर भूमिधरी श्रेणी में दर्ज कराने का सफर जुगल बंदी से आसान हो जाता है। यूं तो ये रास्ता आम आदमी के लिए जटिल है, ईमानदार के लिए और भी कठिन है लेकिन राजस्व विभाग ने राजस्व के नाम पर मुनाफे की लाईन में बैठे लोगो के लिए काली कमाई का जरिया बन जाती है पटवारी कीे एक इंट्री। यह प्रक्रिया कलेक्टर को एक नोटिस देकर शुरू हो जाती है। कलेक्टर साहब खुद सरकार है, वो खुद नोटिस का जवाब नहीं देते। उनके मातहत एसडीएम का दर्जा न्यायालय का हो जाता है। सरकार के नाम पर एसडीएम कोर्ट में मुकदमा हो जाने पर जवाब दाखिल कर देते है। फिर वकील और एसडीएम के बीच पटवारी गवाह बन कर आता है। अब पटवारी जो कह देगा वह निर्णय हो जाता है। इस प्रक्रिया में वेदप्रकाश भी चले आये। वे आम आदमी तोे थे नही, शहर के धन्नासेठों में नाम है और बड़े संगठन में पदाधिकारी होना भी काबीलियत ही मानी जाती है। इसलिये खुद न्यायालय नही गये। उन्होने पार्टी के एक चेहरे को मोर्चे पर भेजा, ये नेता जी मैदान में तो आ गये पर जनाब वकील नही थे। मजबूरी मंे वकालतनाम लगाना पड़ा। वकील की फीस जो भी रही हो सहायक कलेक्टर के न्यायालय में काम करने के लिए कितना सुविधा शुल्क सेठ जी से लिया गया और कितना ओरों में बंटा यह नेता-अधिकारी ही जानते है। ये सारी बाते अब एसडीएम कोर्ट की दीवारो से रिसने लगी है। बहरहाल नेता जी के बाद दो और राजनितिक चेहरे मैदान में आये जिन्होने पूरे काम को सिरे लगा दिया है।

पैरवी की प्रणाली
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ऐसे विवादित मामलों मेे अपील कानून का अगला रास्ता है। सरकारी वकील राजस्व के मामलों में न तो रेवन्यू कोर्ट उचित तरिके से पैरवी करते है और न अपील में जाने की सोचते है। हालात ये है कि कोर्ट में सरकारी वकील कुछ भी नहीं पूछते है। उनका काम भी ‘पार्टी ’ खुद ही करती है। कोई कहता है कि सरकारी वकील नैनीताल ही रहते है उन्होंने अपना एक प्रतिनिधि यहा अवैधानिक रूप से नियुक्त किया हुआ है। जानकार लोग बताते है कि सर्वोच्च न्यायालय ने सरकारी वकील बनाने की एक प्रक्रिया तय की है। मगर उत्तराखण्ड में ये बाते मायने नहीं रखती। यहां सरकारी वकील बनने के लिए एक ही आर्हता जरूरी है कि जिस वक्त जो नेता ताकतवर हो उसके करीबी बन जाओ। ऐसे मानको और रिवाजो में वेद प्रकाश जैसे लोगो की राह के कांटे हटते चले गए।

अन्ततः
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उक्त विवादित भूमि को जायज ठहराकर बेच दिए जाने के सम्बन्ध में कुछ सवाल मुंहबाए खडे है जैसे कि – ;1द्ध शहरी क्षेत्र में ‘उत्तर प्रदेश जमीदारी उन्मूलन एवं भू विकास अधिनियम’ के प्रावधानों का आधार कैसे ले लिया गया। ;2द्ध पिछले 5-6 वर्षो से ही भूमिधरी घोषित करने के मामलों में तेजी कैसे आ गयी। ;3द्ध क्या इससे पहले ये आम जनता की जरूरत नहीं थी या 229 -बी के अन्र्तगत दावा करने की राय वकील बन्धु नहीं दे पा रहे थे। जो भी इस खेल में भागीदारी करने वाले है सभी नेतागण और सम्बन्धित विभागों के अधिकारी/कर्मचारी प्रतिभागियों के नाम जल्द सामने आ ही जाएगा……

* संजय रावत

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