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सोचा अनाथ हो गया लेकिन गॉव ने बहनों को महसूस ही नहीं होने दिया।

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(मनोज इष्टवाल)
माँ की अंत्येष्टि के साथ ही घाट से घर पहुँचते ही लगा अनाथ हो गया हूँ। सारी बहनें जीजा जवाई टूटे मकान के एक हिस्से में सामूहिक शक्ति के साथ जहाँ मेरे कांधों को सबल बना रहे थे वहीँ मैं यही सोच रहा था कि माँ होती तो इस मास में बहनों को कखड़ी, मुंगरी, मूला, सब्जियां इत्यादि भर- भरकर व् अखरोट व् चूड़े इत्यादि सौगात देती । लेकिन जब गृह लक्ष्मी ही घर को अनाथ बना दे तब औरों की बात ही क्या करनी।
ऐसे में आज जब बहनें विदा होने को थी तो दिल अंदर ही अंदर खाने को आ रहा था। जिस घर से जब बहनें विदा होती थी तो माँ जाने कितनी सौगातें देकर बेटियों जवाईयों को विदा करने जाती थी ऐसे में मन कह रहा था काश….माँ होती तो आज बहनें यूँ विदा नहीं होती। इस सोच ने पिछली रात बहुत बिचलित किया।
लेकिन यह क्या अभी भोर प्रारम्भ भी नहीं हुई थी कि गॉव के विभिन्न घरों से बहनों का नाम ले ले कर तंमाम सौगातें पहुचने लगी। देखते ही देखते थैले भरने शुरू हुए सामान बढता देख अब थैले कट्टों में तब्दील हो गए।
साथ ही माँ बहनें चाची ताई सब नाम ले लेकर बहनोँ को कहते कि ये मत सोचना माँ नहीं रही तो मायका ही भूल जाओ । हम हैं न जब मन करे बेहिचक चले आना।
गॉव का यह प्यार जाने बहनों की आँखों में कितनी बार बहा। वे अपने अपने ससुराल की बात आपस में करती व जीजा जवाई लोगों पर कटाक्ष करती कि क्या ऐसा तुम्हारा गॉव भी है। वे सभी निरुत्तर होते।
ऐसे में अपने गॉव धारकोट के प्रति न सिर्फ मेरी आँखों में बल्कि उन जीजा जवाईयों की आँखों में भी मेरे गॉव के प्रति सम्मान झलकता दिखाई दिया।
मुझे गर्व है ऐसे गॉव पर जहाँ 12 जाति के जनमानस रहते हैं व् जहाँ मेरा जन्म हुआ। मेरे गॉव ने आज जता दिया कि न मैं अनाथ हुआ न मेरी बहनें । वरना माँ पिताजी की मृत्यु के बाद बेटियां तो अपने मायके को अब अक्सर भूल ही जाती हैं। आज गॉव के इस प्रेम को देख बहनों की आँखों में जितनी चमक व् अश्रु मोती दिखे भला कौन बेटी होगी जो ऐसे गॉव का मोह त्याग दे । मैं धन्य हूँ जिसने ऐसे गॉव में जन्म लिया जहाँ आज भी प्रेम प्यार व् भाई चारे की गंगा बहती है।

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