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हुजुर मैं गैरसैण हूँ —!!

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मुझे गेस्ट राजधानी मत बना देना–!! ग्राउंड जीरो से संजय चौहान

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मैं गैरसैण हूँ । राज्य बने हुये 16 बरस बीत जाने को है लेकिन आज भी राजधानी के नाम पर पर पसरा कुहांसा साफ नहीं हो पाया है। मुझे राजधानी बनाने के सपने को लेकर अलग राज्य की लड़ाई लड़ी गई थी। राज्य तो मिला लेकिन राजनीति के योद्धाओ ने मुझे राजधानी घोषित करने की जगह स्थाई राजधानी चयन आयोग की बोतल मे बंद करके रख दिया। जिसके बाद बारी बारी से उसका कार्यकाल बढ़ाया गया। मेरे बाद रायपुर मे भी विधानसभा भवन के लिए मंजूरी समझ से परे है। राजनीति के पुरोधाओं ने मेरे नाम को भुनाकर अपनी राजनीति चमकाई है। लेकिन जब मेरे नाम की वकालत करनी होती है तो वे मौनी बाबा बन जाते हैं। 16 सालों मे ठीक चुनाव से पहले मुझे स्थाई राजधानी बनाने के नाम पर राजनीति की चासणी में उबाला जाता है ताकि मेरे नाम से ज्यादा से ज्यादा वोट अपनी ओर खींचा जा सके। और चुनाव में गैरसैण एक मुद्दा बने। 16 सालों से मैं इसी तरह से छला जा रहा हूँ। अबकी बार छन छन कर जो खबरें मुझे मालूम हुई है कि सरकार का अतिंम विधानसभा सत्र मेरे भराडीसैण मे निर्माणाधीन भवनों मे संचालित होगा और इसी सत्र में राजधानी के नाम पर कुछ बड़ा फैसला भी आयेगा। एक तरफ राजधानी के नाम पर मेरी उम्मीदों को पंख लग गये है तो दूसरी तरफ आशांकित भी हूँ कि कहीं वर्तमान मे जिस तरह से प्रदेश में गेस्ट टीचर। गेस्ट फार्मासिस्टो को चुनावी झुनझुना दिया जा रहा है। तो कहीं राजधानी के नाम पर मुझे भी गेस्ट राजधानी घोषित न किया जाय। —- मैं गैरसैण हूँ –!!!! आज मुझे गिर्दा की निम्न पंक्तियाँ बरबस ही याद आती है।

कस होलो उत्तराखंड , कां होली राजधानी ,
राग – बागी यों आजी करला आपडी मनमानी ,
यो बतौक खुली- खुलास गैरसैण करुलो !
हम लड़ते रयां भूली , हम लड़ते रूंल !!

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