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आ अब लौट चलेंः अपने वतन लौटे विदेशी पक्षी

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ऋ षिकेश । हजारों किलोमीटर की दूरी तय कर विदेशों से आने वाले प्रवासी पक्षियों ने वापस अपने देश के लिए उड़ान भर ली है। अब हिमालयी क्षेत्रों से आने वाले पक्षी भी लौटने लगे हैं।

 

तीन माह तक रंग-बिरंगे पक्षियों की चहक से गूंजने वाले गंगातट अब सूने नजर आ रहे हैं। इस बार सबसे पहले अक्तूबर माह में मेलार्ड और रूडी सेल्डक प्रवासी पक्षी यहां पहुंचे थे। जबकि पोचार्ड, ग्रो, शोवलर, पिन्टेल, डार्टर सहित करीब बीस प्रजाति के प्रवासी पक्षी दिसंबर माह में पहुंचे। रूस, कजाकिस्तान, मंगोलिया व चीन से आने वाले प्रवासी पक्षी वापस अपने देश लौट गये हैं।

 

जबकि हिमालयी क्षेत्रों के कोरमोरेन्टस, ग्रे-हेरोन सहित आधा दर्जन प्रजातियों के पक्षियों के लौटने का सिलसिला भी शुरू हो गया है। तीन माह से अधिक समय तक ये पक्षी लक्ष्मणझूला, कौडिय़ाला, गौहरीमाफी सहित अन्य क्षेत्रों में गंगा तटों पर रहे। पक्षी वैज्ञानिकों के अनुसार इस बार ऋषिकेश में चार सौ के आसपास पक्षी पहुंचे।

 

अंतरराष्ट्रीय पक्षी वैज्ञानिक डॉ: दिनेश भट्ट बताते हैं कि औद्योगिक क्रांति के चलते कार्बन डाइ आक्साइड गैस वातावरण में तेजी से फैल रही है। इससे प्रवासी पक्षियों के भारत में आने की संख्या में कमी आई है। पहले हरिद्वार से ऋषिकेश के बीच बीस हजार से अधिक प्रवासी पक्षी आते थे। जिनकी संख्या अब तीन-चार हजार तक रह गई है।

 

वह बताते हैं कि वर्ष 1900 में कार्बन डाइ आक्साइड 280 पार्ट पर मिलियन थी। जो अब बढक़र 400 पार्ट पर मिलियन तक पहुंच गई है। पक्षी वैज्ञानिक डॉ. विनय सेठी ने बताया कि कड़ाके की ठंड से बचने को हिमालयी क्षेत्रों के साथ विदेशी पक्षी भारत आते हैं। इस वर्ष मेलार्ड और रूड़ी सेल्डक जो चीन, रूस और कजाकिस्तान से आते हैं, सबसे पहले यहां आये हैं।