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2019 से एक साथ हो सकते हैं विधानसभा और आम चुनाव

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नई दिल्ली। मार्च में पांच राज्यों में चुनाव निपट जाने के बाद चुनाव आयोग और विधि आयोग एक बड़ी पहल शुरू करने वाले हैं। लोकसभा चुनाव और कम से कम आधे राज्यों में विधानसभा चुनाव एक साथ आयोजित करवाए जाने के मुद्दे पर औपचारिक बातचीत शुरू की जाएगी।लॉ कमिशन के चेयरमैन जस्टिस बीएस चौहान ने कहा कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव, एक साथ कराना मुमकिन है और सभी पक्षों की रजामंदी मिलने पर ऐसा 2019 लोकसभा चुनाव के दौरान हो सकता है।

चौहान ने कहा, ‘असेंबली चुनाव खत्म होने के बाद हम इस मुद्दे पर चुनाव आयोग से चर्चा करेंगे।’ चौहान ने माना कि दोनों चुनाव एक साथ करा पाना मुमकिन है और इसके लिए विधि आयोग के सदस्यों को चुनाव आयोग के साथ चर्चा करने की आवश्यकता है। बता दें कि इस मुद्दे पर संसद की स्टैंडिंग कमिटी चर्चा कर चुकी है। कमिटी ने दिसंबर 2015 में संसद में दाखिल अपनी रिपोर्ट में साथ चुनाव कराने को लेकर कुछ सुझाव दिए थे। इन सुझावों में पहले चरण में लोकसभा चुनाव के साथ कम से कम आधे राज्यों में विधानसभा चुनाव कराने की सिफारिश भी शामिल थी।

बाकी के आधे राज्यों में उस वक्त चुनाव कराने की सिफारिश की गई, जिस साल वहां की सरकार का पांच साल का कार्यकाल पूरा होता।पांच राज्यों में चुनाव खत्म होने के बाद केंद्र सरकार विधि आयोग को इस मामले में विचार विमर्श शुरू करने के लिए औपचारिक तौर पर कह सकती है। पूर्व में विधि आयोग और चुनाव आयोग ने इस मुद्दे पर गहराई से चर्चा की थी। चुनाव आयोग ने तो संसद की स्टैंडिंग कमिटी के सामने इस मुद्दे पर विस्तृत रिपोर्ट भी सौंपी थी, जिसमें कई तरह के विकल्प सुझाए गए थे।
चौहान ने बताया कि आजादी के बाद देश में एक साथ चुनाव होना सामान्य बात थी। शुरुआत के तीन आम चुनाव (1952, 1957, 1962) में लोकसभा चुनाव के साथ ही विधानसभा के चुनाव हुए। साथ चुनाव होने की प्रक्रिया पहली बार 1968 में बाधित हुई। बाद में कुछ और विधानसभाएं अपने कार्यकाल से पहले भंग कर दी गईं। कई बार लोकसभाएं भी भंग हुईं। ऐसा पहली बार 1970 में हुआ।
नीति आयोग की ओर से कराई गई एक स्टडी के मुताबिक, अमूमन हर छह महीने पर दो से पांच विधानसभाओं के लिए चुनाव हो रहे हैं। लगातार होने वाले चुनाव सरकार के कामकाज में बाधा डालते हैं। इससे विकास कार्य भी बाधित होते हैं क्योंकि आदर्श आचार संहिता लागू होने के बाद सरकार के हाथ बंध जाते हैं। इसके अलावा, चुनाव आयोजित कराने में होने वाला भारी भरकम खर्च भी सभी चुनाव साथ कराए जाने की दिशा में सोचे जाने की एक बड़ी वजह है।