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अब मसाण भी कना पलायन, देहरादून मां भी …!

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संतोष *सप्ताशु*
देहरादून। अब मसाण भी कना पलायन, देहरादून मां भी…! आपको यह अटपटा लग रहा होगा, लेकिन यह सत्य है। आप इस लाइन को पढ़ने के बाद यही कहेंगे कि इस डिजिटल युग में मसाण और वह भी पलायन कर रहे हैं ! यह क्या ड्रामा है भाई, कुछ भी…!

इन लाइनों के माध्यम से मैं कोई सनसनी नहीं फैला रहा हूॅ। पहाड़ में जिसका भी जन्म हुआ और वही पढ़ लिखने के बाद वह रोजगार की तलाश में शहरों की ओर आया तो उसे मसाण, ऐड़ी-आच्छरी और वन देवताओं के बारे में ज्ञान होगा ही। फिर जब हमने पलायन कर लिया तो ये सब पहाड़ में अकेले क्या करेंगे। स्वाभाविक है कि हमारा इनके बिना जीवन और इनका हमारे बिना जीवन व्यर्थ है। सो ये भी पलायन की मार को झेल नहीं सके और चले आये हमारे पीछे-पीछे देहरादून।

चलिए आपको कहानी से पहले रूबरू करवाता हूॅ। मसाण, ऐड़ी-आच्छरी और वन देवता। ये सभी पहाड़ में हमारे रक्षक होने के साथ-साथ हमारे खास मित्र भी हैं। ये कैसे इस बारे में आपने कई बार पढ़ा होगा। पहाड़ और वन देवता,ऐड़ी-आच्छरी और मसाण, पहाड़ में जन्म लेने वाला कभी इनके बारे में न तो ज्यादा प्रतिक्रिया व्यक्त करता है और न ही बहस। यह पोस्ट भी खास पहाड़ के लोगों के लिए ही है। इस पोस्ट को में एक अनुभव के बाद ही लिख रहा हूॅ।

आपको बता दूॅ कि पिछले 10 सालों से देहरादून में निवास करते हुए मैंने यहां रहते हुए जिस कुल में जन्म लिया उसके धर्म को कभी नहीं भूला और उसका पालन करते आ रहा हूॅ। अर्थात यहां अन्य कार्य करते हुए पंडिताई भी करता हूॅ। पिछले दो सप्ताह पूर्व एक यजमान से लंबे समय बाद मोबाइल पर बात हुई और उन्होंने अपनी परेशानी बताने के साथ-साथ मुझे कहा कि पंडित जी बेटी पर मसाण लगा है और उसकी पूजा करनी है।

मैं आधुनिक युग में जी रहा हूॅ तो मैंने इसे बकवास बताया और मैंने टाल-मटोल करने के लिए श्रावण मास सहित कई अन्य कारण पूजा के लिए सही समय नहीं है बताया। लेकिन उन्होंने अपनी जिद कि शनिवार को आप कुछ भी करों पर पूजा करो। जो थोड़ा ज्ञान पिताजी से बटोर सका था उसके आधार पर उनके घर गया तो मैरे जाते ही उनकी पुत्री कुछ अजीब हरकतें कर रही थी। मैंने जाते ही पूछा कि क्या डाक्टर को नहीं दिखाया।

जब उन्होंने डाक्टरों के बिल और पिछले एक साल का खर्चा बताया तो मैं दंग रह गया कि क्या वास्तव में मसाण अपनी पूजा लेने के लिए ऐसा कर सकता है। मन में यही सोच रहा था कि उन्होंने कहा कि आज आप पूजा करों। मैने कुछ सामान मंगाया और पूजा कि विधि प्रारंभ की। पूजा के दौरान उनकी पुत्री शांत थी और मैंने मसाण पूजा का उन्हें दिन दिया और कहा कि जब तक पूजा नहीं हुई तब तक यह शांत रहेगी। वह मसाण की पूजा तक शांत रही, जिस दिन पूजा थी मैंने विधि विधान से पूजा करवायी और मसाण को शांत किया।

आज इस पोस्ट को लिखने से पहले में उनके घर गया। पूजा किए आज एक सप्ताह हो गया था और यजमान जी मुझे रास्ते में मिल गए और उन्होंने कहा कि घर चलों। मैं चला गया और पता चला कि पूजा के बाद से उनकी पु़त्री ठीक है और उसका पहले का व्यवहार और आज को व्यवहार मुझे अच्छा लगा। बात-बात में उन्होंने कहा कि पूर्जा-अर्चना के बाद से उनकी बेटी ठीक है। मैं आश्चर्य में पड़ गया कि क्या वास्तव में मसाण हमारे साथ ही पलायन कर गये और पूजा से शांत हो गए। यह तो चमत्कार है।

इस अनुभव के बाद में तो यही कहूंगा कि मसाण भी अब मजबूरन पलायन कर गए हैं। अगर ऐसा नहीं है तो उपरोक्त बेटी देहरादून के बडे़ से बडे़ डाक्टरों की मोटी फीस के बाद मेरी छोटी से पूजा-अर्चना करवाने के बाद कैसे ठीक हो गयी। यह तो हमे मानना ही पडे़गा कि जब हमारे गांव खाली हो गए, हमारे खेत-खलियान बंजर हो गए, हमारे छोडे़ हुए मकानों में कोई रहने वाला नहीं है, हमारे गांव के आस-पास के जंगलों में आज कोई नहीं जाता है तो वहां निवास करने वाले देवी-देवता, मसाण,ऐड़ी-आच्छरी भी किसके साथ रहेंगी। सो उन्होंने भी पलायन कर देहरादून को ही अपना आशियाना बना दिया है। यह बात तो सत्य है।