udaydinmaan, News Jagran, Danik Uttarakhand, Khabar Aaj Tak,Hindi News, Online hindi news अनोखा त्योहार: विश्व में सिर्फ पहाड में मनाया जाता है फूलदेई त्यौहार! 

अनोखा त्योहार: विश्व में सिर्फ पहाड में मनाया जाता है फूलदेई त्यौहार! 

Spread the love

न्यूता जाता है घोघा- डोली के लिऐ पय्या, पहाड़ के गांव-गांव में बच्चे मनाते हैं फूलदेई त्यौहार

 

 दीपक बेंजवाल

विश्व में उत्तराखंड का पहाड एक ऐसा स्थान है जहां की संस्कृति और सभयता पूरे विश्व में अलग है। यहां चैत्र मास में बच्चों द्वारा मनाया जाने वाला एकमात्र त्यौहार है फूलदेई त्यौहार जो कहीं नहीं मनाया जाता है। इस त्यौहार को लेकर बसंत का वह श्रृगार और वसंत की खूसबू भी शायद विश् में ऐसी कहीं हो। आज हम बात कर रहे है इसी त्यौहार की। इसके बारे में हालांकि कोई इतिहास तो नहीं है लेकिन हमने और हमारे पिताजी से लेकर दादाजी तक हमने सुना है कि इस त्यौहार को मनाया जाता है और हमने भी मनाया और आज हमारे बच्चे भी इस परंपरा हो जिंदा रखे हैं। धन्य है मेरा पहाड।

 

पहाड़ के फूलदेई त्यौहार की आराध्य देवी “घोघा ” की उत्पति कब और कैसे हुई, इसका वर्णन बहुत खोजने पर भी नही मिल पाया, लोकपंरपराओ में घोघा माता को फूलो की देवी, बंसत की देवी और प्रकृति की बेटी माना जाता है। कहते है देवी का अवतरण फूलो के साथ धरती पर हुआ। इसीलिऐ फूलो के साथ उसे पूजा नचाया जाता है।प्यूली, बुराँस, कुखड़ी, सिलपाड़ी, क्वीर्याल के रंग-बिरंगे फूलों को चुनकर बच्चों ने फूलकंडी अगली सुबह मनाये जाने वाले फूलदेई के लिए रखी। चैत्र मास के आगमन के साथ गढ़वाल में नवसंवत्सर के स्वागत के लिए पुराने समय से फूलदेई त्यौहार मनाये जाने का रिवाज है। इसकी शुरुआत करते नन्हें-मुन्ने बच्चे रतखुलणी (रात खुलते समय) घर-घर की दहलीज पर फूल चढ़ाते हुए घर की खुशहाली की कामना के गीत गाते हैं। जै जै घोघा माता फ्यूँल्या फूल, दे दे माई दाल-चैल, रंगीला सजीला फूल ऐंगी, डाला बोट्ला हर्या ह्वैगीं, पोन पंछी दौड़ी गैन, डाल्यूँ-फूल हंसदा ऐन।

 

घोघा माता के रूप में उन्हें फूलों की देवी मानकर पूजा जाता

फूलों का यह पर्व आठ दिनों तक चलता है, अठड़वा को इसके भोज के साथ बच्चे इसे विदा देते हैं। गढ़वाल में कहीं-कहीं यह फूलपर्व पूरे महीने मनाया जाता है। बच्चे बिखोती तक इसके साथ उत्साह से जुड़े रहते हैं। इस लोकपर्व को मनाने के पीछे मान्यता होती है कि हमारा समाज फूलों के साथ नये साल की शुरूआत करे, वो सदा ही फूलों की तरह महकते रहे, उनके जीवन में फूलों के समान हर्ष व उल्लास छाया रहे। घोघा माता के रूप में उन्हें फूलों की देवी मानकर पूजा जाता है। फूलों की यह देवी केवल इसी त्यैाहार में पूजी जाती है और इसे पूजने वाले भी केवल बच्चे ही होते हैं। बंसत के आने की खुशी का यह त्यौहार बच्चों के साथ लोकजीवन से जुड़े ढाक्की, बादी, औजी व हुड़क्या भी गाँव-गाँव जाकर चैती गाते व बजाते हंै। माना जाता है कि पहाड़ में चैत संगराद आते ही विवाहित बहू-बेटियों को मायके की खुद सताने लगती है, जिन्हें मायके की सन्त खबर देने के लिए चैती ढोलारी गाँव-गाँव घूम कर उन्हें मैत का समाचार बताते हैं। ‘‘तुमारा भंडार भर्यान, अन्न-धन्न बरकत ह्वैन, ओंदी रौ रितु मास, होन्दी रौ सबकू संगरांद, बच्याँ रौला तुम हम त् फेर होली फूल संगरांद’’ जैसे चैती गीतों के माध्यम से लोककलावंत बेटियों को ढाँढ़स बँधाते हैं।

 

पुगड़यों का मेड़ों मा चैत मास फूलदी फ्यूँली, लोग वीं को नौ लेंदा

गढ़वाली ऋतु गीतों में इस त्यौहार को प्रिय त्यौहार के रूप में प्रदर्शित किया गया है। डांडा फूलें फ्योंलड़ी, गाड़ वासे म्योलड़ी, मैना आयो चैत को हरी वेन डाली बोटली। इसी प्रकार चैत के महीने फूलों के खिलने और पेड़-पौधों के हरे-भरे होने के साथ विवाहित बेटियाँ अपने मायके को जाने को बेसब्र हो उठती हैं। मैत की खुद में फ्यूँली की लोक कथा को उकेरती दूर बसे पहाड़ के गाँव से बेटियाँ खुदेड़ गीतों को गाकर मैतियों को बुलावा भेजती हैं। ‘उलारया मास यैगे खुदेड़ बगत, बारा ऋतु बौड़ी एैन, बारा फूल फूली गैन’। गढ़वाली लोकगीतों में कहा गया है कि फ्यूँली को अपने मायके से बेहद लगाव है। उसका विवाह दूर काले दैत्य डांडों के पार होता है। उसे बरबस अपने मायके की खुद सताती है।

 

वह अपनी सास से मायके जाने की प्रार्थना करती है किन्तु सास उसे जाने नहीं देती है। मायके की याद में तड़पती फ्यूँली एक दिन मर जाती है। उसे उसके मायके के पास दफ्ना दिया जाता है और कुछ दिनों बाद उस स्थान पर फ्यूँली के रूप में एक फूल खिलता है। पड़ी गैन फूलू मा वीका उड़दा पराण। पुगड़यों का मेड़ों मा चैत मास फूलदी फ्यूँली, लोग वीं को नौ लेंदा। फूलों का त्यौहार आयेगा चैत मास में फ्यूँली फूलेगी, गाँव की लड़कियाँ दहलीज पूजेंगी, फूल चढ़ायेंगे। लड़कियाँ मायके आयेंगी और भेंट प्राप्त करेंगी। ऋतु और मास आते रहना, फ्यूँली तू फूलते रहना। धीरे-धीरे फ्यूँली यहाँ बहू-बेटियों के हृदय में बस जाती हैं। चैत का मास आते ही वो फ्यूँली की सुन्दर जीवन गाथा गाकर स्वयं आत्मीय स्नेह का अनुभव करती हैं और फ्यूँली की कुशल-कामना के लिए न्योतती हैं।

 

नंदा के प्रति जितना प्रेम पहाड़ मे है उतना ही घोघा के प्रति भी

लोकपरंपराओ की जानकार 80 वर्षीय दादी श्रीमती सुदामा देवी बेंजवाल के अनुसार जिस प्रकार नंदा प्रकृति है उसी प्रकार घोघा भी प्रकृति है। दोनो मानस बहिने है। नंदा 12 साल बाद लोक में प्रकट होती है तो घोघा 12 महीने बाद।दोनो को भेंट पूजा देकर स्वागत पूजा जाता है। नंदा के प्रति जितना प्रेम पहाड़ मे है उतना ही घोघा के प्रति भी अंतर इतना है कि नंदा बेटी के रूप में पूजी न्यूती जाती है तो घोघा माँ के रूप में। घोघा माता की पूजा भी अत्यंत साधारण और अनुष्ठानिक मंत्रो से परे है। हर साल चैत्र संक्रान्ति के दिन घोघा की डोली को कंधे पर रखकर नन्हे मुन्ने बच्चे सुबह सुबह घर घर जाकर फूल डालते है।

 

गावो में घोघा माता के छोटे छोटे पुजारी “वाक” ( भविष्यवाणी )

यह क्रम आठवे दिन और कही कही एक माह तक चलता है। जिसकी समाप्ति के बाद देवी को पुनः प्रकृति के साथ रख कर विदा कर दिया जाता है। पहाड़ के लगभग प्रत्येक गाव मे यह पूजी जाती है। इतनी व्यापकता के बाद भी इसके मंदिर कही नही मिलते। गढ़वाल की तल्ला नागपुर पट्टी के कई गावो में घोघा माता के छोटे छोटे पुजारी “वाक” ( भविष्यवाणी ) भी करते है। चोपता के पास जाखणी गाँव में घोघा डोली पर चादी का छत्र और मुखाकृति भी है। जिसको लोग मनौती स्वरूप छत्र भेंट करते है।

 

फूलदेई में अल सुबह नन्हे मुन्हे बच्चे घर घर जाकर मंगलकामना के ऋतुगीत गाते

चैत्र संक्रान्ति के साथ पहाड़ में  फूलदेई त्यौहार की पारपंरिक शुरूवात हो जाती है। फूलदेई में अल सुबह नन्हे मुन्हे बच्चे घर घर जाकर मंगलकामना के ऋतुगीत गाते है। घोघा माता की डोली कंधे में रखकर सबको सुफल का आशीष देते है। घोघा माता को इस त्यौहार की आराध्य देवी माना जाता है जिसकी पूजा प्रतिष्ठा केवल बच्चे ही करते है। फागुन के अन्तिम दिन फूलो की देवी घोघा माता की डोली तैयार करने के लिऐ पय्या यानि पदम वृक्ष न्यूता जाता है। पय्या के मोटे तने पर घोघा डोली उकेरी जाती है। हल्दी से रंग कर शीर्ष भाग पर मुखाकृति बनायी जाती, छोटी छोटी आँखे नाक उकेरने के उपरांत रेशमी वस्त्र पहनाये जाते है, मनौतीयो की सुफल कामना हेतु छत्र चड़ाये जाते है, इस तरह से माँ का ऋगार पूरा होता है।

 

 

पुत्रदायिनी है घोघामाता

बच्चो की प्रिय घोघा माता का स्वरूप अत्यंत मनोहारी है, उसके भावो में ही बालपन का आशीष है। उसकी पूजा प्रतिष्ठा सब बच्चे ही करते है, और वह उनकी इस अबोध पूजा में प्रसन्न होती है। देवी के इस रूप का महात्म्य समझने और महसूस करने के लिऐ हृदय को इसी अबोध भाव में एकाकार करना आवश्यक है और इसी भाव में श्रद्धापूर्वक घोघा माता को छत्र अर्पित किया जाय तो पुत्रप्राप्ति होती है।फुल फुल माई, घोघा या फूलदेई के नाम से प्रसिद्ध उत्तराखंड ही नहीं पूरे देश का यह पहला बाल पर्व व संसार का एकमात्र ऐसा उत्सव है जिसकी शुरुआत तो नौनिहाल करते हैं लेकिन समापन बड़े बुजुर्ग के हाथों से होता है.

 

खेतों की मुंडेरों पर खिले बासंती फूलों जैसे- फ्योंली
चैत्र मास के आगमन का स्वागत करने के लिए पहाड़ों में नौनिहाल चैत्र संक्राति के दिन रिंगाल, व नळओ (गेंहूँ के सूखे डंठल) की छोटी छोटी टोकरियाँ लेकर खेतों की मुंडेरों पर खिले बासंती फूलों जैसे- फ्योंली, लाई, कुंज, पद्म, सुतराज, बनसका, बुरांस, आडू, खुमानी, बासिंग, दूब, मेलु, घिन्घोरा, कविलास, ग्वीराल, सेब, सकिनी, धौला, मालू, चुपल्या, घट, भेकल,किलमोडी,कंवल, जयाणी सहित सैकड़ों प्रजाति के पुष्प इस चैत्र मास खिलते हैं उन्हें सुबह सबेरे टोकरियों में भरकर लाते हैं और सर्वप्रथम गॉव के मंदिर में चढाने के बाद फुलदेई की प्रार्थना करते हुए कहते है- फूल देई फूल देई संगरांद सुफल करो नयो साल तुमकु श्रीभगवान रंगीला सजीला फूल ऐगीं , डाळा बोटाला ह्र्याँ व्हेगीं पौन पंछे दौड़ी गैन, डाळयूँ फूल हंसदा ऐन, तुमारा भण्डार भर्यान, अन्न धन्न कि बरकत ह्वेन औंद रओ ऋतु मॉस .

 

पहाड़ों की ऊँची थातों पर मेले कौथीग!

होंद रओ सबकू संगरांद . बच्यां रौला तुम हम त , फिर होली फूल संगरांद इसके पश्चात गॉव के नौनिहाल धूप निकलने से पूर्व घर घर की देहरी चौखट पर पुष्प डालते हुए कहते हैं – फूल देई फूल देई संगरांद फूलदेई-फूलदेई, छम्मा देई, छम्मा देई, देणि द्वार, भर भकार, ते देलि स बारम्बार नमस्कार। इसे फूल संग्राद के रूप में भी मनाया जाता है.ये बाल-ग्वाल पूरे एक माह तक हर दिन हर देहरी में फूल डालते हैं और ठीक एक माह के बाद बैशाखी के दिन यह बाल-पर्व त्यौहार के रूप में मनाया जाता है. गॉव के बड़े बुजुर्ग गुड चावल पकोड़ी, भेंट इत्यादि इन बच्चों को विदा करते हैं और इसके बाद शुरू होते हैं पहाड़ों की ऊँची थातों पर मेले कौथीग!

मरने के बाद वह बन गयी प्रेम और त्याग की देवी
उत्तराखंड में चैत्र मास की संक्रांति अर्थात पहले दिन से ही वसंत आगमन की खुशी में फूलों का त्योहार फूलदेई मनाया जाता है। इस फूल पर्व में नन्हे-मुन्ने बच्चे प्रातः सूर्योदय के साथ-साथ घर-घर की देहरी पर रंग बिरंगे फूल को चढ़ाते हुए घर की खुशहाली की कामना के गीत गाते हैं। इसका आशय यह है कि हमारा समाज फूलों के साथ नए साल की शुरूआत करे।

 

 

फ्योंली पहाड़ में प्रेम और त्याग की सबसे सुन्दर प्रतीक

फूलों का यह पर्व कहीं पूरे चैत्र मास चलता है, तो कहीं आठ दिनों तक। बच्चे फ्योंली, बुरांस और दूसरे स्थानीय रंग बिरंगे फूलों को चुनकर लाते हैं और उनसे सजी फूलकंडी लेकर घोघा माता की डोली के साथ घर-घर जाकर फूल डालते हैं। भेंटस्वरूप लोग इन बच्चों की थाली में पैसे, चावल, गुड़ इत्यादि चढ़ाते हैं। घोघा माता को फूलों की देवी माना जाता है। फूलों के इस देव को बच्चे ही पूजते हैं।अंतिम दिन बच्चे घोघा माता की बड़ी पूजा करते हैं और इस अवधि के दौरान इकठ्ठे हुए चावल, दाल और भेंट राशि से सामूहिक भोज पकाया जाता है। बंसत आगमन के साथ पहाड़ के कोनो-कोनो में फ्योंली का पीला फूल खिलने लगता है। फ्योंली पहाड़ में प्रेम और त्याग की सबसे सुन्दर प्रतीक मानी जाती है।

 

फूलदेई बच्चों को प्रकृति प्रेम और सामाजिक चिंतन की शिक्षा बचपन में ही देने का आध्यात्मिक पर्व

कहते हैं कि एक राजकुमारी का विवाह दूर काले पहाड़ के पार होता है, जहां उसे अपने मायके की याद सताती रहती है। वह सास से मायके भेजने की प्रार्थना करती है किन्तु सास उसे जाने नहीं देती है। मायके की याद में तड़पती फ्योंली एक दिन मर जाती है। फ्योंली को उसके मायके के पास दफना दिया जाता है, जिस स्थान पर कुछ दिनों बाद पीले रंग का एक सुंदर फूल खिलता है।इस फूल को फ्योंली नाम दे दिया जाता है और उसकी याद में पहाड़ में फूलों का त्यौहार मनाया जाता है। फूलदेई बच्चों को प्रकृति प्रेम और सामाजिक चिंतन की शिक्षा बचपन में ही देने का आध्यात्मिक पर्व है।

 

 

इस लेख का मूल दीपक बेंजवाल द्वारा लिया गया है यहां इसे एडिट किया गया है और कई अन्य जगहों से भी संदर्भ लिया गया है इसका संकलन किया गया है।

इनपुट बीना बेंजवाल, उदय दिनमान डेस्क