udaydinmaan, News Jagran, Danik Uttarakhand, Khabar Aaj Tak,Hindi News, Online hindi news अनोखी परंपराः दून का दरबार साहिब है दुनिया का सबसे बड़ा आस्था का केंद्र !

अनोखी परंपराः दून का दरबार साहिब है दुनिया का सबसे बड़ा आस्था का केंद्र !

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सिखों के इस पवित्र धाम में आस्था का ऐसा सैलाब उमड़ा है कि यहा पूजा के लिए अगले 100 साल की बुकिंग हो जाती है एडवांस !

देहरादून में लगने वाले इस पवित्र मेले में झंडा आरोहण की अलौकिक घड़ी का साक्षी बनने हजारों संगतें पहुंचती हैं दरबार साहिब !

संतोष *सप्ताशु*
देहरादूनः अनोखी परंपराः दून का दरबार साहिब है दुनिया का सबसे बड़ा आस्था का केंद्र ! इसे आप विश्व का सबसे बडे़ आस्था के कंेद्र का नाम देंगे तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। क्योंकि आप खुद ही सोच सकते हैं कि जिस प्रथा के निर्वहन के लिए 100 साल पहले बुकिंग करानी होती है वह विश्व का सबसे बड़ा आस्था का केंद्र नहीं तो और क्या है। यह अनोखा स्थान है देहरादून उत्तराखंड में जहां देश ही नहीं बल्कि विदोशों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं वह भी हजारों की संख्या में। प्रतिवष आयोजित होने वाले इस धार्मिक आयोजन का बड़ा महत्व माना गया है।

 

आपको बता दें कि दून स्थित झंडा साहिब  सिखों के इस पवित्र धाम में आस्था का ऐसा सैलाब उमड़ा है कि यहा पूजा के लिए अगले 100 साल की बुकिंग हो जाती है एडवांस !देहरादून में लगने वाले इस पवित्र मेले में झंडा आरोहण की अलौकिक घड़ी का साक्षी बनने हजारों संगतें पहुंचती हैं दरबार साहिब !दून घाटी के ऐतिहासिक झंडा मेले में झंडा आरोहण की अलौकिक घड़ी का साक्षी बनने हजारों संगतें दरबार साहिब पहुंचती  हैं। जब झंडा चढ़ाने की रस्म अदा होगी, तब तक देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु दूनघाटी पहुंचते हैं। इधर, संगतों के स्वागत में पूरा झंडा मोहल्ला सतरंगी परिधान ओढ़  बाजार सजे हैं और चारों दिशाओं में ढोल-नगाड़ों की गूंज सुनाई देती है।

 

झंडे जी को उतारने की प्रक्रिया एक घंटे चलती है। इसके बाद ध्वज दंड को दूध, दही, घी व गंगाजल से स्नान कराया जाएगा और फिर नए आकर्षक गिलाफ, आवरण, वस्त्र, दुपट्टे व रुमालों से ध्वज दंड को ढका जाता है। अंत में गहरे लाल रंग का मखमली गिलाफ आवरण झंडे जी को पहनाया जाएगा। सबसे बाहर दर्शनी गिलाफ होगा, जिसे चढ़ाने का दुर्लभ अवसर मिला है सूर्य की ढलती किरणें दरबार की मीनारों और गुंबदों पर पड़ेंगी, तब श्री महंत जी के इशारे पर झंडा जी के आरोहण की रस्म अदा होती है। यही वह घड़ी है, जब धीरे-धीरे रस्सों-बल्लियों के सहारे झंडा जी ऊपर उठते हैं और जैसे ही वह अपने स्थान पर खड़े होते हैं लाखों श्रद्धालुओं के मुंह से जय गुरु रामराय महाराज के बोल फूट पड़ते हैं। परंपरा के अनुसार झंडे जी के ऊपर मोर पंख और चंवर चढ़ाई जाती है। इसके साथ ही बड़ी संख्या में गिलाफ, वस्त्र व रुमाल भी चढ़ाए जाते हैं। यह परंपरा माता पंजाब कौर के जमाने से चली आ रही है।

 

बताया जाता है कि इस दरबार साहिब की स्थापना श्री गुरु राम राय ने की थी। कुछ लोगों का कहना है कि औरंगजेब गुरु राम राय को भी गुरु मानते थे। औरंगजेब ने ही गुरु राम राय को हिंदू पीर की उपाधि दी थी। बताया जाता है कि गुरु राम राय ने सदियों पहले दून घाटी में डेरा डाला था। तबसे इसे डेरा दून के नाम से भी जाना जाता है।दरबार साहिब भी इसी जगह पर बना हुआ है। इसके बाद यहां झंडे की स्थापना की की गई। इसका महत्व कुछ ऐसा है कि पूरी दुनिया इसे प्रणाम करती है। कहा ये भी जाता है कि यहां मन से मुराद मांगने पर मन की हर इच्छा पूरी हो जाती है। यहां फाल्गुन मास की पंचमी तिथि को झंडा मेला का आयोजन किया जाता है। जो कि भारत के सबसे बड़े मेलों में से एक है।

 

इस मेले में सिर्फ भारत से ही नहीं बल्कि विदेशों से भी श्रद्धालु आते हैं और अपने मन की मुराद मांगते हैं। बताया जा रहा है कि इस बार दून में इस सुप्रसिुद्ध झंडे मेले का आयोजन 6 मार्च से किया जाएगा। अब आपको बताते हैं कि इस मेले में सबसे खास बात क्या है। बताया जाता है कि इस मेले में इसमें सबसे ज्यादा महत्व दर्शनी गिलाफ का होता है।बताया जाता है कि साल 2116 तक के लिए दर्शनी गिलाफ की बुकिंग हो चुकी है। इसके साथ ही यहां शनील गिलाफ की भी मान्यता है। बताया जाता है कि शनील गिलाफ चढ़ाने की बुकिंग साल 2041 के बाद के लिए शुरू हो गई है। बताया जा रहा है कि इस बार लुधियाना के अर्जुन सिंह झंडा मेला में दर्शनी गिलाफ चढ़ाएंगे। इस बारे में जानकर आपको हैरानी होगी।

 

झण्डा मेला कब हुआ शुरू और क्या है इतिहास
यह इस क्षेत्र के सबसे लोकप्रिय मेलो में से एक है जो हिन्दू, सिख और मुस्लिम संस्कृति को प्रदर्शित करता है और स्पष्ट रूप से बहुसंख्यक प्रकृति का प्रतीक है। वार्षिक झण्डा मेला गुरू रामराय जो दून घाटी में सातवें सिख गुरू हर राय के सबसे बडे़ बेटे के आने से शुरू हुआ है। यह चैत्र माह की पंचमी से (होली से 5 दिन बाद) शुरू होता है, यह गुरू रामराय का जन्मदिन है। यह सम्वत् 1733 (1676 ई0) की चैत्र वदी की पंचमी को दून में उनके आगमन से है।

 

प्रत्येक वर्ष देहरादून में श्री गुरू रामराय दरबार के आँगन में पवित्र मूर्ति को उठाया जाता है, जहाँ गुरू ने अपना डेरा स्थापित किया था। भक्तों का बहुत बड़ा समूह पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिलो, उत्तराखण्ड तथा हिमाचल प्रदेश से लोग इस विशेष अवसर पर हिस्सा लेने आते है। भिन्न-भिन्न आयु के बच्चे औरते तथा पुरूषो के समूह इस मेले में हिस्सा लेते है, उसे संगत कहते है, एकादशी को गुरू रामराय दरबार का महन्त रायवाला हरियाणा में यमुना किनारे (45 किलोमीटर दूर) संगत को आमन्त्रित और स्वागत करने जाता है।

 

पवित्र मूर्ति (झण्डा जी) की पूजा की जाती है। और सुबह को नीचे उतारा जाता है। उसके पुराने वस्त्र स्कार्फ, रूमाल हटाये जाते है। मूर्ति (मास्ट) को दूध, दही और गंगा के पवित्र पानी में स्नान कराया जाता है और सजाया जाता है। मूर्ति को फिर से नये वस्त्रों स्कार्फ, रूमालों से ढका जाता है। मजबूत रस्सी में बाँध कर मूर्ति को ऊपर उठाते है। झण्डा उठाने की रस्म कुछ घण्टों तक की जाती है।

 

झण्डा का ऊपर उठाना आकर्षक और स्मरणीय है। महन्‍त इस रंगपूर्ण और पवित्र सजे हुऐ झण्डे को दोपहर बाद उठाता है। दरबार साहिब के सामने सरोवर (तालाब) में गोता लगाने के बाद हजारों भक्त घण्टों झण्डा साहिब के दर्शन के लिये इकट्ठा होने लगते है। भिन्न-भिन्न क्षेत्रों और समुदायों से इस अवसर पर लोग आमन्त्रित होते है। भिन्न-भिन्न समाज के लोग दरबार साहिब में सेवा करते है। दरबार साहिब में लोगों के खाने और सोने का प्रबन्ध किया जाता है।

 

भोजन बनाया जाता है और भिन्न-भिन्न समुदायों की रसोइयो (लंगर) का प्रबन्ध किया जाता है। लंगर के समय संगत की जाती है। महन्‍त विशेष प्रार्थना करता है। और पवित्र प्रसाद बाँटता है। दरबार साहिब का महन्त शहर के चारों ओर जलूस का नेतृत्व करता है। जिसमें हजारो भक्त उस पवित्र परिक्रमा में सम्मिलित होते है जो सप्तमी को होती है। संगत अष्टमी के दिन उनकी प्रसन्नता के लिये प्रसाद तैयार करती है। नवमी के दिन संगत का समापन किया जाता है।

 

झण्डा मेला जो दरवार साहिब में लगता है मुगलकाल के वैभव को प्रतिविम्बित करता है और 15-20 दिन तक चलता है। यह स्थानीय जनता को बडी संख्या में आकर्षित करता है। इस स्थान पर दुकाने, नुमायश, झुले और सभी प्रकार के मनोरंजन का आयोजन होते है। मेले में गहरें विश्वास के साथ भक्तो के द्धारा भिन्न-भिन्न स्थानों पर पूजा की जाती है।