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b.m. काले धन के खिलाफ नरेंद्र मोदी सरकार का ‘क्रांतिकारी फ़ैसला’ अध्यादेश जारी

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नरेंद्र मोदी सरकार के 500 और हज़ार रुपए के पुराने नोटों को बंद करने के फ़ैसले की काफ़ी चर्चा हो रही है और इसे ‘क्रांतिकारी फ़ैसला’ बताया जा रहा है.कहा जा रहा है कि इससे काले धन से लड़ाई में सरकार को बड़ी कामयाबी मिलेगी.लेकिन ये पहला मौक़ा नहीं है जब बड़े नोट बंद किए गए हैं.
साल 1946 में में भी हज़ार रुपए और 10 हज़ार रुपए के नोट वापस लिए गए थे.फिर 1954 में हज़ार, पांच हज़ार और दस हज़ार रुपए के नोट वापस लाए गए.

उसके बाद जनवरी 1978 में इन्हें फिर बंद कर दिया गया. दोनों ही मौक़ों पर ‘भ्रष्ट लोगों को सामने लाने’ के उद्देश्य से ये क़दम उठाए गए.1978 में जब ये नोट वापस लिए गए उसके पीछे एक दिलचस्प वाकया है.तब जनता पार्टी गठबंधन को सत्ता में आए एक साल ही हुआ था.
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सरकार ने 16 जनवरी को एक अध्यादेश जारी कर हज़ार, पांच हज़ार और 10 हज़ार के नोट वापस लेने का फ़ैसला किया.भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) के ऐतिहासिक दस्तावेज़ (थर्ड वॉल्यूम) में पूरी प्रक्रिया का ब्यौरा दिया गया है.14 जनवरी 1978 को रिज़र्व बैंक के चीफ़ अकाउटेंट ऑफ़िस के वरिष्ठ अधिकारी आर जानकी रमन को फ़ोन कर दिल्ली बुलाया गया.

जब रमन दिल्ली पहुंचे तो उनसे एक सरकारी अधिकारी ने कहा कि सरकार बड़े नोट वापस लेने का मन बना चुकी है और इससे संबंधित ज़रूरी अध्यदेश वो एक दिन में बनाएं.

इस दौरान रिज़र्व बैंक के मुंबई स्थित केंद्रीय दफ़्तर से किसी भी तरह की बातचीत के लिए सख्त मना किया गया क्योंकि इससे बेवजह की अटकलों के फैलने का डर था.

तय समय पर ये अध्यादेश तैयार हो गया और इसे तत्कालीन राष्ट्रपति नीलम संजीवा रेड्डी के पास अनुमोदन के लिए भेजा गया.16 जनवरी की सुबह नौ बजे आकाशवाणी के बुलेटिन में इन बड़े नोटों के बंद होने की ख़बर का प्रसारण हो गया.

अध्यादेश के मुताबिक़ अगले दिन यानी 17 जनवरी को सभी बैंकों के बंद रहने का ऐलान कर दिया गया.उस वक़्त के रिज़र्व बैंक के गवर्नर आई जी पटेल ने अपनी एक किताब में इस घटना के बारे में विस्तार से बताया है.
पटेल ने लिखा है कि वो सरकार के इस फ़ैसले के पक्ष में नहीं थे.

उनके मुताबिक़ जनता पार्टी की सरकार के ही कुछ सदस्य मानते थे कि पिछली सरकार के कथित भ्रष्ट लोगों को निशाना बनाने के लिए ये क़दम उठाया गया है.
पटेल ने ये भी लिखा कि जब तत्कालीन वित्त मंत्री एच एम पटेल ने उनसे नोट वापस लेने को कहा तो उन्होंने, वित्त मंत्री को साफ़ कहा था कि इस तरह के फ़ैसलों से मनमाफ़िक परिणाम कम ही मिलते हैं.

आई जी पटेल ने लिखा कि काले धन को नक़द के रूप में बहुत कम लोग लंबे समय तक अपने पास रखते हैं.पटेल के मुताबिक़, सूटकेस और तकिए में बड़ी रकम छुपाकर रखने का आइडिया ही बड़ा बचकाना किस्म का है और जिनके पास बड़ी रक़म कैश के तौर पर है भी वो भी अपने एजेंट्स के ज़रिए उन्हें बदलवा लेंगे.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की है कि भारत में 500 और 1000 रूपए के पुराने नोटों का मंगलवार मध्यरात्री से इस्तेमाल नहीं हो पाएगा.इस घोषणा से पूरे देश में, ख़ास तौर से शहरों और कस्बों में, जहाँ ये सुनी गई, व्यापक असर हुआ है.लोग घबराए भी हुए हैं कि यदि इन नोटों को इस्तेमाल नहीं कर सकते तो फिर लेन-देन कैसे होगा?

पूरी दुनिया में काले धन का ट्रांज़ैक्शन ज़्यादातर बड़े नोटों में होता है. दिल्ली या किसी भी बड़े शहर में घरों की डील हमेशा काले धन में होती है. प्रापर्टी का रेट जितना होता है वो पूरा चेक से नहीं होता है. जो पैसा नगद दिया जाता है वो बड़े नोटों में ही होता है.
अगर उदाहरण लें कि दो करोड़ की डील है और चेक से एक करोड़ दिए जा रहे हैं तो बाकी का एक करोड़ सौ रूपए में तो नहीं दिया जाएगा. वो तो पांच सौ या हज़ार में ही होगा.

अब प्रधानमंत्री की घोषणा से काले धन पर नियंत्रण हो सकता है.

वैसे ऐसा फैसला पहली बार नहीं हुआ है. मोरारजी देसाई जब वित्त मंत्री थे साठ के दशक में तब ऐसा फैसला किया गया था.ऐसा माना जा रहा है कि 500 और 1000 के पुराने नोट जब सर्कुलेशन से निकल जाएंगे तो फिर नए नोट आ जाएंगे.इससे उम्मीद ये है कि काले धन का एक बड़ा हिस्सा खत्म हो जाएगा.इस तरह के फैसले की सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि भारत जैसे देश की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र का है. जैसे कामवाली बाई है जो हमारे आपके घर आती है. उसे आप हज़ार रूपए दे देते हैं लेकिन उसके पास खाता नहीं है. तो वो क्या करेगी. ये सोचिए.

उनके लिए दिक्कत है जिनके पास बैंक खाते नहीं हैं. ये एक बड़ा झटका है.अगर पैसे जितने भी हों लेकिन उसका हिसाब किताब हो, तब कोई दिक्कत नहीं है. दिक्कत वहां है जहां आपके पास पैसे का हिसाब नहीं हैं.प्रधानमंत्री के इस ऐलान ने लोगों को हैरान कर दिया है. असल तस्वीर तो अगले कुछ दिनों में साफ होगी कि कितना काला धन इस तरीके से बाहर आ सकेगा.

हालांकि लोगों को थोड़ा डर तो है कि वो बाज़ार में जाते हैं और उनके पास पांच सौ या हज़ार रूपए का नोट ही है तो वो कैसे सामान ले पाएंगे. सरकार को लोगों को भरोसा दिलाना चाहिए कि जिनके पास काला धन नहीं है उन्हें कोई दिक्कत नहीं होगी.
रिज़र्व बैंक और वित्त मंत्रालय अगले कुछ दिनों में क्या कदम उठाते हैं ये देखने वाली बात होगी.

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