udaydinmaan, News Jagran, Danik Uttarakhand, Khabar Aaj Tak,Hindi News, Online hindi news लोग दुर्गम में जाने से कतराते हैं और इन्होने दुर्गम में बहाई ज्ञान की गंगा 

लोग दुर्गम में जाने से कतराते हैं और इन्होने दुर्गम में बहाई ज्ञान की गंगा 

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२१ सालों से दुर्गम गुरुकुल में अपनी सेवाएँ दे रहें हैं, दुर्गम के गुरुकुल से ऐसा लगाव और प्यार की यही गुरकुल उनकी कर्मभूमि बन गया, बच्चों के भविष्य के लिए एक नहीं बल्कि दो बार अपनी पदोन्नति ठुकराई, ये उन लोगों के लिए एक नजीर है जो दुर्गम में जाने से कतराते हैं, इन्होने दुर्गम में ज्ञान की गंगा बहाई है, अपने छात्रों से इतना प्यार की उनकी हर जिद को पूरा करने के लिए बिना सडक के विद्यालय में साइकिल तक पहुंचा दी, विद्यालय को बच्चों की तरह सजाया, संवारा विद्यालय के निर्माण में धन की कमी न आये इसलिए खुद हाथों में हथोडा और सब्बल उठाया और खुद पत्थर तोड़े, रंग रोगन के लिए खुद पेंटर बन गए, बच्चों ने ढोलक, तबले की बात की तो पहले खुद इन्हें बजाना सीखा फिर छात्रों को सिखाया, पढाई के बाद भी यहाँ पर अतरिक्त कक्षाएं चलती हैं, महज 5 वीं तक के इस विद्यालय के छात्र छात्राएं कम्पूटर से लेकर खेल हर विधा में परांगत है, अब तक तो आप समझ ही चुकें होंगे की मैं अपनी लोकसंस्कृति, लोकभाषा, लोकसेवा की २६ वीं पोस्ट में किसकी बात कर रहा हूँ, मुझे लगता है की इस बार आप सोच में पढ़ गएँ होंगे की में आखिर किसकी बात कर रहा हूँ, चलो में ही बता देता हूँ इस बार में बात कर रहां हूँ गुरु घनश्याम ढ़ोंडियाल जी के बारे में जो आज दुर्गम के एक गांव के लिए किसी भगवान् से कम नहीं है, शिक्षक दिवस पर पेश है ऐसे गुरु की गाथा –
चांदपुर परगने में अव्यवस्थित उत्तराखंड का पामीर अर्थात दूधातोली श्रृंखलाये, जो 5 सदानीर नदियों को उद्गम स्थान है, हमेशा से ही लोगों के मध्य आकर्षण का केंद्र रहा है, यहाँ से दिखाई देने वाली दुर्लभ विंटर लाइन के बारे में बहुत ही कम लोगों को पता होगा, इसी दूधातोली में पेशावर कांड के महानायक वीरचन्द्र सिंह गढ़वाली की समाधी कोदियाबागड में बनायीं गई है, गैरसैण को स्थाई राजधानी बनाने के लिए १३ बार आमरण अनशन करने वाले बाबा मोहन उत्तराखंडी की समाधि स्थल भी यही है, कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है की दूधातोली ने हमेशा से ही लोगों को देना सीखा है, इसी दूधातोली की तलहटी में बसा खुबसूरत गांव है, लाटूसैण, जो वर्तमान में प्रस्तावित राजधानी भरारीसैण के पास है, इसी लाटूसैण गांव में सुमती देवी और हंसराम ढ़ोंडियाल जी के घर में १० जून १९६८ को एक बहमुखी प्रतिभा के धनी बालक ने जन्म लिया, माता पिता ने बड़े प्यार से अपने इस बालक का नाम घनश्याम रखा, घनश्याम जी का बचपन बेहद आभावों में और बिपरीत परस्थितियों में गुजरा, इन्ही हालतों ने घनश्याम को अंदर से बेहद मजबूत बना दिया था, इनकी प्राथमिक शिक्षा गांव से ४ किमी दूर सारकोट प्राथमिक विद्यालय में हुई, जिसके बाद १० वीं और १२ वीं की शिक्षा इन्होने राजकीय इंटर कॉलेज गैरसैंण से प्राप्त की, जिसके बाद बीएससी और एमएससी जंतु विज्ञानं की शिक्षा राजकीय स्नाक्तोतर महाविद्यालय गोपेश्वर से ग्रहण की, इसके बाद इन्होने एक साल तक राजकीय इंटर कॉलेज मरोड़ा में अध्यापन का कार्य किया, इस दौरान उन्होंने पाया की शिक्षा के द्वारा ही लोगों की परेशानियों को दूर किया जा सकता है, और उन्होंने शिक्षा में ही अपना भविष्य तय किया, जिसके बाद उन्होंने डीएवी कॉलेज देहरादून से बीएड की डिग्री प्राप्त की, इसके बाद उन्होंने गरीब लोगों और १० वीं और १२ वीं में अनुतीर्ण हुए छात्रों के लिए गैरसैंण में खुद के संसाधनों से एक कोचिंग संस्थान खोला और उन्हें पढाया, इस दौरान इन्होने ज्ञान गंगा कार्यक्रम के सफल संचालन के लिए शिक्षा समन्वयक के पद पर भी कार्य किया, इस दौरान उन्होंने समाज के निरक्षर लोगों को आखर का ज्ञान दिया, इस कार्यक्रम ने उन्हें समाज के लिए कुछ करने की प्रेरणा दी, नवंबर १९९५ में ये बतौर सहायक अध्यापक, प्राथमिक विद्यालय झुमाखेत, खंसर पट्टी, गैरसैंण चमोली के पद से सरकारी सेवा में आ गए, उस समय खंसर घाटी का नाम सुनते ही कई लोग सरकारी नौकरी का सपना ही छोड़ देते थे, अगर उस समय किसी को सजा देनी होती थी तो उसका तबादला खंसर घाटी में किया जाता था, भले ही वर्तमान में अब ऐसी कोई बात नहीं है, घनश्याम ढ़ोंडियाल ने इसे चुनौती के रूप में स्वीकार किया और महज ४ साल की समयावधि के भीतर अपने विद्यालय को उच्च कोटि के विद्यालय में शुमार किया, महज ४ साल में पूरे गैरसैण ब्लाक में हर कोई घनश्याम से भली भांति परिचित था, महज ४ साल में ही घनश्याम का तबादला अतिदुर्गम विद्यालय स्युणी मल्ली में हो गया, जहाँ तक पहुँचने के लिए पहले 5 किमी की खड़ी चढ़ाई चढ़नी पड़ती है, चढ़ाई भी ऐसी की चढ़ते चढ़ते शरीर जबाब देने लगता है, पहली बार जब घनश्याम का साक्षत्कार अपने नए विद्यालय और छात्रों और ग्रामीणों से हुआ तो उनकी आँखे फटी की फटी रह गई, विद्यालय की स्थिति ऐसी की कभी भी ढह सकता था, विद्यालय में पढने वाले छात्रों की स्थिति तो अत्यधिक चिंताजनक थी आखर ज्ञान के नाम पर सिफर, विद्यालय को देखने पर ऐसा लगता था की किसी खंडर से तुलना सबसे सटीक लगती थी, इन सबको देख्रकर घनश्याम निशब्द हो गये, लेकिन मन ही मन उन्होंने ठान लिया था की जरुर वो यहाँ की तस्वीर बदलेंगे, जिसकी शुरुआत उन्होंने गांव में प्रत्येक के घर घर जाकर अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए तैयार किया, उस समय तक पुरे गांव में एक ही ब्यक्ति ने स्नातक तक की शिक्षा ग्रहण की थी जबकि ४०० के पार गाँव की जनसँख्या थी, घनश्याम ने सबसे पहले विद्यालय के भवन के जीर्णोधार की ठानी और इसके लिए ग्राम प्रधान से लेकर शिक्षा विभाग के आला अधिकारीयों से वार्ता की जिसका फायदा मिला लेकिन धन कम स्वीकृत हुआ, विद्यालय भवन के लिए धन की कमी आड़े न आये इसके लिए उन्होंने खुद हथोडा और सब्बल उठाया और लग गए पत्थर तोड़ने, और तब तक खुद भी काम किया जब तक भवन निर्माण का कार्य पूरा न होता, भवन निर्माण के बाद रंग रोगन की बात आई तो खुद ही पूरे विद्यालय के रंग रोगन के लिए पेंटर बन गए, जिसके लिए उन्होंने खुद का वेतन ही खर्च कर दिया अभी तक वो अपने वेतन से लगभग 5 लाख रूपये विद्यालय पर खर्च कर चुकें हैं, और जब भवन बनकर तैयार हुआ तो अपने आप में उक्त भवन पूरे प्रदेश में विभाग के लिए एक मिशाल साबित हुआ, उक्त भवन के सामने तो निजी विद्यालयों के भवन कहीं भी नहीं ठहरते हैं, यही नही उन्होंने खुद के पैसों से विद्यालय में विधुत व्यवस्था से लेकर पेयजल और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराई है, इसके अलावा कई स्वयं सेवी संस्थाओं की मदद से विधायलय में छात्रों को कम्प्यूटर उपलब्ध कराये, जो की पूरे प्रदेश के लिए मिशाल है की विद्यालय ने अपने संसाधनों से विधायालय को कम्पूटरकृत किया जो की अपने आप में पहला प्राथमिक विद्यालय था, वहीँ कुछ ही पर प्रोजेक्टर के द्वारा छात्रों को पढाया जाएगा, इसके लिए किसी भी प्रकार का सरकारी सहयोग नहीं लिया गया है, उक्त व्यवस्था घनश्याम ढ़ोंडियाल जी के खुद के प्रयाशों से हो रहा है, विद्यालय में हर दिन माध्यान भोजन में बनने वाले भोजन का मैन्यु अंकित है, जिसमे छात्रों को पौष्टिक आहार का पूरा ध्यान दिया जाता है, भोजन से पहले सूर्य नमस्कार और भोजन मंत्र पढ़ा जाता है, घनश्याम ढ़ोंडियाल को फूल बेहद पसंद हैं इसलिए उन्होंने विद्यालय प्रांगण पर सैकड़ों प्रजाति के फूलों की क्यारी बनाई है, इस फूलों की क्यारी के लिए वे माली तक बन गए, फूलों की सुंदरता विद्यालय में चार चाँद लगा देती है, घनश्याम ढ़ोंडियाल अपने छात्रों की हर मांग को पूरा करते हैं बच्चों की मांग पर उन्होंने खुद के पैसों से एक साइकिल खरीदी और ग्रामीणों के सहयोग से उसे विद्यालय तक पहुँचाया जहाँ पर सभी छात्र छात्राएं खाली समय में साइकिल चलाना सीखते है, साइकिल को लेकर खासतौर पर छात्राएं बेहद उत्साहित रहती हैं, जिसके बाद एक और साइकिल एसबीएम के सहयोग से विद्यालय के छात्रों को उपलब्ध कराई गई है वर्तमान में कुल २ साइकिल मौजूद हैं वो भी तब जब विद्यालय से सडक की दूरी 5 किमी है, इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है की देश को आजाद हुए ७० साल हो गए है लेकिन आज तक उक्त गाँव में सडक नहीं पहुंची लेकिन एक गुरु के बुलंद होंसलों ने छात्रों की मांग पर स्कूल में कम्पूटर से लेकर साइकिल तक पहुंचा दी है, यही नहीं छात्रों ने संगीत सीखने की जिद की तो घनश्याम ढ़ोंडियाल ने पहले खुद संगीत और उसके वाध्य यंत्रों की तालीम ली और आज उनके विद्यालय में हर वाध्य यंत्र से लेकर संगीत का हर साधन मौजूद है, जिस कारण से १५ अगस्त से लेकर हर २६ जनवरी के कार्यक्रमों में विद्यालय में सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है, उक्त आयोजन में गाँव वाले भी अपना सहयोग प्रदान करतें हैं, विद्यालय के बच्चों का शैक्षिक स्तर इतना अच्छा की कक्षा २ तक के बच्चों को अंग्रेजी से लेकर अपने जनपद ,प्रदेश की हर जानकारी मालूम है तो ३ से लेकर 5 वीं तक के हर छात्र और छात्रोंओं को विश्व की जानकारी, इसके अलावा हर बच्चा गणित से लेकर अंगेजी, सामान्य ज्ञान, सांस्कृतिक गतिविधियों, भाषण, लेखन और खेलकूद में निपुण है, बच्चों की रुचिकर शिक्षा के लिए स्कूल में लाइब्रेरी भी है, जहाँ पर कई उपयोगी किताबों, पत्रिकाओं और अखबारों को रखा जाता है ताकि छात्र उनको पढ़ें, इसके अलावा विद्यालय में छात्र छात्राओं को अपनी सांस्कृतिक विरासत से रूबरू करवाने के लिए हिलांश सांस्कृतिक कला मंच का गठन किया गया है, जिसके अंतर्गत बच्चों को उत्तराखंड की लोकभाषा, संस्कृति, लोकनृत्य, लोककलाओं के बारें में अवगत कराया जाता है, शायद पूरे प्रदेश में उक्त विद्यालय एकमात्र विद्यालय होगा जहाँ पर किसी सांस्कृतिक कला मंच का गठन किया गया हो, खेल मैदान न होने के बाद भी विद्यालय के बच्चे खेलों में प्रतिभाग करतें हैं विगत १० बरसों में विद्यालय के १५ बच्चे राज्य स्तर पर प्रतिभाग कर चुकें हैं जिसमे कु शान्ति ने राज्य स्तर में १०० मीटर की दौड़ में प्रथम स्थान भी प्राप्त किया था, इसके अलावा सपनो की उड़ान कार्यक्रम में स्कूल ने जनपद स्तर पर प्रथम स्थान भी प्राप्त किया है, विद्यालय में शिक्षा ग्रहण कर चुकी २ छात्राओं का चयन राजीव गाँधी नवोदय विद्यालय में हो चूका है, वर्तमान में स्कूल में कुल ३५ बच्चे अध्यनरत हैं, स्कूल की शिक्षा गुणवता से प्रभावित होकर गांव के रिश्तेदार अपने बच्चों को इस स्कूल में भेजतें है ताकि उनके बच्चों को भी बेहतर शिक्षा मिल सके, कुल मिलाकर दुर्गम का यह विद्यालय शहरों में लाखों की फीस लेने वाले निजी विद्यालयों से मीलों आगे है, उक्त विद्यालय के प्रधानाध्यापक घनश्याम ढ़ोंडियाल जी से विद्यालय की शिक्षा व्यस्था पर लम्बी गुफ्तगू हुई, जिस पर वे कहतें हैं की सरकारी सेवा में आने पर शिक्षा की दुर्दशा तथा चुनौतियों ने मुझे कुछ अलग करने के लिए मजबूर किया, साथ ही बचपन के दिनों में शिक्षा के लिए किये गये संघर्षों और आभावों ने मुझे बहुत कुछ सिखाया था, जिसकी परणीती आज का घनश्याम ढ़ोंडियाल है, लोगों का सरकारी विद्यालयों की शिक्षा से विमुख होना एक दुखद स्थिति है, साथ ही समाज में शिक्षा के पेशे से जुड़े लोगों के बारे में जो नकारात्मक बातें लोग कर रहे हैं, उसने मुझे हमेशा ही कुछ अलग करने की प्रेरणा दी, ताकि लोग ये न कहें की सरकारी विद्यालय ऐसे ही होते है बल्कि ये मिशाल दे की ऐसे भी होतें हैं, कुछ देर रुकने के बाद घनश्याम ढ़ोंडियाल जी कहतें हैं की मैंने अपने विद्यालय और छात्रों के लिए दिन रात एक करके मेहनत की, स्कूल समय के बाद अतिरिक्त समय में शाम ४ बजे से ६.३० बजे तक बच्चों की अतिरिक्त कक्षाएं पढाता हूँ, छुटियों में और ग्रीष्मकालीन अवकाशों में भी अतिरिक्त कक्षाएं पढाता हूँ, विद्यालय भवन के निर्माण के दौरान विद्यालय में पत्थर तोड़कर, समतलीकरण किया, रंग रोगन खुद किया जिसका पैंसा खुद वहन किया, आज मुझे बहुत ख़ुशी होती है की जब लोग मेरे काम को सराह्तें है, मझे इस हेतु अपने छात्रों, मित्रों, अध्यापकों और विभाग का सहयोग हर स्तर पर मिला, मुझे मेरे काम से संतुस्टी है और इससे बड़ा कोई ईनाम नहीं है, मैंने कभी किसी पुरुष्कार के लिए आवेदन नहीं किया, मैं कभी भी किसी पुरुष्कार के पीछे नहीं गया, आज मेरे पढाये बच्चे अच्छे जगहों पर है तो मुझे इससे बड़ी खुशी और क्या हो सकती है, गौरतलब है की शिक्षा के लिए घनश्याम ढ़ोंडियाल को जिला स्तर पर दक्षता पुरुस्कार, यायावार स्मृति सम्मान समिति, श्री भुवनेश्वरी महिला आश्रम द्वारा स्वामी मंथन सम्मान मिल चुका है, वहीँ आज शिक्षक दिवस के मौके पर देहरादून के राजभवन में महामहिम राज्यपाल महोदय द्वारा उन्हें उत्कृष्ट शिक्षक पुरुष्कार से सम्मानित किया गया है,
वास्तव में घनश्याम ढ़ोंडियाल जी जैसे शिक्षक समाज के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं है लोकसंस्कृति, लोकभाषा, लोकसेवा की २६ वीं पोस्ट में २१ सालों से दुर्गम में शिक्षा की मशाल जलाए हुये घनश्याम ढ़ोंडियाल जी को उनके द्वारा शिक्षा में दिए गये योगदान के लिए ग्राउंड जीरो की और से एक छोटी सी भेंट, आज शिक्षक दिवस है इस अवसर पर उन्हें शिक्षक दिवस की ढेर सारी बधाई — और आशा करते है की आने वाले भविष्य में वो अपनी ज्ञान की मशाल इसी तरह से जलाये, साथ ही अन्य शिक्षक उनसे प्रेरणा लेकर उनका अनुसरण करेंगे,

संजय चौहान/ बंड पट्टी/ किरुली/पीपलकोटी/ चमोली