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बदरीनाथ धाम: 6 महीने तक भगवान से दूर होने का विच्छोह .. का दर्द

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अविस्मरणीय मान्यताओं और परम्पराओं से युक्त होता है ” बदरीनाथ के कपाट बन्द होने ” का अवसर

क्रांति भटट
साक्षात भू बैकुंठ के कहे जाने वाले और करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था के धाम “श्री बदरी नाथ ” के कपाट बुद्धवार 16 नवम्बर को अपराह्न 3. 45 पर शीतकाल के लिए बंद होंगे। उससे पूर्व की प्रक्रियाऐं आज मंगलवार तक जारी रहेंगी

** भगवान बदरी विशाल के कपाट बन्द की परम्परा और प्रक्रिया अदभुत है ।
सामान्य दिनों में भगवान स्वर्ण सिंहासन में आभूषणों सें श्रृंगारित रहते हैं । मगर कपाट बंद होने के दिन भगवान का पुष्पों से श्रृंगार होता है । पूरा गर्भ गृह गेंदे . जूही कमल जैसे हजारों फूलों से श्रृंगारित किया जाता है । श्याम वर्णीय पद्मासन में बैठे भगवान की छवि पीले गेंदों के फूलों के बीच अदभुत आकर्षित होती है । देखते ही बनता है भगवान का सौन्दर्य । मन्दिर का सिंह द्वार भी फूलों से सजाया जाता है
*** जब रावल धरेंगें स्त्री वेश

भगवान के कपाट खुलने के दिन मां लक्ष्मी का विग्रह लक्ष्मी मंदिर में रखा जाता है । कपाट बन्द होने के दिन लक्ष्मी का विग्रह पुनः भगवान के सानिध्य में लाया जायेगा । लक्ष्मी मन्दिर से रावल जी सखी बन कर स्त्री वेश धारण कर लक्ष्मी जी को गोद में उठा कर लाते हैं।
** पहले जेठ जी का विग्रह फिर बहू
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कपाट खुलने पर उद्धव जी का विग्रह भगवान के साथ रहता है ।उद्धव भगवान कृष्ण के सखा हैं उम्र से बडे हैं । कपाट बन्द होने पर उद्धव का विग्रह पांडुकेशर लाया जाता है । कपाट बंद होने के दिन पहले जेठ रूप में उद्धव कु मूर्ति बाहर आती है फिर बहू रूप मे लक्ष्मी भगवान के सानिध्य में जाती हैं । भारतीय परम्परा में जेठ के सामने बहू भला कहाँ पति के सानिध्य में रहती हैं ?
** ऊन की चोली .
कपाट बन्द होने पर भगवान को ऊन के वस्त्र की चोली ( लबादा ) पहनाया जाता है । इसे भारत के आखिरी गांव माणा की बेटीयां एक दिन में बुनकर भगवान को भेंट करती हैं इस ऊन के लबादे पर घी लगा कर भगवान को पहनाया जाता है ।
और भी बहुत कुछ मार्मिक तथा उच्च परम्पराओं का निर्वहन होता है कपाट बंद होने के दिन । 6 महीने तक भगवान से दूर होने का विच्छोह .. का दर्द
अब तक मानवो ने किये दर्शन
कपाट बंद होने पर देवताओं द्वारा भगवान के दर्शन की कथा

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