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बद्रीनाथ प्रसाद टोकरी कार्यक्रम का एक बेहतरीन शुरूआत !

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जेपी मैठाणी
देहरादूनः प्रसाद के कार्यक्रम से हालाँकि स्थानीय रोजगार को बहुत बढ़ावा मिलेगा लेकिन इसके लिए पहले बहुत कुछ किया जाना बाकी है . जैसे साल भर में प्रसाद के कच्चे माल का भण्डारण , टोकरियों का निर्माण – प्रसाद और टोकरियों का भण्डारण, ट्रांसपोर्ट , पहले से ही कच्चे माल की आपूर्ति एवं दक्ष मानव संसाधन का तैयार होना !

 

बद्रीनाथ मंदिर के गर्भगृह में एक यात्री बड़ी मुश्किल से -भगवान् के सामने 6-7 सेकंड भी नहीं रुक पाता है एस दौरान पण्डे पीछे से या आगे से धक्का दे देते हैं क्यूंकि एक ही दिन में कभी कभी तो 7-8 हजार यात्री मंदिर के गर्भ गृह में जाता है- यानी दिन भर में 933 मिनट यानी – 15 घंटे 55 मिनट – इस दौरान उस भक्त का प्रसाद भी लेना है उसको वापस भी देना है –

 

ये सब रिंगाल या बांस की टोकरी के साथ संभव नहीं है इसलिए थाली लोकप्रिय और सुविधाजनक है समय कम लगता है ! लेकिन जब प्रसाद थाली में लेकर भक्त प्रसाद टोकरी वाले दुकानदार के पास आएगा तो वो पॉलिथीन की बजे प्रसाद को टोकरियों में पैक करके श्रध्दालू को वापस दे सकता है इससे प्रसाद वाले की दुगुनी आय होगी और स्थानीय हश्तशिल्प को भी बढ़ावा मिलेगा !

 

अब प्रतिदिन खपने वाली अगर हम सिर्फ 2000 टोकरी ही मान लें तो उसके लिए – 10 फीट लम्बी 8000 रिंगाल की डंडी लगेंगी- एक कुशल रिंगाल शिल्पी एक दिन में 4 से अधिक टोकरी आज की डेट में बना ही नहीं सकता और फिर इस हिसाब से एक महीने में 2.40,000 हजार रिंगाल की डंडियाँ लगेंगी – और उसी अनुपात में बनाने वाले कारीगर कहा से आयेंगे नयी पद्धि के युवा रोजगार गारंटी की भेंट चढ़ गए है वो रिंगाल की टोकरियों के पारंपरिक व्यवसाय को करना ही नहीं चाहते ! फिर ये इतना हर महीने रिंगाल कहा से आएगा ! ये बड़ा प्रश्न है .

 

पहले से ही मन आशंकित जब प्रसाद के प्लास्टिक के डिब्बों का सप्लायर CEO को बड़ा कमिशन देता है तो फिर ये योजना परवान कैसे चढ़ेगी – या तो कोई भला और ईमानदार आदमी सीईओ बने या प्लास्टिक के डब्बे ख़रीदना बंद किया जाए !

 

हेस्को के साथ जुड़े सलधार , पाखी ( HPMS) के कुछ ग्रुप लम्बे समय से बेहद परेशानियों के बाद भी ये काम कर रहे हैं. पिछली बार महिला एवं बाल विकास विभाग की बेहद जद्दोजहद के बाद तो उन्हें बड़ी मुश्किल से बद्रीनाथ मंदिर के नजदीक स्टाल लगाने की परमिशन CEO मंदिर समिति ने दी !

 

प्रसाद टोकरी बनाने का काम वर्ष 2000 से उत्तराखंड बांस एवं रेशा विकास परिषद् और जिलाउद्योग केंद्र के साथ हमने 3 साल तक लगातर किया पर बाद में शैलेश बगौली जी के CDO पद से ट्रान्सफर के बाद मंदिर समिति ने टोकरी लेना बंद कर दिया और बकाया भी नहीं दिया आज तक. IICD जयपुर के विद्यार्थियों ने 12 से अधिक प्रकार की प्रसाद टोकरियों का निर्माण पीपलकोटी में किया !

 

पर सुना है आजकल बन्जरावाला में कोई बना रहा है प्रसाद के लडडू जिसमे – गाँव का कुछ भी अनाज नहीं लगता – ये कौन से समूह हैं जिन्होंने न( 19लाख की बिक्री करके) 9 लाख रुपये अचानक कमा लिए – कही ये सिर्फ शोर तो नहीं है …..अगर 19 लाख का प्रसाद बिका होगा तो कम से कम सिर्फ 5% यानी रुपये 95 हजार की टोकरियों भी तो बिकी होंगी- गर टोकरी बिकी तो बनी कहाँ , किसने बेचीं …शुद्दी –छ्वी न लगा !