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बहरूपियों को हम देख लेंगे कागजों पर !

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देहरादूनः आजकल गैरसैण और उत्तराखंड के सरोकारों से जुड़े मुद्दे को लेकर आंदोलन चरम गति पर है। यह वह दौर है कि जब अपनी करतूतों से हाशिए पर गए लोग आजकल फिर नितांत आंदोलनकारियों के साथ गलबहियां करते नजर आ रहे हैं।

 

आंदोलन के दौरान आप लोगों ने देखा होगा की यह लोग एक तरफ तो आंदोलन में शामिल थे दूसरी ओर यह सत्ता के नुमाइंदे भी बने हुए थे। राज्य मिला राज्य मिलने के बाद जो ठेठ आंदोलनकारी थे उन्हें इस रूप में यह राज्य बिल्कुल भी पसंद नहीं था। ना रोजगार की बात हुई ना जल जंगल जमीन की बात हुई और ना पहाड़ की राजधानी की बात हुई।

 

हैरत की बात है कि इनमें 70 फीसद लोग मीडिया से जुड़े हुए थे। राज्य बना यह लोग बड़े मीडिया घरानों में काम करने लगे। अब मीडिया घरानों ने इन्हें स्थापित किया या मीडिया घरानों को इन्होंने स्थापित किया यह एक लंबी कहानी है, पर हां इन लोगों ने मीडिया घरानों के जरिए सत्ता की चौखट तक अपनी पहचान बनाई और सत्ता के जरिए हर वह काम किए जो इनके आकाओं के अनुरूप थे।

 

बस एक ही काम नहीं किया जिस राज्य आंदोलन ने इनकी पहचान बनाई, उसके लिए इनका प्रयास शून्य ही रहा समय बीता इनके कारपोरेट घरानों को इनकी जगह नए लोग मिल गए और यह नेपथ्य में चले गए। धीरे धीरे इनको भी इस चीज का एहसास हुआ पर तब तक पानी बहुत बह चुका था।यह फिर मुख्यधारा में आने को छटपटा रहे हैं।

 

उत्तराखंड की नई पौध ने उत्तराखंड के सरोकारों के लिए जब फिर सड़कों पर उतरना शुरू कर दिया है तो एक बार फिर इन लोगों को मुख्यधारा में आने के लिए एक रास्ता सूझ गया। मेरे कहने का आशय यह है की जो लोग अपने ड्राइंग रूम में पहले मुख्यमंत्री से लेकर अब तक के मुख्यमंत्री के साथ फोटो लगाकर गौरवान्वित हो रहे हैं।

 

वह लोग क्या वाकई में इस राज्य के हितेषी थे, हैं या रहेंगे इस पर सदा संशय बना रहेगा क्योंकि जब यह पत्रकारिता के शिखर पर थे और चाहते तो सरकारों को पहाड़ परस्त बना सकते थे लेकिन इनकी आकांक्षाओं ने ऐसा नहीं होने दिया। तब आज हम फिर कैसे विश्वास करें कि यह लोग ठोकर खाकर वापस अपने घरों में आ चुके हैं। क्या फिर इतिहास अपने को दोहरा नहीं सकता कि पहाड़ के आंदोलन को सीढ़ी बनाकर यह लोग फिर पहाड़ से खिलवाड़ ना करें।

 

याद रखें ये वही लोग हैं, जिनमे खुदकी बौद्धिकता होते हुए भी ताउम्र इन्होंने कानपुर, पटना के स्वनामधन्य मैनेजरों के पैरों पर लम्बा वक़्त बिता कर पहाड़ की उच्च परम्परा की पत्रकारिता को हमेशा चोट पहुंचाई है।

साथियो तुम लड़ो गैरसैण को सड़कों पर।
बहरूपियों को हम देख लेंगे कागजों पर।

नीलकंठ भटृट की फेसबुक वाल से साभार