udaydinmaan, News Jagran, Danik Uttarakhand, Khabar Aaj Tak,Hindi News, Online hindi news बरसात में जुमला गाँव की चूडे- भंग्जीरे वाली दादी के गांव में !

बरसात में जुमला गाँव की चूडे- भंग्जीरे वाली दादी के गांव में !

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जेपी मैठाणी

गोपेश्वर:

ये जनपद चमोली का गोपेश्वर पोखरी मार्ग का एक महत्वपूर्ण गाँव है जहां सिर्फ मैठाणी लोग रहते हैं शायद 16-17 परिवार- ग्रामसभा है – सोनला. सोनला बछेर पहले गोपेश्वर पोखरी मार्ग पर एक ग्रामसभा थी अब अलग अलग दो ग्रामसभा हो गयी है ! जिला मुख्यालय गोपेश्वर से सिर्फ 14 किलोमीटर दूर .

अभी 4 जुलाई को अपने गाँव एक पूजा के कार्यक्रम में गया था वैसे भी गाँव और पहाड़ – पूजा – शादी – पित्रकूडी- या जमीन के हिसाब – किताब – खसरा खतौनी के लिए ही याद आते हैं जैसे मुझे भी याद आता है अपना गाँव जुमला.आज की इस यात्रा के लिए सुबह 4.30 पर देहरादून से चला था – आल वैदर रोड इस बरसात की वैदर में शिवपुरी और ब्रह्मपुरी और बादमें तोताघाटी के बाद साकनी धार के बीच जगह जगह बंद थी.

इससे पहले शिव के अंध भक्तोंने 45मिनट तक ऋषिकेश में अटकाए रखा – तो कर्णप्रयाग आते आते 4 बज गए .वहां से अनुराधा को मिलने के बाद आशीष और Sushil kant ने सैकोट- घुड़साल – रोपा सोनला के बाद रात 8 बजे जूमला छोड़ा . सबसे पहले चाची जी को मिला .गाँव का रास्ता इतना ढाल वाला की बारिश से भीगे हुए जूमला – बोली गाँव के रास्ते के निर्माण पर हुए भ्रष्टाचार के अनुमान रास्ते की बनावट से लगाया जा सकता था कि- में जो सारे हिमालय में ट्रैकिंग करते आया हूँ यहाँ रात को उस रास्ते पर फिसल कर गिर पड़ा .ये इतना ढाल वाला गाँव के लिए बनाया गया पैदल रास्ता मैंने जीवन में पहली बार देखा ! इस रास्ते पर माउंटेन बाईकार्स भी गिर कर घायल हो सकते है.इससे लाख गुना बढ़िया पुराना मिटटी वाला रास्ता ही था .

मेरी समस्या ये है कि- मेरा जन्म पीपलकोटी, चमोली में हुआ और जन्म के 12-13 साल के बाद पता चला कि- पैत्रिक गाँव जूमला है . जब पहली बार ताऊ जी के साथ बालखिला नदी के रस्ते गाँव पहुंचा तो वहां का वातावरण बेहद रोमांचक था पर शाम होते ही वहां लाइट नहीं थी – सिर्फ पैदल जाया जा सकता था – कोई सड़क नहीं थी और बहुत कम परिवार थे दूर दूर तक कोई गाडी नहीं दिखाई दे रही थी .

इस गाँव से हालांकि बहुत सारे परिवार आज की तिथि में पलायन कर चुके हैं – गाँव में मेरे चाचा और कुछ और परिवार रहते हैं अब हमारे गाँव के सड़क के बनने से जो नुकसान हुआ वो ये है कि पोखरी सड़क बनाने के बाद सड़क के पानी के कटाव और भूमि धंसने से बाद में फिर पिलंग सैकोट मार्ग के कटाव के कारण – नीचे से भी जमीन खिसकने के कारण हमारे गाँव पर संकट मंडरा रहा है . गाँव के निवासियो ने कई बार सिर्फ 14 किलोमीटर दूर जिला मुख्यालय में जिलाधिकारी महोदय और चमोली के SDM कार्यालय को ज्ञापन दिया है . गाँव के आधार को धंसाने में ADB की बड़ी भूमिका है – PWD ने बीच में ये सड़क अपने कार्याधिकार में ले ली थी.

अब गाँव की ऊर्जा की बात करते हैं – नीचे के चित्रों में हमारे गाँव की महिला शक्तियां हैं जिनकी बदौलत गाँव आज भी जिन्दा है इनकी वजह से कुछ गौशाला आबाद हैं – घरों की खोली, डंडयाला और जंगले आबाद हैं .ये हैं जिनकी वजह से कभी कभी गाँव में रोशनी होती है मंदिरों की घंटियाँ बजती हैं, इनमे ज्यादातर भाभियाँ हैं, चाची हैं, ताई हैं , चाचा हैं , बड़े भाई हैं. सच में गाँव इनकी वजह से आबाद हैं – और हम खानाबदोश हैं – गाँव याद आते हैं और हम पीड़ा से पीछा छुडाने के लिए उन्हें भूल जाते हैं . पहाड़ में पहाड़ सा जीवन जी रही महिला समाज को हम सलाम करते हैं- और मेरी मां,चाचियां और इस बार साथ में आयी एक मात्र हमारी ताई जी सभी को सलाम !

पूजा हुई – जमकर बारिश हुई – भात दाल सबने सपोडा, पंडित जी ( Arvind Bhatt जी ) से आशीर्वाद लिया -पिठाई लगी टीका हुआ सब अपने अपने घरोंदों को विदा – मेरी मां चाची के साथ रुक गयी 2-3 दिन के लिए. चाचा बीमार थे तो मन में थोडा असहजपन था.

पुराने घर की दादी और दादा जी ( चूडे- भंग्जीरे वाली दादी) के साथ ताऊ जी का अभाव भी खटका गोपाल चाचा जी, भास्कर चाचा जी – बुढया दादी के साथ अणसी चाचा जी वाली दादी जो अक्सर संतरे और नारंगी देती थी और ये ही लोग मेरी स्मृति में छाये हुए हैं बचपन से आज तक इन सबको घनघोर बारिश की रात मन में याद करते हुए में अपने पुराने घर में- मिटटी ,गोबर, कमैडे से लीपे पुते घर में राकेश के दिए मोटे तकिये के साथ ऐसा सोया जैसे कई दिनों से ना सोया हूँ.और हाँ बचपन के दिनों के बब्लू काका , नीता, कुसुम, मंजू फूफू, मुकेश, हरीश, ममता ,प्रभा और छोटी आदि भी पसरे रहे यादों में – सच में गाँव का तिलिस्म है जो आपको जोड़े रखता है जीवन से .

दोस्त के गिफ्ट दिए मग में अगली सुबह दो तरह की चाय पी घर के आँगन में जीवन में पहली बार नहाया गधेरे के पानी से सच में वो पानी अभी भी याद है या उसका स्पर्श अभी भी महसूस हो रहा है .

हमारे घर के आगे का फरसें के पेड़ पर नयी कोपलें फूट रही हैं और नयी पत्तियां सावन में झूल रही हैं .कई प्रकार की चिड़िया, तितलियाँ और मोथ आपके इन्तजार में हैं .गाड गधेरे उफान पर थे -शाम को मैं भी वापस पीपलकोटी पहुँच गया पर लगा जैसे जूमला के बारिश से भीगे हुए माल्टे ,संतरे, केले, चीड, भीमल, छाछरी ,आम आदि के पेड़ पीछा कर रहे हैं यहाँ पीपलकोटी में भी !

यार सच में गाँव में ही जीवन है – शहर में सिर्फ सुविधाएँ हैं जीवन नहीं – वो तो गाँव की धार से विदा होते ही या बहुओं द्वारा घर के दरवाजे पर ताला लगाते ही – ताले के खटक के साथ दम तोड़ देता है.