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बौखनाग मेले से शुरू होता है रंवाँई में मेले उत्सवो का उल्लास

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दीपक बेंजवाल

रंवाँई से लौटकर…

घर से तकरीबन 300 किमी दूर खूबसूरत मेले उत्सवो की धरती रंवाँई की यात्रा बेहद यादगार रही। पहाड़ की उल्लासमयी संस्कृति को देखने भेटने का यह सबसे बेहतर समय है। रंवाई उत्तरकाशी जिले की यमुना घाटी का हिस्सा है जिसकी सीमा चिन्यालीसौड़ से यमुनोत्री मार्ग पर 40 किमी पर स्थित राणीगाड से शुरू होती है। राणीगाड से सड़क रंवाई की ओर उतरती है, पहाड़ की ढलानो पर छितरे बड़े बड़े गाँवो का दृश्य मन को मोह लेता है।

घाटी में उतरते ही सबसे पहले आता है बड़कोट बाजार। बड़कोट का गढवाली भाषा में अर्थ बड़ = बड़ा और कोट = किला या रहने के स्थान से है। बड़कोट राजा सहस्त्रबाहु की नगरी थी जिसका कुंड आज भी बड़कोट गाँव में है। यह यमुनोत्री मार्ग का सबसे बड़ा बाजार है जिसमें होटल, लाँज और दुकानो की भरमार है। प्रशासनिक रूप से यह तहसील और नगर पालिका के रूप में अपनी पहचान रखता है।

गढवाल के इतिहास में बड़कोट का महत्व तिलाड़ी काँड के रूप में भी जाना जाता है। 30 मई उत्तराखंड के इतिहास में एक रक्तरंजित तारीख है. इसी दिन 1930 में जंगलों पर अपने अधिकारों के लिए तिलाड़ी मैदान में जमा हुए सैकड़ों लोगों को राजा की फ़ौज ने तीन तरफ से घेर लिया. चौथी तरफ यमुना नदी अपने प्रचंड वेग से बहती है. बिना किसी चेतावनी के राजा की फ़ौज ने निहत्थे लोगों पर ताबड़तोड़ गोलियां चलाई.

कुछ गोलियों का शिकार हुए, कुछ ने बचने के लिए यमुना में छलांग लगा दी, वे नदी की तेज धारा में बह गए. वनों पर अपने नैसर्गिक अधिकारों का दावा करने वालों को सबक सिखाने के लिए टिहरी के राजा नरेंद्र शाह ने अपने दीवान चक्रधर जुयाल के मार्फत यह लोमहर्षक हत्याकांड रचा. राजशाही के इस क्रूर दमन के कारण, सैकड़ों मारे गए और सैकड़ों शहीद हुए. तत्कालीन टिहरी नरेश ने दर्जनों लोगों को गोली से इसलिये भूनवा दिया क्योंकि वे अपने हक की बहाली के लिए पहली बार लामबंद हुए थे.

वे राजा की आज्ञा के बिना ही पहली बार यमुना की घाटी में स्थित तिलाड़ी में एक महापंचायत कर रहे थे. बर्बरता की यह घटना आज भी यमुना घाटी के लोगों में सिरहन पैदा कर देती है. हालांकि यह बर्बर घटना लोगों को डराने या उनके मंसूबों को दबाने में सफल नहीं हो सकी. उल्टे इस बलिदान ने लोगों में अपने अधिकारों के लिए और ज्यादा प्रेरणा व नई उम्मीद पैदा कर दी. आम लोगों के अंदर बेख़ौफ़ होकर अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाना तो इसने सिखाया ही साथ ही अपने इलाके के विकास के लिए मिलकर काम करने की इच्छा शक्ति भी प्रदान की.

1949 के बाद से बड़कोट तहसील के अन्तर्गत आने वाले तिलाड़ी में हर साल 30 मई को इस घटना की याद में शहीद दिवस का आयोजन किया जाता है। बड़कोट गाँव से एक पैदल रास्ता और कच्ची सड़क तिलाड़ी मैदान तक जाती है जहा आज स्मारक बना है। पिछले महीने ही यहा पर मेले का आयोजन हुआ था। मुझे भी इस शहीद स्थल को नमन करने का मौका मिला। पहाड़ में जल जंगल जमीन को लेकर यह पहली शहादत थी जिस पर हर पहाड़वासी को गर्व है।

बड़कोट रंवाई घाटी के गावो का मुख्य बाजार है जहा रोजना घाटी के लोग बड़ी संख्या में आते जाते रहते है। बड़कोट बैन्ड से एक सड़क यमुनोत्री को जाती है और दूसरी रंवाई के अंतिम छोर नौगाव पुरोला मोरी नैटवाड़ तक जाती है। यहा से हर्बटपुर होते हुऐ एक सड़क देहरादून को भी जाती है। बड़कोट से स्थानीय गाँवो को जोड़ने वाली कई सड़के है।

मेरी यात्रा का एक पड़ाव भाटिया भी बड़कोट पुरोला सड़क से 7 किमी की दूरी से कटता है। यहा से 6 किमी के लिंक मार्ग से भाटिया गाँव आता है। भाटियाँ रंवाई के लिऐ एक महत्वपूर्ण गाँव है क्योकि रंवाई के मेले उतस्वो की शुरूवात इसी गाँव के बौखनाग मेले से होती है। भाटिया में बौखनाग का प्राचीन मंदिर है, घाटी के नंदगाँव, कन्सेरू समेत अनेक गाँवो में बौखनाग देवता के मंदिर है। भाटिया बौखनाग देवता के डिमरी पुजारीयो का मूल गाँव भी है।

आषाड़ संक्रान्ति को इस मेले की विधिवत शुरूवात होती है। देवता की विशेष पूजा के बाद तांदी गीतो और नृत्य के साथ मेला उतस्व शुरू होता है। रंवाई के मेलो में तांदी गीत सबसे आकर्षण का केन्द्र होते है जिनमें रवाँई के लोग अपने आराध्य देवता की डोली के साथ उल्लास के साथ नृत्य करते है।

भाटिया गाँव मेरे लिऐ एकदम से अन्जान था, लेकिन गाँव में अतिथि का सम्मान सत्कार आज भी खुशी से किया जाता है। इतनी दूर से मेले देखने का मेरा उद्देशय जानकर उन्हे प्रसन्नता हुई। गाँव के ही श्री वासवानंद डिमरी जी मुझे स्नेहपूर्वक अपने घर ले गये। आतिथ्य का ऐसा आत्मीय स्नेह पाकर मैं धन्य हो गया। देवदार से बने उनके पुराने मकान पर 24 कमरे है। जिसमें उनके चार परिवार रहते है।

पलायन से अछूता भाटिया गाँव भी नही है, यहा के कई परिवार अब शहरो में बस चुके है। गाँव में 35 परिवार पुजारी डिमरीयो के, 30 परिवार डोभाल ब्राहमणो के और 8 परिवार बाजगियो के है। गाँव के अधिकाश मकान तीनमंजिले और 30-40 कमरो के है।

घर से तकरीबन 300 किमी दूर खूबसूरत मेले उत्सवो की धरती रंवाँई की यात्रा बेहद यादगार रही। पहाड़ की उल्लासमयी संस्कृति को देखने भेटने का यह सबसे बेहतर समय है।

Posted by दीपक बेंजवाल on Saturday, 16 June 2018

Posted by दीपक बेंजवाल on Saturday, 16 June 2018