udaydinmaan, News Jagran, Danik Uttarakhand, Khabar Aaj Tak,Hindi News, Online hindi news चखल-पखल, चहल-पहल लौट आयी है अजक्याल गांवों में !

चखल-पखल, चहल-पहल लौट आयी है अजक्याल गांवों में !

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क्रांति भटृ

कभी कभी दिल ये कहता है कि हे प्रभो ! “प्लेन्स में खूब” घाम” हो , इसी बहाने से ही सही पहाड़ के सूने पडे , उदास पडे घर गांवो में ” मनखी तो दिख रहे हैं । ” चखल पखल , चहल पहल लौट आयी है अजक्याल गांवों में । घारे मंगरे , घर चौपाल में अहा ! क्या चह चहाहट सुनाई दे रही है उन बच्चों की , जो दादा दादी , नाना नानी के पास आये हैं , अपने ” गांव आये हैं ।

अपनी जडो , अपने पुराने ही सही ” घ्वील ” घरोंदों में आये हैं । कितने अच्छे लगते हैं घर आंगन में प्वथली ” चिरय्या ” की तरह फुदकते , चहचाते ये बच्चे । दादा दादी , नाना नानी और गांव के बूढे बुजुर्ग या हौर ( और ) रिश्तेदार नाते दार जब ठेठ पहाड़ी भाषा में इनसे बतियाते हैं तो कैसे सहजता से समझ लेते हैं ये बच्चे ।

अपने घर गांव आये माता पिता भी पुरानी पित्र कूडी , खेत पुंगडे , बाडी स्वगाडी देख पुराने दिनों की याद करते दिख रहे हैं । हम उम्र वालों के साथ बेठकर पुराने दिनों की ” छ्वीं बात लगा कर अलमस्त हैं । गांवों में कहीं ” रवपणी ” रोपाई चल रही है तो कहीं कुछ और । जाने क्यों कहते हैं कि लोग कि गांव मर रहे हैं । * गांव कभी मरते नहीं , हां अपने ही लोग जब गांव , घर छोड देते हैं तो गांव , घर जरूर उदास हो जाते हैं ।

घर गांव के चेहरे पर तब चमक आ जाती है जब उसके बच्चे कुछ दिन के लिये ही सही उसकी गोद में आ जाते हैं । छोटे छोटे नाती नातिनो , पोते पोतियों की चोंठी ” ठुड्डी ” पर जब दादा दादी नाना नानी भुखी पीते हैं आशीष देते हैं और ” उनकी आंखों की पोर पर खुशी के मोती की तरह चमकती बूंदें दिखतीं हैं तो लगता है भगवान ही इन बुजुर्गों की शक्ल में आकर जमीन पर उतर आये हैं ।

घर आये मां बाप अपने बच्चों के साथ पर ईष्ट देवता , ग्राम देवता की पूजा करते हैं तो लगता है कि ” देवता कह रहे हों ” कहाँ थे मेरे बच्चों ! तुम्हारे बिना तो हम भी उदास हैं । खूब कमाओ , खाओ , पर कभी कभार अपने घरोंदों , और दयब्ताओं के थान स्थान पर जरूर आओ मेरे लाडलो ।

गांवों में आजकल खूब चरका बरकी दिख रही है । जिन्हे भगवान ने दे दिया है वो ” उदास पडी पित्र कूडी को संवारने का मन बना चुके हैं कुछ बना भी रहे है । कुछ बच्चे जो पढाई के लिये बाहर हैं वे भी गांव आये हैं घर आये हैं । छुट्टियां खत्म होने वाली हैं । पर घर आकर इन्हें लगता है कि अपना करियर तो बनाना है । घर गांव बने रहें इससे भी जुडे रहना है