udaydinmaan, News Jagran, Danik Uttarakhand, Khabar Aaj Tak,Hindi News, Online hindi news देहरादून शहर में अब वो “कशिश” नहीं ! शहर खुद हमदर्दी का मोहताज !

देहरादून शहर में अब वो “कशिश” नहीं ! शहर खुद हमदर्दी का मोहताज !

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योगेश भटृ

देहरादून एक ऐसा शहर, जो किसी को भी ‘दीवाना’ बना दे । जो एक बार इसके आगोश में आया, हमेशा के लिये इसी का होकर रह गया । ऐसा इस शहर के बारे कभी कहा जाता था, लेकिन आज यह शहर खुद हमदर्दी का मोहताज बना है । माफिया, सियासतदां, नौकरशाह और ठेकेदारों का गठजोड़ इस शहर को बेरहमी से रौंदने में लगा है ।

 

वो दून तो कब का खत्म हो चुका जिसमें हर किसी का अपना दीवाना बनाने की ‘कशिश’ थी । विकास के ‘अंधड’ ने अब इस शहर की जो सूरत तैयार की है वह ‘सुंदर दून’ की नहीं, एक ‘डर्टी दून’ की है । नहरें जमींदोज हो चुकी हैं तो नदियां नालों और बस्तियों में तब्दील हो चुकी है। आम लींची के बगीचों में अब ऊंची इमारतें हैं तो बासमती के खेतों की जगह कंक्रीट के जंगल ।

 

विकास की बदसूरती देहरादून के चप्पे-चप्पे पर नजर आती है । दून ने डेढ़ दशक में तरक्की तो की लेकिन शहर के माफिक नहीं ‘माफिया’ के मनमाफिक । अनियोजित विकास का दंश शहर और शहर की आत्मा से जुड़े लोग दोनो ही झेल रहे हैं । शहर की तो मानो अब किसी को परवाह ही नहीं, हर कोई सिर्फ अपना मकसद पूरा करने की दौड़ में है ।

 

अब शहर में न सुकून है और न सुरक्षा का अहसास। अमन पसंद इस शहर के लिये तो तमाम नियम कायदे कानून बेमानी साबित हुए हैं । पर्यावरण की चिंता करने वाले और गांव शहरों को बचाने की बात करने वाले ठेकदारों को भी इस शहर का दर्द सुनायी नहीं देता । किसी को इसकी ‘तड़प’ महसूस नहीं होती । यह भी किसी को नजर नहीं आता कि मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण और नगर निगम सरीखी संस्थाएं खुद ही विनाश का कारण बनी हुई हैं ।

 

सांस्कृतिक, एतिहासिक विरासत और प्राकृतिक सौंदर्य का शहर दून सियासत का शिकार हो चुका है। सिर्फ सियासत के चलते यह शहर नियोजित नहीं हो पाया । शहर के भविष्य पर कभी वोट की सियासत हावी रही कभी नोट की । अवैध बस्तियां, अवैध कालोनियां, अवैध सड़कें, अवैध वाहन, अवैध बिल्डिंगें, अनियंत्रित यातायात और गंदगी आज इस शहर की पहचान हैं । विडम्बना देखिये कि उत्तराखंड अलग राज्य बनना तो देहरादून शहर के लिये तो अभिशाप साबित हुआ है ।

 

सुना है कि कभी इसकी खूबसूरती और आबोहवा से अभीभूत अंग्रेज कभी इसे लंदन की तर्ज पर बसाना चाहते थे । अंग्रेजों को इस शहर से बेहद लगाव था उनके लिये देहरादून की बड़ी अहमियत थी, इसके प्रमाण आज भी शहर में मौजूद हैं। यह अपने आप में चौंकाने वाला तथ्य है कि सालों बाद भी देहरादून अंग्रेजों के जमाने के वाटर सप्लाई सिस्टम पर निर्भर है।

 

बताते हैं कि देहरादून शहर भारत की राजधानी के लिये भी नामांकित किया गया था। इस शहर को अंग्रेजों के मुताबिक बसाना तो दूर आजाद भारत में हम इसके लिये अदद ‘प्लान’ तक नहीं बना पाए । उत्तराखंड अलग राज्य बना और जब उसकी अस्थायी राजधानी देहरादून बनी तो उम्मीद जगी कि देहरादून एक नियोजित शहर के रूप में विकसित होगा ।

 

देहरादून की बिगड़ती शक्ल सुधरेगी,नए सिरे से इस शहर का कायाकल्प होगा । लेकिन हुआ इसके उल्ट बीते दो दशक में यह शहर मलिन बस्तियों के शहर और कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो चुका है । जिस शहर में कभी गर्मी का अहसास तक नहीं होता था, आज वहां सांस लेना मुश्किल है। इस शहर में न वो शुकून है और न वो आबोहवा जिसके कभी अंग्रेज मुरीद थे । बासमती, लीची, चाय बागान और नहरें जो कभी इस शहर की पहचान हुआ करती थी वो अब इतिहास की बातें हो चुकी हैं ।

 

देहरादून आज बर्बादी की कगार पर है । भू माफिया, शिक्षा माफिया और खनन माफिया एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को लील चुका है । देहरादून में आज भू जल 10 मीटर से भी नीचे चला गया है। प्राकृतिक जलस्रोत खत्म होते जा रहे हैं। लाइफ लाइन कही जाने वाली नहरें भूमिगत हो चुकी हैं । जिन कुलाबों से कभी खेतों में सिंचाई के लिये पानी पहुंचता था, उनसे आज शहर की गंदगी और मल मूत्र बह रहा है । राजधानी की सड़कों पर यातायात दिनों दिन बढ़ रहा है और सड़कें संकरी होती जा रही हैं ।

 

बेंगलुरू की संस्था जेसीसीडी ने भारत की शहर प्रणाली का वार्षिक सर्वे किया जिसमें खूबसूरत कहे जाने वाला दून अंतिम पायेदान पर है । देहरादून आज देश में पांचवा सबसे प्रदूषित शहर है । बीते साल केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय की रिपोर्ट में भी यह खुलासा हुआ कि देहरादून स्वच्छता के मामले में फिसड्डी है । स्वच्छता के मामले में देहरादून शहर आज 316 वें स्थान पर हैं । प्रदूषण का स्तर शहर में दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा है । 2012-13 में प्रदूषण का स्तर 52885 पीपीएम था जो 2017-18 में अब 62179 दर्ज किया गया है ।

 

जनसंख्या का दबाव भी लगातार शहर पर लगातार बढ़ रहा है । राज्य बनने के बाद तो इसमें और तेजी आयी है। बढ़ते दबाव का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि हर साल शहर की आबादी तकरीबन 12 से 15 हजार के बीच बढ़ रही है । राजधानी में मलिन बस्तियों की संख्या का आंकड़ा भी 150 पार कर चुका है । दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इसमें आधे से ज्यादा बस्तियां राज्य बनने के बाद बसी हैं। शहर की सड़कों पर सफर करते हुए, गली महल्लों से गुजरते हुए शहर के दर्द को महसूस किया जा सकता है ।

 

हर चौराहा शहर की तड़प बयां करता नजर आता है । लेकिन कौन है जो इस शहर के दर्द का महसूस करे ? सरकारें हैं कि नारों और जुमलों से आगे नहीं बढ़ पाती और नगर निगम और प्राधिकरण का तो फिर कहना ही क्या । बातें भले ही स्मार्ट सिटी की सुनायी देती हों लेकिन हालात दिनोंदिन और बिगड़ने की ओर इशारा करते नजर आ रहे हैं । शहर की चिंता करते एक राहगीर ने सही ही कहा कि इस शहर की कोई ‘सहर’ नहीं… सहर यानि सुबह नहीं ।

योगेश भटृ संपादक दैनिक उत्तराखंड की फेसबुक वाल से साभार