udaydinmaan, News Jagran, Danik Uttarakhand, Khabar Aaj Tak,Hindi News, Online hindi news देवाधिदेव स्वामी तुंगेश्वरा महेशा...फलेश्वर तुंगनाथ

देवाधिदेव स्वामी तुंगेश्वरा महेशा…फलेश्वर तुंगनाथ

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दीपक बेंजवाल

 अगस्त्यमुनि: उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में, रुद्रप्रयाग से मात्र 20kmपोखरी मार्ग) पर चोपता नामक एक छोटा सा बाजार है। यहां से मात्र 1.5kmपैदल दूरी पर विस्तृत क्षेत्र में फैला एक रमणीक व प्रसिद्ध गाँव फलासी है। प्रसिद्ध इसलिए कि यहाँ स्वयं भगवान शिव व शक्ति विराजमान हैं अर्थात् दोनों का पुरातन शैली का एक भव्य मन्दिर स्थापित है। मन्दिर में नित्य भोग व पूजाहोतीहै। मन्दिर मे होने वाले समस्त धार्मिक कार्यों का संचालन, ‘तुंगेश्वर मंदिर समिति ‘करती है, जिसके सभी पदाधिकारी एवं सदस्य क्षेत्र के 12 गांवों के भक्त लोग होतेहैं। यहां समय समय पर शिव व भगवती माँ के अनुष्ठान, पुराण, बन्याथ होते रहते हैं ।समिति के गाँव इस प्रकार हैं -फलासी, मलाऊं, कुण्डा, दानकोट, कोलू, भन्नू, जाखणी, तड़ाग, उर्खोली, बछनी, भटवाडी, खाली, क्यूडी एवं काण्डा।

फलासी यानि फल + आशीष, सहृदय भाव से दर्शन करने वाले भक्त को यहा निश्चित फल प्राप्त होता है।मन्दिर प्राचीन दक्षिण शैली का बना है। यद्यपि बाद में इसका पुनुरुद्धार किया गया लेकिन प्राचीन शैली की सुन्दरता को कायम रखने का प्रयत्न किया गया। मन्दिर में कुछ पुरानी मन्दिर की दीवारों पर बनी मूर्तियों के अवशेष हैं जिनसे पता चलता है कि पुराने समय में मन्दिर की दीवारों पर दक्षिण शैली में सुन्दर मूर्तियाँ बनी रही होंगी। मन्दिर में भगवान शिव (तुंगनाथ) का आपरुप (ऐसी मूर्ति, लिंग आदि जो मनुष्य निर्मित न होकर स्वयं प्रकट होती है) लिंग है।

इसके अतिरिक्त भगवती चण्डिका एवं गणेश जी हैं। इस मन्दिर में शिव (भगवान तुंगनाथ) की प्रधानता है, जबकि तुंगनाथ के एक अन्य मन्दिर जो कि सतेरा में है उसमें शक्ति (नारी देवी) की प्रधानता है।मन्दिर में सामान्य पूजा पास के ही फलासी गाँव के लोग करते हैं। देवता के गुरू बेंजी के शुक्ल यजुर्वेदी बेंजवाल ब्राहमण है, जो आज भी देवता को रक्षाबंधन पर यज्ञोपवित अर्पित करते है।

मन्दिर में लगभग १२ सालों बाद भगवती चण्डिका की बन्याथ (यात्रा) होती है। यात्रा के पहले देवी के प्रतीक बरमा ठंगुरु (छड़ी के ऊपर डोली स्थापित की गई होती है) की प्राण प्रतिष्ठा की जाती है। यात्रा के दौरान बरमा ठंगुरु को मन्दिर के क्षेत्र में आने वाले सभी गाँवों में घर-घर एवं सभी देवस्थानों पर ले जाया जाता है। चार राजपूत जाति के पुरुष (जिन्हें एर्वला कहा जाता है) महीनों तक कठिन एवं पवित्र जीवन शैली का निर्वाह करते हुये बरमा ठंगुरु को ले जाते हैं।

साथ में गणेश देवता की डोली जाती है जिसे ब्राह्मण ले जाता है। इसके अतिरिक्त भूत्योर (भूत) देवता साथ जाता है। यात्रा की समाप्ति पर यज्ञ होता है। मन्दिर के ऊपर कुछ सीढ़ीनुमा खेत हैं जिनमें से एक में यज्ञ कुण्ड बनाया जाता है। यज्ञ के ब्रहमा तथा भद्राचार्य बेंजी के तथा आचार्य मयकोटी के ब्राहमण होते है।यज्ञ की समाप्ति पर बरमा ठंगुरु को पृथ्वी के नीचे पधरा दिया जाता है। साथ ही बरमा ठंगुरु को ले जाने वाले एर्वालों की एक झोंपड़ी होती है जिसे जला दिया जाता है, इसके पीछे यह मान्यता है कि भगवती को कई महीने साथ रहने से एर्वालों के प्रति मोह हो जाता है और वह उन्हें अपने साथ ले जाना चाहती है, इसलिये भगवती को यह जताने के लिये कि अब उनका सम्बंध समाप्त हो चुका है उनकी झोपड़ी को जला दिया जाता है।

देवाधिदेव स्वामी तुंगेस्वर महेशा कि आरती कि मधुर धुन जब भी कानो मैं गुजती है तो अपने आरध्या के प्रति खुद बढ़ जाती है, अपने देवता के साथ दिवारा यात्रा के वो सुनहरे पल दुबारा लोट आते है, आस्था विस्वास और भावुकता आशुओ के रूप मैं आकर मन को भाव विहल कर देती है आइये भगवान तुंगनाथ के इस दिव्य धाम के दर्शन करने पहुचे