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डिजिटल इंडिया: सिटी स्मार्ट और गांव वीरान !

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पर्वतीय भूगोल और सांस्कृतिक पहचान की बदौलत उत्तराखंड  राज्य बना  लेकिन आज ये पहचान खतरे में !

उत्तराखंड राज्य के शहरों में लग रही हैं लिप्ट और गांवों में मौत की टाली तक नसीब नहीं

उदय दिनमान डेस्कः डिजिटल इंडिया: सिटी स्मार्ट और गांव वीरान ! दोस्तों उत्तराखंड में तो यहीं स्थिति है। डबल इंजन की सरकार हो या फिर कांग्रेस की सरकार इस विषय पर शायद किसी ने गंभीरता से नहीं सोचा और यह हाल हो गए। देश के प्रधानमंत्री पूरे विश्व के सामने अपने देश की वह तस्वीर पेश कर रहे है जो दिख रही है, लेकिन असली सत्य क्या है यह तो आप खूब जानते हैं। उत्तराखंड के हाल से सभी परिचित है।

 

यहां उत्तराखंड की मार्मिक तस्वीर को शब्दों के माध्यम से प्रस्तुत करने की कोशिश की जा रही है ताकी उत्तराखंड की असली तस्वीर हमारे भाग्यविधाताओं को पता चल सके।इतिहास को देखे या फिर हमारे धर्म ग्रंथों को उत्तराखंड का वर्णन हर जगह मिलता है और यहां के निवासियों के बारे में भी साफ लिखा गया है।

 

राज्य बनने से लेकर अब तक यहां क्या हुआ और कैसा हुआ सभी को पता है। शांत और खूबसूरती के साथ साक्षात स्वर्ग मेरा उत्तराखंड आज बीरान है। यहां के गांव खाली हो गए है और पहाडों की तलहटी में बसे शहर स्मार्ट। जबकि उत्तराखंड की असली पहचान तो यहां की पहाडियों पर बसे गांव थे और हैं। फिर इन गांवों के साथ सत्ताधीशों द्वारा ऐसा अन्याय आखिर हमने क्यों सहा।

 

बड़े बुजुर्ग, विशेषकर महिलाएं ही पहाड़ में बचीं

उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड की अन्तर प्रादेशिक सीमाएं उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश से लगती हैं। राज्य बनने के बाद भी उत्तराखंड में गैर आबाद गांवों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जो पलायन की कथा से कम नहीं है। प्रदेश के कुल 16 हजार 7 सौ 93 गांव में से लगभग 4 सौ के आसपास के गांव पूरी तरह खाली हो गए हैं शेष गांवों में यदि 25 परिवार रहते हैं तो गांव में केवल 10-15 परिवार ही रहते हैं, उनमें भी घर के बड़े बुजुर्ग, विशेषकर महिलाएं ही पहाड़ में बचीं हैं। शेष लोग मैदानों की ओर उतर चुके हैं।

 

कहीं न कहीं पलायन के प्रति सत्ता सजग नहीं

उत्तराखंड में शासन करने वाली हर राजनैतिक पार्टी पहाड़ से पलायन जैसी गंभीर समस्या को उठाती तो हैं,लेकिन सत्ता में आने के बाद उसे भूल जाती है।भले ही पलायन रोजी-रोटी स्वास्थ्य तथा सुविधाओं को लेकर हो,लेकिन पहाड़ से लगातार बढ़ता पलायन इस बात का संकेत है कि कहीं न कहीं पलायन के प्रति सत्ता सजग नहीं है। ऐसा नहीं है कि अधिसंख्य खंडहर उत्तराखंड की गरीबी,भुखमरी, बेरोजगारी और प्राकृतिक आपदाएं पलायन का कारण हैं।

जैसा कि आप सभी जानते है कि सदियों से पहाड़ की यही कहानी और यही सच्चाई भी है। ये कहानी है-पलायन की। अपने विकास और खूबसूरत दुनियां को देखने की चाहत के ये विभिन्न अनचाहे रूप हैं। एक मकान केवल इसलिए खंडहर में बदला क्योंकि उसे संवारने के लिए घर में पैसा नहीं था और एक मकान में ताले पर इसलिए जंङ लगा है कि वहां से अपनी प्रगति की इच्छा लिए पलायन हो चुका है।

 

इनमें कोई इसलिए अपने पुश्तैनी घर नहीं लौटे क्योंकि वे बहुत आगे निकल चुके हैं और सब कुछ तो यहां खंडहरों में बदल चुका है। इनमें कई तालों और खंडहरों का संबंध तो राष्ट्राध्यक्ष, राजनयिकों, सेनापति, नौकरशाहों, लेखकों, राजनीतिज्ञों, वैज्ञानिकों, शिक्षकों और लोक कलाकारों का इतिहास बयान करता है जब‌कि अधिसंख्य खंडहर उत्तराखंड की गरीबी-भुखमरी, बेरोजगारी-लाचारी और प्राकृतिक आपदाओं की कहानी कहते हैं।

वरिष्ठ लेखक हेम पंत की लेखनी की माने तो पलायन और पहाड़ का संबंध कोई नया नही है। स‌दियों से लोग देश के विभन्न भागों से बूर शासकों के दमन से खंडहर मकान-ruins homeबचने अथवा तीर्थयात्रा के उद्देश्य से पहाड़ों की तरफ आये, और यहीं के होकर रह गये। इनमें मुख्यतः द‌क्षिण भारत और महाराष्ट्र के ब्राह्मण और राजस्थान के ठाकुर थे ‌‌जिन्होने तत्कालीन राजाओं ने योग्यतानुसार उ‌चित सम्मान ‌दिया और अपनी राज व्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग बनाया।

पहाड़ों का ज‌टिल जीवन, क‌ठिन भौगो‌लिक परिस्थितयों में रहने का अभ्यास

वतर्मान समय में पलायन का यह प्रवाह उल्टा हो गया है। जनसंख्या बढ़ने से प्राकृ‌तिक संसाधनों पर बढते बोझ, कमरतोड़ मेहनत के बावजूद नाममात्र की फसल का उत्पादन और कुटीर उद्योगों की जर्जर ‌‌‌स्थि‌ति के कारण युवाओं को पहाड़ों से बाहर ‌निकलने को मजबूर होना पड़ा। उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में पहाड़ों में अंग्रेजों के आने के बाद इस क्षेत्र के युवाओं का सैन्य सेवाओं के ‌लिए पहाड़ से बाहर निकलना प्रारंभ हुआ। पहाड़ों का ज‌टिल जीवन, क‌ठिन भौगो‌लिक परिस्थितयों में रहने का अभ्यास, मजबूत कद-काठी, सीधे सरल, ईमानदार व शौर्यवीर पहाड़ी पुरुष अपनी कायर्कुशलता व अदम्य साहस के कारण देश-‌विदेश में युद्धक्षेत्र में अपना लोहा मनवाने लगे।

‌बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में शिक्षा के प्रति जागरुकता के फलस्वरूप युवाओं का उच्च शिक्षा के ‌लिए मैदानी क्षेत्रों की तरफ आना प्रारंभ हुआ। यही समय था जब पहाड़ से बाहर सैन्य सेवाओं के अलावा अन्य क्षेत्रों में भी रोजगार करने लगे. कई लोगों ने सा‌हित्‍य, कला व राजनी‌ति में अच्छा नाम कमाया। स्‍वतन्त्रता के बाद पहाड़ों में धीरे-धीरे कुछ ‌विकास हुआ।

 

शहरों-कस्बों में धीरे-धीरे उच्च शिक्षा के केन्द्र ‌विक‌सित हुए। ग्रामीण, इलाकों में शिक्षा के प्रति लोगों का रूझान बढने लगा। ‌पिछले कुछ सालों में तकनीकी शिक्षा शिक्षण के भी कुछ संस्थान खुले। उद्योगो की शून्यता और सरकारी नौकरियों की घटती संख्या के कारण वतर्मान समय में भी पहाड़ में शिक्षित युवाओं के पास मैदानों की तरफ आने के अलावा कोई ‌विकल्प नही है।

 

शहरों को होता बेतहाशा पलायन
पहाड़ के गांवों से होने वाले पलायन का एक पहलू और है। वह है कम सुगम गांवों और कस्बों से बड़े शहरों अथवा पहाड़ों की तलहटी पर बसे हल्द्वानी, कोटद्वार, देहरादून, रुद्रपुर और ह‌रिद्वार जैसे शहरों को होता बेतहाशा पलायन। मैदानी इलाकों में रहकर रोजगार करने वाले लोग सेवा‌निवृत्‍ति के बाद भी अपने गांवों में दुबारा वापस जाने से ज्यादा ‌किसी शहर में ही रहना ज्यादा पसन्द करते हैं।‌

 

स्थि‌ति ‌जितनी गम्भीर बाहर से ‌दिखती है असल में उससे कहीं अधिक ‌चिंताजनक है। जो गांव शहरों से 4-5 ‌किलोमीटर या अधिक दूरी पर हैं उनमें से अधिकांश खाली होने की कगार पर हैं। सांकल और कुंडों पर पड़े हुए ताले जंङ खा रहे हैं और अपने ‌बा‌‌‌‌शिन्दों के इंतजार में खंडहर बनते जा रहे दर्जनों घरों वाले सैकडों मकान, पहाड़ के हर इलाके में हैं। द्वार-‌किवाड, चाख और आंगन के पटाल जर्जर हो चुके हैं। काली पाथरों (स्लेटों) से बनी पाख (छत) धराशायी हो चुकी हैं।

 

राजनीतिक षडयंत या फिर कुछ ओर
आप इसे क्या कहेंगे राजनीतिक षडयंत या फिर कुछ ओर। अपने पर्वतीय भूगोल और सांस्कृतिक पहचान की बदौलत उत्तराखंड को अलग राज्य बना था. लेकिन आज ये पहचान खतरे में है. गांव के गांव निर्जन हो रहे हैं और बड़े पैमाने पर लोग पलायन कर मैदानी इलाकों का रुख कर चुके हैं. सामाजिक स्तर पर पलायन ने और राजनैतिक स्तर पर आबादी के लिहाज से हुए परिसीमन ने उत्तराखंड से उसका पर्वतीय स्वरूप एक तरह से छीन लिया है.

70 सीटों वाली राज्य विधानसभा में राज्य के नौ पर्वतीय जिलों को जितनी सीटें आवंटित हैं उससे कुछ ज्यादा सीटें राज्य के चार मैदानी जिलों के पास हैं. राज्य का पर्वतीय भूगोल सिकुड़ चुका है. 2011 के जनसंख्या आंकड़े बताते हैं कि राज्य के करीब 17 हजार गांवों में से एक हजार से ज्यादा गांव पूरी तरह खाली हो चुके हैं. 400 गांवों में दस से कम की आबादी रह गई है. 2013 की भीषण प्राकृतिक आपदा ने तो इस प्रक्रिया को और तेज कर दिया है और पिछले तीन साल में और गांव खाली हुए हैं. हाल के अनुमान ये हैं कि ऐसे गांवों की संख्या साढ़े तीन हजार पहुंच चुकी है, जहां बहुत कम लोग रह गए हैं या वे बिल्कुल खाली हो गए हैं.

 

पलायन की तीव्र रफ्तार का अंदाजा इसी से लगता है कि आज जब राज्य के चौथे विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं तो ऐसे में कई पहाड़ी गांवों में मतदाता ही नहीं हैं. एक मीडिया खबर के मुताबिक कुमाऊं के चंपावत जिले के 37 गांवों में कोई युवा वोटर ही नहीं है. सारे वोटर 60 साल की उम्र के ऊपर के हैं. और ये बुजुर्ग आबादी भी गिनी चुनी है. एक गांव में बामुश्किल 60-70 की आबादी रह गई है.

 

अनुमान है कि पिछले 16 वर्षों में करीब 32 लाख लोगों ने अपना मूल निवास छोड़ा है. युवा वोटरों की किल्लत से जूझ रहे गांवों के बनिस्पत शहरों में युवा वोटरों की संख्या बढ़ती जा रही है. इस समय करीब 75 लाख मतदाताओं में से 56 लाख ऐसे वोटर हैं जिनकी उम्र 50 साल से कम है. इनमें से करीब 21 लाख लोग 20-29 के आयु वर्ग में हैं और करीब 18 लाख 30-39 के वर्ग में हैं.

 

साफ है कि युवा आबादी गांवों से कमोबेश निकल चुकी है. बेहतर शिक्षा, बेहतर रोजगार और बेहतर जीवन परिस्थितियों के लिए उनका शहरी और साधन संपन्न इलाकों की ओर रुख करना लाजिमी है. पहाड़ों में फिर कौन रहेगा. गांव तेजी से खंडहर बन रहे हैं, रही सही खेती टूट और बिखर रही है.

 

शासकीय अनदेखियों और लापरवाहियों ने ये नौबत ला दी

कुछ प्राकृतिक विपदाएं, बुवाई और जुताई के संकट, कुछ संसाधनों का अभाव, कुछ माली हालत, कुछ जंगली सुअरों और बंदरों के उत्पात और कुछ शासकीय अनदेखियों और लापरवाहियों ने ये नौबत ला दी है. पहाड़ों में जैसे तैसे जीवन काट रहे लोग अपनी नई पीढ़ी को किसी कीमत पर वहां नहीं रखना चाहते. चाहे वे किसान हों या साधारण कामगार या फिर सरकारी कर्मचारी जैसे शिक्षक डॉक्टर या किसी अन्य विभाग के कर्मचारी.

 

खेत हैं लेकिन बीज नहीं, हल, बैल, पशुधन सब गायब

भारत की करीब 36 फीसदी आबादी शहरों में रहती है. बाकी 64 फीसदी लोग गांवों या कस्बों में रहते हैं. इसके बावजूद ज्यादातर गांवों में आज भी पेयजल की सप्लाई नहीं है.पहाड़ी जीवन को गति देने के लिए, उसमें नई ऊर्जा भरने के लिए और गांवों को फिर से आबाद करने के लिए होना तो ये चाहिए था कि सरकारें बहुत आपात स्तर पर इस पलायन को रोकती. दुर्गम इलाकों को तमाम बुनियादी सुविधाओं से लैस कर कुछ तो सुगम बनाती. खेत हैं लेकिन बीज नहीं, हल, बैल, पशुधन सब गायब.

 

स्कूल हैं तो भवन नहीं, भवन हैं तो टीचर कम, पाइपलाइनें हैं तो पानी कम, बिजली के खंभे हैं तो बिजली नहीं. अस्पताल हैं तो दवाएं उपकरण और डॉक्टरों का टोटा. ये किल्लत भी जैसे पहाड़ की नियति बन गई है. ऐसा नहीं है कि उत्तराखंड में पलायन इन 16 वर्षों की ही समस्या है. काफी पहले से लोग रोजीरोटी के लिए मैदानों का रुख करते रहे हैं. एक लाख सर्विस मतदाता इस राज्य में है.

 

यानी जो सेना, अर्धसैनिक बल आदि में कार्यरत है. ये परंपरा बहुत पहले से रही है. युवा भी अपने अपने वक्तों में बाहर ही निकले हैं. लेकिन अगर वे इतने बड़े पैमाने पर गांवों के परिदृश्य से गायब हुए हैं तो ये सोचने वाली बात है कि क्या वे सभी उस सुंदर बेहतर जीवन को हासिल कर पाएं होंगे जिसकी कामना में वे अपने घरों से मैदानों की ओर निकले होंगे. इस मूवमेंट का, उसके नतीजों का अध्ययन किया जाना जरूरी है.

ये दलील बेतुकी है पहाड़ी इलाकों में सुविधाएं पहुंचाना दुष्कर काम है. उत्तराखंड के पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश का उदाहरण हमारे सामने है. उसने उन्हीं चीजों में अपनी पहचान और समृद्धि का निर्माण किया है जिनका संबंध विशुद्ध पर्वतीयता से है. जैसे कृषि, बागवानी, पनबिजली, पर्यटन, कला आदि.

 

उत्तराखंड में क्या ये संभव नहीं हो सकता था? आज अगर बूढ़े अकेले छूट गए हैं या गांव भुतहा हो चले हैं तो इसकी जिम्मेदारी किस पर आती है. क्या उन जगहों को छोड़ कर जाने वालों पर या उन लोगों पर जो इस भूगोल के शासकीय नियंता और नीति निर्धारक चुने गए हैं. महात्मा गांधी ने कहा था, भारत की आत्मा गांवों में बसती है. लेकिन जब गांव ही नहीं रहेंगे तो ये आत्मा बियाबान में ही भटकेगी.अब इस विषय पर आपको सोचना है और इस दिशा में कदम उठाने है नहीं तो…