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बिजली से क्षेत्र को जगमग करने की पहल ऊर्जा प्रदेश में दम तोड़ रही

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लघु पनबिजली परियोजनाएं सरकार की गलत नीति का शिकार बनी
पिथौरागढ़ । लघु बिजली उत्पादन के लिए प्रदेश के अग्रणी जनपद पिथौरागढ़ में लघु विद्युत परियोजनाओं पर ग्रहण लग चुका है। जिले भर में 28 मेगावॉट बिजली उत्पादन करने वाली माइक्रोहाइडिल की बड़ी परियोजनाएं 2013 की आपदा से अस्तित्वहीन हो चुकी हैं तो शेष बची अति लघु पनबिजली परियोजनाएं सरकार की गलत नीति का शिकार बन चुकी हैं।

शासन की गलत नीति का शिकार बनने वाली थल की बरार लघु जल विद्युत परियोजना है। बरार जल विद्युत परियोजना का निर्माण वर्ष 1996 में किया गया। सात सौ किलोवॉट की इस परियोजना में साढ़े तीन सौ के दो टरबाइन लगे हैं। परियोजना के लिए लगभग 4 किमी लंबी नहर बनी है। यह नहर हमेशा लीकेज करती है। जिससे अस्कोट- कर्णप्रयाग मार्ग बाधित होता रहता है। विभाग इसकी मरम्मत तो करता रहता है परंतु अभी तक लीकेज रोकने के कारगर प्रयास नहीं हुए हैं।

विभाग द्वारा नहर की मरम्मत में नहर निर्माण से अधिक की धनराशि व्यय की जा चुकी है। 21 वर्षो में नहर के लीकेज को रोकने के लिए 27 लाख, 97 हजार 824 रु पये व्यय किए जा चुके हैं। इतनी धनराशि व्यय होने के बाद भी नहर के लीकेज जस के तस हैं। जब तक परियोजना लघु जल विद्युत निगम के पास भी नहर की मरम्मत के बाद कुछ समय उत्पादन करती थी। 20 मई 2013 को प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने निर्णय लिया। पांच मेगावॉट से कम की जल विद्युत परियोजनाओं को माइक्रोहाइडिल से हटाकर अक्षय ऊर्जा विकास अभिकरण उरेडा को सौंप दिया। उरेडा पहले से ही कर्मचारियों की कमी से जूझ रहा था।

अपनी छोटी यूनिटों तक का संचालन नहीं कर पा रहा था। कर्मचारियों की कमी के चलते तीन वर्ष बीतने के बाद भी उरेडा इन लघु जल विद्युत परियोजनाओं पर एक इंच भी कार्य नहीं कर सका है। हालत यह है कि परियोजना में तैनात किए गए कर्मियों को विगत तीन माह से वेतन तक नहीं मिला है। बरार परियोजना एक सफेद हाथी साबित होकर रह चुकी है।

21 वर्षों में इस परियोजना में मात्र 23100 घंटे यानि 963 दिन ही उत्पादन हुआ है। अतीत में जब परियोजना में उत्पादन होता था तो थल सहित आसपास के क्षेत्रों में बिजली की आपूर्ति होती थी। स्थानीय स्तर पर उत्पादित बिजली से क्षेत्र को जगमग करने की पहल ऊर्जा प्रदेश में दम तोड़ रही है।