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एम्स से जुड़े भ्रष्टाचार प्रकरण अवैध रूप से बंद !

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नई दिल्ली । दिल्ली हाई कोर्ट ने उस याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा है जिसमें आरोप लगाया है कि स्वास्थ्य मंत्रालय ने बिना पीएमओ की मंजूरी के एम्स से जुड़े हजारों करोड़ के भ्रष्टाचार मामले को गैरकानूनी तरीके से बंद कर दिया। एक एनजीओ द्वारा दाखिल याचिका में यह आरोप भी लगाया गया है कि इस संबंध में एम्स के पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों पर चल रही विभागीय जांच को भी बंद कर दिया गया है।

कार्यवाहक चीफ जस्टिस गीता मित्तल और जस्टिस सी हरि शंकर की पीठ ने केंद्र को नोटिस जारी कर 31 जुलाई तक जवाब मांगा है। सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (सीपीआईएल) ने दावा किया है कि नौकरशाहों के खिलाफ भ्रष्टाचार के सारे केस बिना प्रक्रियाओं का पालन किए और सक्षम प्राधिकारी यानी प्रधानमंत्री से मंजूरी के बिना बंद कर दिए गए । एनजीओ ने यह दावा भी किया है कि इनमें कुछ केस एम्स में 6000 करोड़ रुपये की लागत से बुनियादी ढांचे के निर्माण से जुड़े हुए भी हैं।

एनजीओ ने अपनी मुख्य याचिका में 2012-14 से जुड़े एम्स के कथित बड़े भ्रष्टाचारों के मामले की जांच में तेजी लाने की मांग की है। सीपीआईएल ने अपना हालिया आवेदन को वकील प्रशांत भूषण की तरफ से दायर किया है। एनजीओ ने दावा किया कि पूर्व स्वास्थ्य मंत्री डॉ.हर्षवर्द्धन के साथ ही सीबीआई ने एम्स के कुछ अधिकारियों के खिलाफ भारी दंड की अनुशंसा की थी।

 

इसने यह भी कहा कि पूर्व स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद ने भी गड़बडिय़ों को लेकर नौकरशाहों के खिलाफ विभागीय जांच की मंजूरी दी थी और जिसे अधिकारियों को महज आगाह कर बंद कर दिया गया। आवेदन में कहा गया है, यह स्पष्ट है कि स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा विचार के लिए सक्षम प्राधिकरण को भेजे बिना भ्रष्टाचार के मामले को बंद कर दिया गया, प्रतिवादी नंबर-3 (जे.पी.नड्डा) के प्रभाव के कारण इन मामलों में कोई फैसला नहीं लिया गया।

एनजीओ ने इस मामले में सीबीआई जांच की मांग की है और साथ ही अपनी मुख्य याचिका में अनुशासनात्मक प्राधिकारी के रूप में नड्डा को हटाने की मांग की गई है। बता दें कि नड्डा ने इस मामले में कोर्ट को बताया था कि यह याचिका राजनीतिक लाभ लेने और सरकार की छवि खराब करने के मकसद से दायर किया गया है। एम्स के पूर्व सीवीसी संजीव चतुर्वेदी ने इस मामले में हलफनामा दाखिल किया था।