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गंगा और यमुना  : प्रवासी पक्षी करने लगे हैं वतन वापसी !

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देहरादून। विश्व भर से भारत के अनेक भागों में आए प्रवासी पक्षी इस समय अपनी वापसी की उड़ान पर हैं। पोलर आर्किटिक से प्रतिवर्ष गंगा और यमुना के तटों एवं उत्तर भारत के कई स्थानों पर लाखों प्रवासी पक्षी आते हैं। अप्रैल के प्रथम सप्ताह तक अधिकतर पक्षी भारत से पलायन कर जाते हैं। इसी तरह से इन दिनों यहां पहुंचे पक्षी भी अब वापसी की ओर हैं।

 

पिछले दिनों हरिद्वार के गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय में जन्तु एवं पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रोफेसर एवं अन्तर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक दिनेश भट्ट के निर्देशन में प्रवासी पक्षियों के क्रिया कलापों का अध्ययन कर कई रोचक जानकारियां जुटाई गई हैं। वैज्ञानिकों के इस अध्ययन से ज्ञात हुआ कि दक्षिण भारत से अपने देश की ओर उड़ान भरने वाले पक्षी जैसे राजहंस, पाइड एवोसेट, स्टेपी गल्स, ग्रेट क्रेस्टेड ग्रेव इत्यादि मार्च में कुछ दिनों के लिए हरिद्वार में विश्राम करते हैं।

 

कुछ दिन ठहरकर दक्षिण की ओर चले जाते हैं। प्रो. भट्ट ने बताया कि प्रतिवर्ष की भांति इस बार लगभग 30 प्रजाति के पक्षियों ने हरिद्वार में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। इन प्रजातियों में मुख्यत: पिनटेल, सुर्खाव, मरगेंजेर, पोचार्ड, क्रस्टेड ग्रेव, कॉमन टील, गढ़वाल, मेलार्ड, ब्लेक इस्टॉर्क, पेन्टेड इस्टॉर्क, सेंड पाइपर, गल्स आदि हैं। इन प्रजातियों में लम्बी दूरी के प्रवासी पक्षियों जैसे पिनटेल, स्टोर्क, मैलार्ड आदि लगभग 4-5 दिन पूर्व हरिद्वार के गंगा तटों से पलायन कर चुके हैं।

 

कम दूरी के प्रवासी पक्षी जैसे सुर्खाब, पनकौवा, इग्रेट, वैगटेल इत्यादि आज ही गंगा तट को छोड़ चुके हैं। कौन से आंतरिक व बाह्य शक्ति इन परिंदों को प्रवास पर भेजती है। शीतकाल बिताने के बाद पुन: उन्हें अपने देश को भेजती है। इस तथ्य से अभी तक पर्दा नहीं उठा है। प्रो. भट्ट बताते हैं कि पक्षियों की वापसी का प्रमुख कारण मार्च में तापमान का बढऩा है। आंतरिक कारणों में जैविक घड़ी द्वारा मार्ग दर्शन दिया जाता है।

 

न केवल पक्षियों, अपितु मनुष्यों में भी ‘जैविक घड़ी’ शारीरिक क्रियाओं के नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस जैविक घड़ी के मैकेनिज्म के आविष्कार के लिए ही 2017 में तीन विदेशी वैज्ञानिकों हॉल, माइकल व रोसबास को नोबेल पुरस्कार मिला है। पक्षी वैज्ञानिक प्रो. दिनेश भट्ट ने बताया कि पक्षियों में देखने, सुनने व याद करने की क्षमता बेजोड़ होती है। ये परिन्दे उन ध्वनि तरंगों को भी सुन लेते हैं, जो मनुष्य की पकड़ से बाहर हैं।

 

इसी विशिष्टता के कारण पक्षी अपनी यात्रा में आकाशीय व समुद्री ज्वार भाटों की ध्वनियां से अपना मार्ग निर्धारण करते हैं। इन पक्षियों की याद्दाश्त इतनी अच्छी होती है कि प्रवास से वापस लौटते समय उसी स्थान पर अपना घौसला बनाते हैं, जहां से वे प्रवास पर आए थे। गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने खंजन पक्षी के पैर में छल्ला बांधकर यह निरीक्षण किया कि यह पक्षी प्रतिवर्ष हिमालय से दूर हरिद्वार के गुरुकुल कांगड़ी परिसर व कनखल क्षेत्र में शीत प्रवास पर आता है या नहीं।

 

उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय के पक्षी वैज्ञानिक डॉ. विनय सेठी के अनुसार, विश्व में सर्वाधिक दूरी तय करने वाला पक्षी आर्केटिक टर्न है, जो कनाड़ा के दक्षिणी ध्रुव से 17600 किमी की यात्रा करता है और बिना रुके लगभग 50 किमी प्रति घण्टे की रफ्तार से चलता है।